भारत ने न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में शामिल होने के लिए अर्जी दी है। इस गुट में शामिल 48 देशों की बैठक आज हो रही है। इसमें अमेरिका ने भारत की सदस्यता का समर्थन किया है, लेकिन माना जा रहा है कि चीन के विरोध के कारण भारत के लिए रास्ता आसान नहीं होगा।
आइए जानते हैं एनएसजी के बारे में सात बातें।
एनएसजी की स्थापना मई 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद की गई थी और इसकी पहली बैठक नवंबर 1975 में हुई। भारत के परमाणु परीक्षणों से साबित हुआ कि कुछ देश, जिनके बारे में माना जाता था कि उनके पास परमाणु हथियार बनाने की तकनीक नहीं है, वो इसे बनाने के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं।
एनएसजी ऐसे देशों का संगठन है, जिनका लक्ष्य परमाणु हथियारों और उनके उत्पादन में इस्तेमाल हो सकने वाली तकनीक, उपकरण, सामान के प्रसार को रोकना या कम करना है। परमाणु संबंधित सामान के निर्यात को नियंत्रित करने के लिए दो श्रेणियों की गाइडलाइंस बनाई गई हैं।
वर्ष 1994 में स्वीकार की गई एनएसजी गाइडलाइंस के मुताबिक कोई भी सप्लायर उसी वक्त ऐसे उपकरणों के हस्तांतरण की स्वीकृति दे सकता है, जब वो संतुष्ट हो कि ऐसा करने पर परमाणु हथियारों का प्रसार नहीं होगा। एनएसजी की वेबसाइट के मुताबिक़ एनएसजी की गाइडलाइंस परमाणु अप्रसार की विभिन्न संधियों के अनुकूल हैं।
ये संधियां हैं एनपीटी, ट्रीटी फॉर द प्रोहिबिशन ऑफ न्यूक्लियर वेपंस इन लैटिन अमेरिका, साउथ पैसिफिक न्यूक्लियिर फ्री जोन ट्रीटी, अफ्रीकन न्यूक्लियर वेपन फ्री जोन ट्रीटी (पलिंदाबा समझौता), ट्रीटी ऑन द साउथ-ईस्ट एशिया न्यूक्लियर वेपन फ्री जोन (बैंकॉक समझौता) और द सेंट्रल एशियन न्यूक्लियर वेपन फ्री जोन ट्रीटी (सेमिपैलेटिंस्क समझौता)।
वेबसाइट के मुताबिक एनएसजी गाइडलाइंस का क्रियान्वयन हर सदस्य देश के राष्ट्रीय कानून और कार्यप्रणाली के अनुसार होता है। इस संगठन में सर्वसम्मति के आधार पर फैसला होता है। सभी फैसले एनएसजी प्लेनरी बैठकों में होते हैं। हर साल इसकी एक बैठक होती है।
भारत और पाकिस्तान इस संगठन में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं। जहां भारत को अमरीका, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, मेक्सिको जैसे देशों का समर्थन हासिल है, वहीं पाकिस्तान को चीन का समर्थन मिल रहा है।
भारत ने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, जिसके कारण एक धड़े में भारत को शामिल करने को लेकर संशय है।