सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आत्मकेंद्रित, दृष्टिहीनता और बहरेपन से पीड़ित बच्चों के लिए अलग स्कूलों और विशेष रूप से प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी पर सवाल उठाए। शीर्ष अदालत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि यह सोचना ही असंभव है कि किसी न किसी प्रकार की दिव्यांगता से ग्रस्त बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ मुख्यधारा के स्कूलों में शिक्षा प्रदान की जा सकती है।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि शिक्षा प्राप्त करने को संविधान के अनुच्छेद 21ए के अंतर्गत मौलिक अधिकार माना गया है और बच्चों के नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून, 2009 के तहत राज्यों का यह वैधानिक कर्तव्य है।
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पीठ ने कहा, ‘पहली नजर में हमारा मानना है कि विशेष जरूरत वाले बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए विशेष शिक्षक ही नहीं, बल्कि उनके लिए विशेष स्कूलों का होना भी जरूरी है।’ पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को उसकी टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि राज्य कब तक इस जिम्मेदारी को पूरा करेगा। साथ ही न्यायालय ने इस मामले को 27 नवंबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया।