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चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाती यूएन की विश्व खुशहाली रिपोर्ट, जिसमें भारत 140 वें स्थान पर है... 

Wed, 01 May 2019 01:49 AM IST
Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली 
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संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) की विश्व खुशहाली रिपोर्ट में इस साल भारत 140 वें स्थान पर आया है। पिछले साल 133 वें पायदान पर था। इस मामले में हम अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान से भी पिछड़ गए हैं। यानी वहां रहने लोग हम से ज्यादा खुश हैं और खुशहाल हैं। सरकार कहती है कि पिछले 10 सालों में भारत की जीडीपी दोगुनी हो गई है, लेकिन हैप्पीनेस इंडेक्स की रिपोर्ट में भारत की खुशहाली करीब 1.2 पॉइन्ट नीचे चली गई है। मतलब, लोग खुश नहीं हैं। उन्हें कई तरह की चिंताओं ने घेर रखा है। इन सबके बीच एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि यह खुशहाली रिपोर्ट चुनाव का मुद्दा क्यों नहीं बन पाती।
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पिछले माह जारी हुई वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 156 देशों के आंकड़ों पर आधारित है। इस रिपोर्ट में यह देखा जाता है कि किसी देश के लोग खुद को कितना खुश मानते हैं। कमाई, लंबे समय तक स्वस्थ जीवन जीना, उदारता, विश्वास, लोगों को अपनी बात कहने की आजादी, सामाजिक समर्थन और भ्रष्टाचार आदि न होना, इन सब बातों के आधार पर किसी देश का हैप्पीनेस रैंक तय किया जाता है। फिनलैंड को लगातार दूसरे वर्ष दुनिया का सबसे खुशहाल देश माना गया है। उसके बाद डेनमार्क, नॉर्वे, आइसलैंड और नीदरलैंड का स्थान है। 

रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान 67 वें, बांग्लादेश 125 वें और चीन 93 वें स्थान पर है। राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मामलों के जानकार योगेंद्र यादव कहते हैं, हालांकि मैं इस रिपोर्ट पर ज्यादा भरोसा नहीं करता, लेकिन कई मामलों में यह रिपोर्ट विकास की मूल बातों की ओर इंगित करती है। सरकार कहती है कि जीडीपी डबल हो गई है। मैं पूछता हूं कि जीडीपी डबल हो गई है तो फिर लोग खुश क्यों नहीं हैं। उन्हें तो खुशहाल होना चाहिए था। आर्थिक वृद्धि होने के बाद भी यदि खुशहाली नहीं आ रही है तो इसका मतलब सब कुछ ठीक नहीं है। तीन चौथाई नया पैसा आ रहा है, मगर वह देश के एक फीसदी लोगों के पास जा रहा है।
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आर्थिक विषमता के मामले बढ़ रहे हैं। शिक्षा-स्वास्थ्य के नाम पर खोखली योजनाएं सबके सामने हैं। यह हमारे राजनीतिक सिस्टम का दुर्भाग्य है कि चुनाव में हैप्पीनेस इंडेक्स पर कोई बात नहीं होती। कोई भी पार्टी यह नहीं जानना चाहती कि लोग खुश क्यों नहीं हैं। चुनाव में न शिक्षा स्वास्थ्य की बात होती है और न ही खेती-किसानी की। पर्यावरण और जल संरक्षण, जैसे मुद्दे अगर उनके घोषणा पत्र में ही जगह बना पाएं तो बड़ी बात होती है।

मां-बाप और बच्चे, सब चिंता में हैं तो फिर खुशी कैसे बढ़ेगी...  

जेएनयू में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर प्रवीण झा का कहना है कि केवल जीडीपी बढ़ने से लोगों के चेहरे पर खुशी नहीं आती। जीवन यापन में कौन सी दिक्कतें हैं, ये एक बड़ा मामला है। अब आप देखिये, नोटबंदी या जीएसटी के बाद नौकरी बढ़ी हैं या घटी हैं। मां-बाप को यह चिंता है कि वे अपने बच्चों को तमाम परेशानी सहते हुए बेहतर शिक्षा तो दिला रहे हैं, लेकिन नौकरी मिलेगी या नहीं। यह सवाल उन्हें कचोटता रहता है। मान लीजिये कोई साधन संपन्न परिवार है, लेकिन जब उनकी बेटी कहीं बाहर जाती है और वे इसी चिंता में डूबे रहते हैं कि वह सुरक्षित लौटेगी या नहीं, तो उन्हें खुश कैसे कहेंगे।

चुनाव में ये बातें प्रमुखता से रखी जानी चाहिएं, लेकिन न तो वोटर इन पर ध्यान देता और न ही राजनीतिक दल। देश की अर्थव्यवस्था के बारे में कोई भी नहीं कह सकता कि यह स्थिर है। लॉ एंड ऑर्डर का भी पता नहीं कि कब क्या हो जाए। बैंकिंग सिस्टम के तनाव में रहने की वजह से निवेश कम हो रहा है। झुग्गी में रहने वाले लाखों लोग किफायती घर न मिलने से दुखी हैं। अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाले 90 फीसदी लोग खुश नहीं हैं। वजह, उनके लिए काम का माहौल निराशाजनक है, नौकरियां सुरक्षित नहीं हैं। एक सर्वे के मुताबिक, 76 फीसदी भारतीय नौकरियों के मौकों की कमी के चलते खुश नहीं हैं और 73% महंगाई बढ़ने से नाखुश हैं।

आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस और ऑटोमेशन की वजह से अकुशल मज़दूरों को काम नहीं मिल रहा है ये सभी चीज़ें आम आदमी की मुसीबतें बढ़ा रही हैं और उन्हें खुशी से दूर कर रही हैं। इसके बाद भी चुनाव में ये बातें जगह नहीं बना पाती।लोगों को इसके लिए जागरूक होना पड़ेगा।
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चुनाव के वक्त काम के मुद्दे तो गौण हो जाते हैं: प्रो आनंद कुमार 

जेएनयू में समाजशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर आनंद कुमार का मानना है कि हमारे देश में अलग ही तरह का मतदान व्यवहार होता है। राजनीतिक दल कभी सेना का नाम लेकर वोट मांगने लगते हैं तो कभी आरक्षण का मुद्दा हावी हो जाता है। जब इनसे काम नहीं चलता तो हिंदू-मुस्लमान सामने आ जाता है। मंदिर भी इन सबके बीच घूमता रहता है। वोट एक राजनीतिक फैसला होता है, इस बात को पूरी तरह से न तो वोटर समझ पाते हैं और न ही राजनीतिक पार्टियां। महिला अपराध की दर क्या है, रोजगार कैसा मिल रहा है, भ्रष्टाचार की स्थिति क्या है, कितने परिवारों को पोष्टिक आहार मिलता है, क्या चालीस फीसदी बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें रोजाना दूध या अंडा मिलता है।

इस तरह तो हैप्पीनेस रिपोर्ट में भारत का रैंक नीचे ही जाएगा। लोगों को सरकार की किसी भी बात का भरोसा नहीं होता। आर्थिक विषमता और पर्यावरण, इन सब पर तो कोई बात ही नहीं करना चाहता। यही वजह है कि हम धीरे धीरे युद्धग्रस्त दक्षिण सूडान, जिसका हैप्पीनेस रैंक सबसे नीचे यानी 156 वां है, की ओर जा रहे हैं। यहां के लोग अपने जीवन से सबसे अधिक नाखुश हैं, इसके बाद मध्य अफ्रीकी गणराज्य (155), अफगानिस्तान (154), तंजानिया (153) और रवांडा (152) हैं।
 
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