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क्यों सुलग रहा है महाराष्ट्र, ये है मराठा आरक्षण आंदोलन की असली वजह

Wed, 25 Jul 2018 05:06 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
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Maratha Agitation - फोटो : PTI
महाराष्ट्र की राजनीति में खासा प्रभाव रखने वाला मराठा समुदाय एक बार फिर आरक्षण की मांग कर रहा है। दो साल पहले मूक मोर्चा निकाल कर सरकार तक अपनी बात पहुंचाने वाले मराठा समुदाय ने इस बार आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। 

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन की आग में जल रहा है। मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई और महाराष्ट्र के कई अन्य इलाकों में मराठा आरक्षण की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन किए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों के पथराव में एक सिपाही की मौत हो गई जबकि नौ अन्य जख्मी हो गए।  मुंबई में सुबह कई जगहों पर बेस्ट बसों पर पथराव किया गया। कुछ लोगों के घायल होने की भी खबर है। इस हिंसक प्रदर्शन को देखते हुए मराठा क्रांति मोर्चा ने मुंबई बंद वापस ले लिया है। लेकिन नवी मुंबई और ठाणे में बंद जारी रहेगा।

मराठा आरक्षण का मामला कोर्ट में विचाराधीन है। इस वजह से सरकार के हाथ बंधे हुए हैं और वह आंदोलनकारियों को आरक्षण पर केवल आश्वासन दे रही है। लेकिन आंदोलनकारी एक दिन में अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं। 
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मराठा आंदोलन की असली वजह

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ये हैं मराठा आरक्षण आंदोलन की असली वजह

मराठा समुदाय अपेक्षाकृत तौर पर संपन्न लगता है। ऐसे में यह सवाल अहम है कि उन्हें आरक्षण की जरूरत क्यों महसूस हुई? महाराष्ट्र के बाहर लोगों को यह मांग चौंकाने वाली और राजनीति से प्रेरित लग सकती है। लेकिन इसके पीछे मुख्य वजह मराठा समुदाय का असंतुलित विकास है। 

साल 1990 के बाद ग्लोबलाइजेशन का दौर आया। इस दौर में खेती के समस्याएं और उसके सवाल बहुत उग्र रूप में सामने आए हैं। महाराष्ट्र में मराठा समुदाय की आबादी लगभग 30 फीसदी है यानी करीब 4 करोड़ लोग। आंकड़ों के मुताबिक इनमें से 90 से 95 फीसदी लोग भूमिहीन किसान हैं। वे असिंचित भूमि पर खेती करते हैं और उनका दैनिक जीवन बहुत दर्दनाक है। ये भूमिहीन किसान भयंकर गरीबी की मार झेल रहे हैं। 

खेती का सवाल मराठा समुदाय के लिए जीने मरने का प्रश्न बन गया है। महाराष्ट्र में खुदकुशी करने वाले किसानों में से 90 फीसदी मराठा समुदाय से हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि आत्महत्या की घटनाओं को सभी किसानों की आत्महत्या बताते हैं। यह कोई नहीं कहता कि मराठा किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि व्यवसाय से जुड़े कई मराठा किसान खेती में नुकसान, फसलों के दाम में कमी और ब्याज के बढ़ते बोझ के चलते मौत को गले लगा चुके हैं। 

मराठा समुदाय का एक छोटा तबका ही सत्ता और समाज में ऊंची पैठ रखता है। मराठों की शिकायत है कि सत्ता में मराठा हो या गैर मराठा, समुदाय के प्रश्नों और समस्याओं की ओर कोई ध्यान नहीं देता। समाज का बड़ा तबका शैक्षिक और आर्थिक रूप से अब तक पिछड़ा है। समुदाय के अधिकतर लोग अपने बच्चों की शिक्षा का खर्च भी वहन नहीं कर पाते। पढ़ाई के लिए खेत गिरवी रखना या कर्ज लेना आम है। 

