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जानिए रहने के लिहाज से यूपी का रामपुर क्यों है देश का सबसे खराब शहर?

Thu, 16 Aug 2018 09:28 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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एक समय था जब उत्तर प्रदेश का रामपुर शहर एक रियासत हुआ करता था। यहां नवाबों के ठाठ-बाट चलते थे। हर तरह की सुख-सुविधाओं से भरपूर था यह शहर। लेकिन नवाबों का दौर खत्म होने के बाद इस शहर की स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ती चली गई और आज रामपुर रहने के लिहाज से देश का सबसे खराब शहर बन चुका है। केंद्रीय आवास व शहरी कार्य मंत्रालय ने सोमवार को 'ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स' सूची जारी की, जिसमें महाराष्ट्र के पुणे शहर को रहने के लिहाज से सबसे बेहतरीन शहर बताया गया है, जबकि उत्तर प्रदेश का रामपुर रहने के लिहाज से देश का सबसे खराब शहर है। 

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दरअसल, केंद्र सरकार ने जनवरी 2018 में शहरों की सुविधाओं के आधार पर इस कार्यक्रम की लांचिंग की थी। रैंकिंग में तुलनात्मक आधार पर यह पता करना था कि कौन सा शहर बेहतर है और किस शहर में सुविधाएं खराब हैं। इसमें 100 स्मार्ट शहरों के साथ 10 लाख से ऊपर की आबादी के 16 शहर शामिल थे। कुल 111 शहरों की रैंकिंग जारी की गई है। 

रामपुर क्यों है देश का सबसे खराब शहर 

यहां कोई भी सिटी बस सर्विस नहीं है, कोई अपशिष्ट निपटान (वेस्ट डिस्पोजल) साइट नहीं है, स्थानीय अस्पतालों में आपातकालीन (इमर्जेंसी) संभालने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है, स्कूलों में किताब नहीं है और बिजली आपूर्ति की स्थिति बेहद ही खराब है। रामपुर के स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह सिर्फ नाम का शहर है, यहां से सुख-सुविधाएं नदारद हैं। उनका कहना है कि रामपुर को केंद्र सरकार ने देश के सबसे खराब शहर का दर्जा दिया है, इससे बदतर उनके लिए और कुछ नहीं हो सकता है। 
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एक रिपोर्ट के मुताबिक, रामपुर शहर की जनसंख्या करीब सवा तीन लाख है और यहां के लोग हर रोज लगभग 165 टन यानी 20 ट्रक कूड़ा-कचरा निकालते हैं, जिनमें से कुछ को घाटमपुर गांव के पास ही फेंक दिया जाता है, जबकि बाकी बचे कूड़ों को सड़कों और नालियों में फेंक दिया जाता है, क्योंकि यहां अपशिष्ट प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) सुविधा ही नहीं है।    

शहर के स्वच्छता विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी

रामपुर के मुख्य स्वच्छता अधिकारी और खाद्य निरीक्षक टीपीएस वर्मा के मुताबिक, विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी की वजह से शहर में कूड़ों का प्रबंधन नहीं हो पा रहा है। उन्होंने बताया कि 1991 के सरकारी आदेश के मुताबिक, प्रत्येक 10 हजार जनसंख्या पर 28 सफाई कमचारी होने चाहिए, जबकि 355 स्थायी नियुक्तियों के बदले हमारे पास सिर्फ 199 और 534 संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) वाले कर्मचारियों की जगह पर महज 170 सफाई कर्मचारी ही हैं। उन्होंने कहा कि हमें 43 में से 21 वार्डों की सफाई के लिए बाहरी लोगों की सुविधा लेनी पड़ती है।  

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शहर के सरकारी अस्पताल का भी हाल बेहाल 

शहर के सरकारी अस्पताल का भी हाल कुछ ऐसा ही है। यहां भी डॉक्टरों और बाकी कर्मचारियों की भारी कमी है। अस्पतालों में बेड की भी कमी है, जिसकी वजह से महिला वार्ड में भर्ती दो मरीजों को एक बेड पर ही सोना पड़ता है। यहां के सरकारी अस्पताल में कुल 27 डॉक्टरों की पोस्ट निर्धारित की गई है, लेकिन फिलहाल यहां 13 डॉक्टर ही हैं, जिन्हें रोजाना करीब 4 हजार मरीजों को देखना पड़ता है। 

यहां तक कि अस्पताल के पास कार्डियोलॉजिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट और स्किन स्पेशलिस्ट डॉक्टर ही मौजूद नहीं हैं। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर बीएम नागर ने बताया कि डॉक्टरों और सुविधाओं की कमी की वजह से हमें मजबूरन मरीजों को मेरठ और अलीगढ़ रेफर करना पड़ता है। 

स्कूलों में न बिजली है, न सफाई और न ही किताब

रामपुर शहर के स्कूलों की हालत तो और भी बदतर है। यहां स्कूलों में न तो बिजली है, न सफाई है और ही बच्चों के पास किताबें ही हैं। इसके अलावा स्कूल में कमरे की भी कमी है, जिसकी वजह से दो-दो कक्षाओं के छात्रों को एक ही कमरे में बिठाया जाता है या बाहर बरामदे में बिठाकर पढ़ाया जाता है। 

शहर में सार्वजनिक परिवहन की भी सुविधा नहीं

रामपुर शहर में सार्वजनिक परिवहन की कोई सुविधा ही नहीं है। लोगों को कहीं भी आने-जाने के लिए ऑटो, ई-रिक्शा या टेम्पो का सहारा लेना पड़ता है। जिनके पास अपना कोई वाहन नहीं है, उन्हें भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।   
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