राज्य सरकार की मुश्किलें
प्रदेश की भाजपा सरकार के लिए यह परेशान करने वाला घटनाक्रम हो सकता है। क्योंकि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री ब्राह्मण समाज से है। ब्राह्मण महाराष्ट्र की जनसंख्या में सिर्फ तीन से साढ़े तीन फीसदी हैं। वहीं राज्य में मराठों की आबादी लगभग 30 फीसदी है। इतनी बड़ी आबादी को नाराज कर सत्ता में बने रह पाना या अगले साल होने वाले चुनाव में दोबारा सत्ता पर काबिज होना भाजपा सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।
वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट की ने आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमारेखा तय कर रखी है। जिसके पार जाकर मराठों को आरक्षण देना भी संभव नहीं है। ओबीसी के लिए निर्धारित 27 फीसदी कोटे में ही मराठों को शामिल करने का जोखिम अगर सरकार उठाती है तो उस स्थिति में एक अलग ओबीसी आंदोलन शुरू हो सकता है। ओबीसी वर्ग आरक्षण में किसी तरह के बदलाव के खिलाफ है।
बीते कुछ दिनों में मराठा आरक्षण का मुद्दा फिर से गरमा गया। महाराष्ट्र में तुलजापुर, बुलढाणा, अकोला, परली और वाशिम में भी बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। राज्य के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़णवीस भी मुश्किलों में घिर गए हैं। मराठा आंदोलन के चलते इस बार देवेंद्र फड़णवीस शासकीय पूजा के लिए पंढरपुर नहीं पहुंचे। परंपरा के मुताबिक राज्य के मुख्यमंत्री हर साल अपनी पत्नी के साथ पंढरपुर जाते हैं और पहली पूजा में शामिल होते हैं।
सोमवार को मुख्यमंत्री ने ट्वीट कर बताया था, "किसी कारण से इस बार मैं पंढरपुर जा कर पूजा नहीं कर पाया। मैंने अपने परिवार समेत अपने घर पर ही पूजा की है।"