ज्यादातर आंदोलनकारी असमान विकास से प्रभावित हैं। मराठा समुदाय की शिकायत है कि चूंकि वे सामान्य वर्ग में शामिल हैं इसलिए उन्हें नौकरी भी नहीं मिलती। नौकरशाही में आईएएस, आईपीएस की नौकरियों में भी मराठा समुदाय के लोगों की मौजूदगी न के बराबर है। न्यायिक सेवा हो या कॉरपोर्ट क्षेत्र वहां भी मराठा समुदाय का प्रतिनिधित्व नगण्य है। मराठा समुदाय के आंदोलकारी मानते हैं कि कुछ नेताओं के मंत्री और मुख्यमंत्री बन जाने से समुदाय समृद्ध नहीं हो जाता। कृषि क्षेत्र में संकट ने मराठा असंतोष की पृष्ठभूमि तैयार की है। 
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आंदोलन उग्र होने की वजह

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- फोटो : PTI
क्यों उग्र हो गया मराठा आंदोलन

इस हफ्ते मराठा आंदोलन ने अचानक तेजी पकड़ ली और उग्र रूप धारण कर लिया। इसके पीछे की वजह प्रदेश सरकार का वह एलान है जिसमें कहा गया कि राज्य में जल्द ही 72 हजार सरकारी नौकरियों की घोषणा हो सकती है। मराठा समुदाय चाहता है कि इस भर्ती अभियान के पहले उनको आरक्षण मिल जाना चाहिए ताकि उनके समुदाय को किसी प्रकार का नुकसान ना हो। 

मराठा आंदोलन की जड़ें

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एक दशक पुराना है मराठा आंदोलन

मराठा आंदोलन की शुरुआत करीब एक दशक पहले हो चुकी थी। समुदाय के लिए आरक्षण की मांग भी करीब 10 वर्षों से हो रही है। साल 2014 में कांग्रेस-एनसीपी की सरकार ने मराठा समुदाय को नौकरियों और शिक्षण संस्थानों मे 16 फीसदी आरक्षण दिया था। 

लेकिन हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के निर्णय पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि कुल आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती और इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि मराठा समुदाय आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ेपन का शिकार है। कोर्ट ने पिछड़ा वर्ग आयोग से मराठा समाज की आर्थिक-सामाजिक स्थिति पर रिपोर्ट मांगी है, जिसके बाद ही मराठा आरक्षण पर कोई फैसला संभव है। 
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फड़णवीस सरकार की मुश्किलें

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- फोटो : PTI
राज्य सरकार की मुश्किलें

प्रदेश की भाजपा सरकार के लिए यह परेशान करने वाला घटनाक्रम हो सकता है। क्योंकि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री ब्राह्मण समाज से है। ब्राह्मण महाराष्ट्र की जनसंख्या में सिर्फ तीन से साढ़े तीन फीसदी हैं। वहीं राज्य में मराठों की आबादी लगभग 30 फीसदी है। इतनी बड़ी आबादी को नाराज कर सत्ता में बने रह पाना या अगले साल होने वाले चुनाव में दोबारा सत्ता पर काबिज होना भाजपा सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। 

वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट की ने आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमारेखा तय कर रखी है। जिसके पार जाकर मराठों को आरक्षण देना भी संभव नहीं है। ओबीसी के लिए निर्धारित 27 फीसदी कोटे में ही मराठों को शामिल करने का जोखिम अगर सरकार उठाती है तो उस स्थिति में एक अलग ओबीसी आंदोलन शुरू हो सकता है। ओबीसी वर्ग आरक्षण में किसी तरह के बदलाव के खिलाफ है। 

बीते कुछ दिनों में मराठा आरक्षण का मुद्दा फिर से गरमा गया। महाराष्ट्र में तुलजापुर, बुलढाणा, अकोला, परली और वाशिम में भी बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। राज्य के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़णवीस भी मुश्किलों में घिर गए हैं। मराठा आंदोलन के चलते इस बार देवेंद्र फड़णवीस शासकीय पूजा के लिए पंढरपुर नहीं पहुंचे। परंपरा के मुताबिक राज्य के मुख्यमंत्री हर साल अपनी पत्नी के साथ पंढरपुर जाते हैं और पहली पूजा में शामिल होते हैं। 

सोमवार को मुख्यमंत्री ने ट्वीट कर बताया था, "किसी कारण से इस बार मैं पंढरपुर जा कर पूजा नहीं कर पाया। मैंने अपने परिवार समेत अपने घर पर ही पूजा की है।" 
 

 
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