फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फलस्तीनी और यहूदियों को क्यों है भारत से इतना प्रेम?

Sat, 27 Jan 2018 11:30 AM IST
बीबीसी हिंदी
विज्ञापन
- फोटो : BBC
विज्ञापन
अगर आपसे दो व्यक्ति एक ही तरह से प्यार करें तो आप किसे चुनेंगे? किसकी तरफ आपका झुकाव अधिक होगा? ये एक कठिन सवाल है जिसका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामना कर रहे हैं। भारत की विदेश नीति बनाने वालों को भी ये मुद्दा सता रहा है।
विज्ञापन


पिछले दिनों मैंने भी इसराइल में इस सवाल को महसूस किया। वहां 10 दिनों तक रहने के बाद अहसास हुआ कि फलस्तीनी अरब भी उतने ही भारत प्रेमी हैं, जितने यहूदी।

जैसे ही लोगों को पता चलता कि मैं और मेरे सहयोगी दीपक जसरोटिया भारत से आए हैं तो लोगों की प्रतिक्रिया बदल जाती। उनके चेहरे पर मुस्कराहट छा जाती, रवैया नरम हो जाता और अंदाज दोस्ताना।
विज्ञापन


कुछ ऐसे अंदाज आपके लिए पेश-ए खिदमत हैं।

हम दोनों एक प्राथमिक विद्यालय में गए, जहां 10 साल से कम उम्र के छात्रों को जब पता चला कि हम दोनों भारत से आए हैं तो एक लड़की ने बार-बार शाहरुख खान कहना शुरू कर दिया। दूसरे ने बॉलीवुड की कुछ फिल्मों के नामों को गिनाना शुरू कर दिया। वो सभी बच्चे फलस्तीनी थे।

यरूशलम के जिस होटल में हमारा पड़ाव था, उसका मालिक यहूदी था लेकिन मैनेजर और वेटर इत्यादि फलस्तीनी। एक दिन मैनेजर ने भारत के बारे में बात छेड़ दी। उसने कहा कि भारत से उसे बेहद प्रेम है। मैंने पूछा आप भारत हो आए? उसने कहा- कई बार। वे ताजमहल से लेकर मनाली और गोआ तक जा चुके थे।

एक दूसरे फलस्तीनी मिले, जो बॉलीवुड के दीवाने निकले। उन्होंने राज कपूर से लेकर रणबीर कपूर तक सभी की जानकारी दे दी। उन्हें हिंदी गानों का भी बेहद शौक था। मैंने महसूस किया कि फलस्तीनी अरबों में भारत की लोकप्रियता का राज बॉलीवुड की फिल्में थीं।

लेकिन अगर आप 50 साल से अधिक उम्र के लोगों से बातें करें तो महात्मा गांधी का नाम चर्चा में जरूर शामिल होता है। जहां आए दिन इतनी हिंसा होती रहती है।

वहां अहिंसा का प्रचारक इतना लोकप्रिय कैसे? मुझसे एक प्रोफेसर ने कहा कि इस देश में गांधी जी और उनके सिद्धांतों की जरूरत है। ये तो बात हुई फलस्तीनी अरबों की। इसराइली यहूदी भी भारत से कम प्यार नहीं करते। पहले तो उन्हें जब पता चलता कि हम भारतीय हैं तो दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते करते।
विज्ञापन

हमें इसका अहसास बार-बार हुआ कि यहूदियों की नजर में भारत एक महान देश है और वो इसलिए भारत को अजीम नहीं मानते क्यूंकि उनके प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन्याहू ऐसा कहते हैं।

बल्कि इसलिए कि वो भारत के लोकतंत्र की कदर करते हैं। इसके बहुसंस्कृति वाले समाज को सलाम करते हैं। हां एक व्यक्ति ऐसा भी मिला, जिसने पिछले कुछ सालों में भीड़ के बेकसूर नागरिकों को पीट-पीट कर मार देने वाली वारदातों का जिक्र करके अफसोस किया।

व्यापार के सिलसिले में सालों से भारत आने वाली एक महिला ने कहा, 'मुझे भारत से इतना लगाव है कि इसमें मुझे कोई बुराई नजर आती ही नहीं।' मैंने कहा ये तो कुछ ज्यादा हो गया। हम तो अपने देश में काफी कमियां देखते आ रहे हैं- जैसे कि अमीर-गरीब में बढ़ते फासले, हिंसा, बलात्कार, भ्रष्टाचार और जातिवाद। वो महिला तो भारत की कुछ बुराई सुनने को तैयार नहीं थीं। उनके पास सभी मुद्दों का अपना तर्क था ।

इससे भी बढ़कर हमारी मुलाकात एक बुद्धिमान यहूदी महिला से हुई, जिन्होंने भारत के यहूदियों पर एक किताब लिखी है। उनका कहना था कि सालों पहले जब वो पहली बार भारत आईं थीं तो उन्हें महसूस ही नहीं हुआ कि वो किसी नए देश में हैं। उन्होंने कहा, "मुझे लगा मैं अपने घर आ गई हूँ।" उनके अनुसार, भारत के बारे में उन्होंने इतना पढ़ रखा था कि उन्हें सभी कुछ जाना-पहचाना सा लगा।

यहूदी और अरब के इस सच्चे प्रेम ने भारत को धर्म संकट में जरूर डाल दिया है। भारत की विदेश नीति में इसका इजहार भी होता है। पिछले साल जुलाई में जब प्रधानमंत्री मोदी इसराइल गए तो वो फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मिलने नहीं गए। फलस्तीनी उस समय इस फैसले से मायूस हुए।

दूसरी तरफ पिछले महीने जब भारत ने यरूशलम को लेकर संयुक्त राष्ट्र के एक वोट में फलस्तीनियों का साथ दिया तो उन सब का सीना "56 इंच" का हो गया। लेकिन इससे इसराइल में काफी मायूसी हुई। एक पत्रिका ने लिखा कि भारत इसराइल का एक भरोसेमंद दोस्त नहीं हो सकता, लेकिन ये नाराजगी वक्ती साबित हुई

भारत को आजादी 1947 में मिली और इसराइल का जन्म उसके एक साल बाद हुआ। इन दो आधुनिक देशों की उम्र एक है और मसले भी मिलते जुलते हैं। आजादी के बाद भारत का अगले कई सालों तक झुकाव फलस्तीनियों की तरफ था। लेकिन 1992 में जब इसराइल और भारत के बीच औपचारिक तरीके से रिश्ते बने तो भारत ने दोनों पक्षों के बीच अपनी पॉलिसी में एक संतुलन लाने की कोशिश की।

भारत के रवैये से लगता है कि यहूदियों और अरबों का प्यार बटोरो, मगर फैसले अपने हित को सामने रख कर करो। पिछले साल पीएम मोदी इसराइल गए थे। मुझे पता चला है कि इस साल वो फलस्तीन जा सकते हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें