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गुनाह-ए-बलात्कार : सख्त होते रहे कानून लेकिन जांच पड़ती रही कमजोर..

Sun, 22 Apr 2018 04:16 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कठुआ, उन्नाव और सूरत जैसे मामलों पर मोदी सरकार लगातार घिर रही थी। बच्चियों के साथ बलात्कार की खबरें सामने आने के बाद सरकार पर बलात्कारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का दबाव बन रहा था। जिसके बाद शनिवार को प्रधानमंत्री आवास पर हुई केंद्रीय मंत्रीमंडल की बैठक में 0-12 साल की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों को सजा-ए-मौत देने वाले अध्यादेश को मंजूरी मिल गई । 
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इस अध्यादेश को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंजूरी दे दी है। नए अध्यादेश में दो महीने में बलात्कार के मामलों की जांच की जा सकती है और उसी अवधि में परीक्षण निष्कर्ष निकाला जा सकता है। साथ ही नई फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं और फास्ट ट्रैक कोर्टों को जोड़ा जाएगा। 

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सरकारों ने रेप के मामलों में कानून तो लगातार सख्त किया है, लेकिन देश में ऐसे मामलों में जांच और ट्रायल की लचर प्रक्रिया की वजह से बहुत कम ही मामलों में गुनहगार सलाखों के पीछे पहुंच पाते हैं। ऐसे केस में दोष सिद्धि भी पिछले दशकों की तुलना में अब घटकर सिर्फ 25 फीसदी के आसपास ही रह गई है। 
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देश में रेप के मामलों में दोष सिद्धि की दर कुछ विकसित देशों से ज्यादा है। ब्रिटेन में 2011-12 में 7 फीसदी, स्वीडन में 10 फीसदी और फ्रांस में 25 फीसदी रेप के मामलों में ही आरोपियों का दोष साबित हो पाया था। 


 

POCSO बढ़ाएगा बच्चों की परेशानी

'महिलाओं के लिए दिल्ली कमीशन की अध्यक्षत स्वाती मालिवाल ने शनिवार को संवाददाताओं से कहा कि वह विवादास्पद बलात्कार पर सरकार की निष्क्रियता का विरोध करने के लिए आयोजित नौ दिन की भूख हड़ताल खत्म कर देंगी। पूरा देश गुस्से में था, और ऐसा नहीं हो सकता कि केंद्र सरकार हमारी बात नहीं सुनती है।'

स्वाती मालिवाल ने कहा कि वह सरकार के कदम पर खुश हैं लेकिन कहा कि पुलिस को अभी भी अधिक जवाबदेही और संसाधनों की जरूरत है। लेकिन अन्य ने अध्यादेश की आलोचना की और तर्क दिया कि मृत्युदंड की संभावना एक निवारक के रूप में कार्य नहीं करेगी और भारत को बलात्कार और बाल यौन शोषण के मामलों के लिए अभियोजन पक्ष और सजा दर में सुधार करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के वकील करुणा नंदी का कहना है कि 2013 में भारतीय कानून के तहत अपराध के लिए मौत की सजा के बाद बलात्कार की दर में कमी नहीं आई है।

उधर एक कानूनी शोधकर्ता स्वागता राह का कहना है कि बाल संरक्षण अधिनियम के तहत मृत्युदंड बच्चों को आगे आने और यौन दुर्व्यवहार का खुलासा करना मुश्किल कर देगा क्योंकि देश के 94 प्रतिशत अपराधी पीड़ित के रिश्तेदार हैं। स्वागता बैंगलोर में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर चाइल्ड एंड द लॉ पर शोध कर रहे हैं। 

2012 : रेप के मामलों में राज्यों में दोष सिद्धि की दर

- फोटो : SELF


मिजोरम                 82.4 फीसदी

नगालैंड                  72.1 फीसदी

सिक्किम                 50 फीसदी

मेघालय                   46.7 फीसदी

यूपी                        50.3 फीसदी

उत्तराखंड                  63 फीसदी

जम्मू-कश्मीर            7.5 फीसदी

गोवा                        8.3 फीसदी

अरुणाचल प्रदेश        10 फीसदी

पश्चिम बंगाल            10.9 फीसदी

आंध्र प्रदेश               11.2 फीसदी

त्रिपुरा                     14.7 फीसदी

तमिलनाडु               20.1 फीसदी

ओडिशा                   21.3 फीसदी

(नोट : इसी साल दिल्ली में निर्भया सामूहिक दुष्कर्म मामला हुआ था।)
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कुछ देशों से ज्यादा है दोष सिद्धि की दर

देश में रेप के मामलों में दोष सिद्धि की दर कुछ विकसित देशों से ज्यादा है। ब्रिटेन में 2011-12 में 7 फीसदी, स्वीडन में 10 फीसदी और फ्रांस में 25 फीसदी रेप के मामलों में ही आरोपियों का दोष साबित हो पाया था।
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