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Badlapur Case: रिपोर्ट में जिम्मेदार ठहराए गए पांच पुलिसकर्मियों पर क्यों दर्ज नहीं हुई FIR? हाईकोर्ट का सवाल

Thu, 13 Mar 2025 05:57 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई।

सार

Badlapur Case: बॉम्बे हाईकोर्ट ने पूछा कि बदलापुर यौन उत्पीड़न मामले के आरोपी की मौत के लिए पांच पुलिसकर्मियों को जिम्मेदार ठहराने वाली रिपोर्ट के बाद प्राथमिकी क्यों नहीं दर्ज की गई। महाराष्ट्र सरकार ने कहा कि वह इसे आकस्मिक मौत के मामले के रूप में जांच रही है।
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बंबई उच्च न्यायालय - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को पूछा कि जब यह बात सामने आई की बदलापुर यौन उत्पीड़न मामले में एक आरोपी मौत के लिए पांच पुलिसकर्मी जिम्मेदार हैं, तो फिर प्राथमिकी क्यों नहीं दर्ज की गई? दूसरी ओर, महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि वह पहले से ही इस घटना की आकस्मिक मृत्यु के रूप में जांच कर रही है। 

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जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस नीला गोखले की बेंच ने यह सवाल उठाया और इस पर आदेश सुरक्षित रखा कि क्या सरकार को मजिस्ट्रेट द्वारा दी गई जांच रिपोर्ट के बाद प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए। रिपोर्ट में आरोपी की हिरासत में मौत के लिए पांच पुलिसकर्मियों को जिम्मेदार ठहराया गया था। 

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सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील अमित देसाई ने कहा कि राज्य पहले से ही अपनी स्वतंत्र जांच कर रहा है और सरकार ने इस मामले की जांच के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक आयोग भी गठित किया है। बदलापुर यौन उत्पीड़न मामले के आरोपी अक्षय शिंदे को पिछले साल दिसंबर में एक कथित मुठभेड़ में मार डाला गया था, जब उसे नवी मुंबई की तलोजा जेल से महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण ले जाया जा रहा था। उसे अगस्त 2024 में दो नाबालिक लड़कियों के साथ दुष्कर्म के मामले में गिरफ्तार किया गया था। 

पुलिस ने दावा किया था कि 23 जनवरी 2024 को उसे तलोजा जेल से पूछताछ के लिए ले जाते समय उसने एक पुलिसकर्मी की बंदूक छीन ली और गोली चलाई, जिसके बाद पुलिस ने आत्मरक्षा में गोलीबारी की। मजिस्ट्रेट ने हिरासत में मौत के मामलों में न्यायिक जांच के प्रावधानों के तहत जांच की और रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंपी। रिपोर्ट में मजिस्ट्रेट ने कहा कि आरोपी के पिता की ओर से लगाए गए आरोपों में तथ्य यह है कि यह एक फर्जी मुठभेड़ थी। उन्होंने पुलिसकर्मियों के आत्मरक्षा के दावे पर भी शक जताया। रिपोर्ट में पांच पुलिसकर्मियों को आरोपी की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। 

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वकील देसाई ने दलील दी कि इस घटना के बाद एक आकस्मिक मौत की रिपोर्ट दर्ज की गई थी और राज्य का अपराध जांच विभाग (सीआईडी) शिंदे की मौत की जांच कर रही है। कोर्ट ने पूछा कि क्या केवल आकस्मिक मौत की रिपोर्ट के आधार पर जांच की जा सकती है। कोर्ट ने सवाल किया, हम प्राथमिकी को लेकर चिंतित हैं। वह कहां है? क्या आकस्मिक मौत की रिपोर्ट को प्राथमिकी माना जाता है? हम समझते हैं कि पहले आकस्मिक मौत की रिपोर्ट दर्ज की जाती है, लेकिन जब बाद में यह पता चलता है कि यह एक आकस्मिक या स्वाभाविक मौत नहीं बल्कि हत्या थी, तो क्या प्राथमिकी नहीं दर्ज की जानी चाहिए?
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इसके बाद हाईकोर्ट ने यह भी पूछा कि सीआईडी अपनी जांच पूरी करेन के बाद क्या करने की योजना बना रही है। देसाई ने कहा, जांच पूरी होने के बाद सीआईडी अपनी अंतिम रिपोर्ट दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के अनुसार दाखिल करेगी। यह या तो क्लोजर रिपोर्ट हो सकती है या आरोपपत्र। 

कोर्ट की ओर से नियुक्त वरिष्ठ वकील मंजुला राव ने कहा कि जब मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट में यह कहा गया कि यह एक अप्राकृतिक मौत थी, तो प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए थी। पुलिस ने दावा किया था कि अक्षय शिंद ने पुलिस वाहन में एक पुलिसकर्मी से बंदूक छीन ली थी और गोली चलाई थी। फिर पुलिस की जवाबी गोलीबारी में मारा गया। इस मुठभेड़ के दौरान वरिष्ठ निरीक्षक संजय शिंदे, सहायक पुलिस निरीक्षक निलेश मोरे, दो कांस्टेबल और पुलिस वाहन चालक भी वाहन में मौजूद थे।

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