ज्यादातर देशों में कोरोना वैक्सीन मुफ्त लगाई जा रही है, लेकिन भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां निजी अस्पतालों में वैक्सीन के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं। लोगों को 12 से 17 डॉलर यानी 900 से 1500 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं।
कोरोना महामारी के इस दौर में वैक्सीन को सबसे बड़े हथियार के तौर पर देखा जा रहा है। पूरे देश में टीकाकरण अभियान तेजी से चलाया जा रहा है। सरकारी और निजी अस्पतालों में वैक्सीनेशन मुहिम चल रही है। सरकारी में टीका मुफ्त में लगाया जाता है, लेकिन निजी अस्पतालों में वैक्सीन लगवाने के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं, वहीं दुनिया के कई देशों में वैक्सीनेशन ड्राइव मुफ्त में चलाई जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत में वैक्सीन लगवाने के लिए पैसे क्यों खर्च करने पड़ रहे हैं। क्या सरकार वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को सब्सिडी नहीं दे रही है या कंपनियां अपने फायदे के लिए पैसे ले रही हैं।
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भारत के निजी अस्पतालों में वैक्सीन लेने के लिए 900 से लेकर 1500 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। भारत दुनिया में इकलौता देश है, जहां प्राइवेट में वैक्सीन के लिए इतनी मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। विदेश में किसी भी देशों में वैक्सीन के लिए पैसे नहीं देने होते हैं। अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और कनाडा में टीका मुफ्त में लगाया जाता है। यहां पर वैक्सीन लेने के लिए जेब ढीली नहीं करनी पड़ती है। आइए जानते हैं कि विदेश में जब टीका मुफ्त में मिल रहा है तो अपने देश में इसके बदले पैसे क्यों खर्च करने पड़ते हैं।
सरकारें उठाती है पूरा खर्च
दरअसल, विदेश में वैक्सीन का खर्च सरकार उठाती है। अमेरिकी सरकार ने मुआवजे का एक कोष बनाया है। यदि किसी को वैक्सीन की वजह से किसी प्रकार का साइड इफेक्ट होता है तो सरकार उस कोष से उसे आर्थिक मदद मुहैया कराती है। वहीं भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से यहां पर ऐसा कोई राहत कोष नहीं बनाया गया है। यहां पर कंपनियां खुद ही जिम्मेदारी उठाती है। ऐसे में लोगों को वैक्सीन के बदले पैसे देने पड़ते हैं।
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विदेश में क्यों दी जा रही है मुफ्त वैक्सीन?
अमेरिका, यूरोपिय संघ, ब्रिटेन और कनाडा समेत कई देशों में वैक्सीन निर्माता कंपनियों को आर्थिक मदद देने के लिए सरकार ने एक कोष का गठन कर रखा है।
वैक्सीन बनाने में आने वाले कच्चे रॉ मटेरियल के लिए सरकार द्वारा फंड जारी किया जाता है। साथ ही वैक्सीन की साइड इफेक्ट होने पर राहत कोष से इलाज किया जाता है।
अमेरिकी कंपनियां फाइजर, मॉर्डना को वैक्सीन बनाने की जिम्मेदारी है, लेकिन उस पर आने वाली लागत का खर्च सरकार उठाती है।
अगर किसी व्यक्ति ने वैक्सीन ली और उससे अगर उसे साइड इफेक्ट हुआ तो उसका इलाज राहत कोष के द्वारा किया जाता है।
विदेश में क्लिनिक्ल ट्रायल पर होने वाले खर्चों का वहन भी सरकार द्वारा किया जाता है।
भारत में वैक्सीन के लिए क्यों खर्च करने पड़ रहे हैं रुपये?
भारत में सरकार की ओर से किसी तरह का कोष नहीं बनाया गया है, सरकार ने वैक्सीन प्रोडक्शन के नाम पर कंपनियों को पैसे जारी किए हैं।
भारत में दो कंपनियां कोरोना वैक्सीन बना रही है। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कोविशील्ड का उत्पादन करती है, जबकि भारत बायोटेक कोवैक्सीन तैयार करती है।
भारत सरकार ने भारत के सीरम इस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक को 4500 करोड़ रुपये दिए हैं।
सीरम इस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को 3,000 करोड़ रुपये दिए गए हैं। वहीं भारत बायोटेक को 15,00 करोड़ की राशि दी गई है।
भारत में कोई शोध या प्रेक्षण (क्लीनिकल ट्रायल) की जिम्मेदारी कंपनियों के ऊपर होती है।
कोविशील्ड वैक्सीन के लिए 700 से 900 रुपये वसूले जा रहे हैं।
कोवैक्सिन के लिए निजी अस्पताल 1250 से 1500 रुपये ले रहे हैं
भारत उन देशों में शामिल है जहां निजी अस्पतालों में वैक्सीन की कीमत सबसे ज्यादा है
हालांकि अमेरिका, यूरोप, कनाडा की तर्ज पर सीरम इंस्टीट्यूट ने सरकार से एक प्रकार के छूट की मांग की है।