आरएसएस और भाजपा मूल रूप से ब्राह्मणवादी संस्कृति में रचे बसे हैं। ओबीसी जातियों के बाद संघ और भाजपा ने चाहा और दलितों को खुद से जोड़ने की हर संभव कोशिश की।
भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश विधानसभा और अगले आम चुनावों के लिए दलित वोट बेहद जरूरी है। आख़िर ये देश की आबादी का 16.6 फीसद हैं।
लेकिन बड़े प्रयासों के बाद संघ के बनाए भाजपा में कल्याण सिंह, उमा भारती, शिवराज सिंह से लेकर बीएस येदियुरप्पा तक खूब ओबीसी नेता हैं।
नरेंद्र मोदी कभी खुद को दलित बताते हैं, कभी महादलित। लेकिन वो हिंदुत्व और वह भी ब्राह्मणवादी हिंदुत्व के खांटी चेहरे हैं।
लेकिन दलित, संघ और भाजपा से जुड़ नहीं रहा।।। आखिर क्यों?
संघ और भाजपा सवर्ण ब्राह्मणवादी संस्कृति से प्रभावित रहे हैं। लंबे समय तक इसका आधार ऊँची जातियाँ और शहरी व्यापारी रहे हैं, जो मूल रूप से ब्राह्मणवादी संस्कृति के झंडाबरदार रहे हैं।
राजनीति के दबाव में संघ परिवार और भाजपा, पिछड़ी और दलित जातियों से जुड़ने को मजबूर हुई है। एक सवाल यह भी है कि भाजपा इतनी सवर्णवादी है तो पिछड़ों को इससे जुड़ने में दिक्कत क्यों नहीं हुई?
पिछड़ी जातियों ने अपने सामाजिक और सांस्कृतिक ढाँचें में ब्राह्मणवादी संस्कृति को आत्मसात कर लिया है, इसलिए उनसे भाजपा को जुड़ने में कोई परेशानी नहीं हो रही है। वो खुद को क्षत्रिय की तरह देखते हैं और वेदों से निकले देवी-देवताओं और पंडितों को पूजते हैं।
वो केवल अपने से नीची जातियों और मुसलमानों से भिड़ते हैं, ऊपर वालों से नहीं। इसलिए ओबीसी का ब्राह्मणवाद संघ को अपनी हिन्दुत्व की राजनीति के लिए ठीक लगता है। लेकिन दलित समूहों के जीने की अपनी जरूरतें और तौर-तरीके ब्राह्मणवाद के घोर विपरीत हैं।