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मुसलमानों के लिए क्यों खास है जुमे की नमाज

Tue, 08 May 2018 06:21 PM IST
बीबीसी हिंदी
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फाइल फोटो
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हरियाणा के गुड़गांव में बीते कुछ दिनों से खुलेआम नमाज़ पढ़ने को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। इसकी शुरुआत कुछ सप्ताह पहले शुक्रवार के दिन सार्वजनिक जगह पर जुमे की नमाज़ से शुरू हुई थी। एक हिंदूवादी संगठन 'हिंदू संघर्ष समिति' ने खुले में नमाज़ पढ़ रहे लोगों को वहां से हटा दिया था। इसके बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने सार्वजनिक जगहों पर नमाज़ पढ़ने को लेकर प्रतिक्रिया दी है। 

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उन्होंने कहा है कि नमाज़ केवल मस्जिदों और ईदगाहों में ही पढ़ी जानी चाहिए। मुख्यमंत्री के इस बयान का 'हिंदू संघर्ष समिति' ने स्वागत किया है।यह संगठन खुले में नमाज़ पढ़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहा है और इसने हाल में इसको लेकर प्रदर्शन भी किया है।

इस्लाम और नमाज़
मुसलमान होने की बुनियाद ही ये है कि कोई शख़्स अल्लाह को मानता हो और नमाज़ पढ़ता हो। इस्लाम में पांचों वक्त की नमाज़ पढ़ना ज़रूरी ही ज़रूरी है और इसको बिलकुल भी छोड़ा नहीं जा सकता है।सफर में भी एक मुसलमान को नमाज़ पढ़ना ज़रूरी होता है लेकिन इस दौरान नमाज़ पढ़ने की प्रक्रिया छोटी कर दी जाती है। मसलन की सामान्य तौर पर नमाज़ पढ़ने के लिए जितना समय लगता है, सफ़र में वह आधा हो जाता है। नमाज़ पढ़ने के लिए किसी शख़्स का पाक (शरीर से लेकर कपड़े तक पर गंदगी न हो) होना ज़रूरी है। साथ ही जिस जगह पर वह नमाज़ पढ़े वो भी पाक हो।

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क्या हर जगह पढ़ी जा सकती है नमाज़?

एक मुसलमान कहीं भी नमाज़ पढ़ सकता है। बस उसकी शर्त है कि वो जगह पाक-साफ़ हो। क्या ऐसी जगह है जहां इस्लाम नमाज़ पढ़ने के लिए रोकता है? इस सवाल पर इस्लाम के विद्वान मौलान अब्दुल हमीद नौमानी कहते हैं, "शरीयत (इस्लामी क़ानून) के हिसाब से पूरी ज़मीन पाक है और कोई शख़्स कहीं भी नमाज़ पढ़ सकता है।"

वह आगे कहते हैं, "अगर कोई ज़मीन छीनी हुई है और अवैध रूप से कब्ज़ा की हुई है तो उस पर नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती है लेकिन कोई सरकारी ज़मीन है और उस पर किसी का कब्ज़ा नहीं है तो वहां नमाज़ हो सकती है। उस ज़मीन का साफ़ होना ज़रूरी है।"

क्या इस्लाम किसी दूसरे इंसान की ज़मीन पर उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ नमाज़ पढ़ने की अनुमति देता है? इस सवाल पर नौमानी कहते हैं कि अगर ज़मीन के मालिक ने मना कर दिया तो शरीयत के अनुसार उस जगह पर नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती है।

सरकारी ज़मीन पर क्या नमाज़ पढ़ी जा सकती है?
इस पर वह आगे कहते हैं कि सरकारी जगह या पहले से किसी जगह पर नमाज़ पढ़ी जा रही है तो वहां नमाज़ हो सकती है।

जुमा क्यों है अलग?
इस्लाम में दिन में पांच वक्त की नमाज़ पढ़ना ज़रूरी है। इनको पांच वक़्तों में बांटा जाता है। सुबह की नमाज़ को फ़जर, दोपहर की नमाज़ को ज़ोहर, शाम से पहले असर, शाम के वक्त को मग़रिब और आधी रात से पहले पढ़ी जाने वाली नमाज़ को इशा की नमाज़ कहा जाता है।

मगर इन पांचों नमाज़ों में शुक्रवार के दिन तब्दीली होती है। इस्लाम में शुक्रवार (जुमे) के दिन की ख़ासी अहमियत है। इस दिन को एक-दूसरे के साथ जुड़ने का दिन बताया गया है ताकि लोग एकता दिखा सकें। इस वजह से शुक्रवार के दिन दोपहर की नमाज़ के वक्त जोहर की नमाज़ की जगह जुमे की नमाज़ होती है।

जुमे की नमाज़ अगर कोई नहीं पढ़ पाता है तो उसे ज़ोहर की नमाज़ पढ़ना चाहिए। जुमे की नमाज़ की शर्त यह भी होती है कि ये एकसाथ मिल-जुलकर पढ़ी जाती है। इसे अकेले नहीं पढ़ा जा सकता है। इस नमाज़ के दौरान ख़ुतबा (धार्मिक उपदेश) होता है।
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अगर कोई शख़्स जुमा न पढ़ पाए तो?

इस सवाल पर नौमानी कहते हैं कि कोई जुमे की नमाज़ नहीं पढ़ पाता है तो उसको ज़ोहर की नमाज़ पढ़ना ज़रूरी है क्योंकि इस्लाम में नमाज़ छोड़ी नहीं जा सकती है।

जुमे के दिन लगने वाली भीड़ की वजह क्या है?
इस पर वह कहते हैं कि जुमे के दिन की अहमियत काफी होती है, इस वजह से लोग नमाज़ पढ़ने आते हैं और भीड़ मस्जिद से बढ़कर सड़क तक आ जाती है और यह थोड़े समय के लिए ही होता है।

सरकार के मना करने पर शरीयत नमाज़ को लेकर क्या कहती है?
नौमानी कहते हैं कि कोई बादशाह पूरी जनता का बादशाह होता है इसलिए उस पर यह फ़र्ज़ है कि वह उनको धार्मिक जगह मुहैया कराए और सबके साथ बराबर सुलूक करे। अगर कोई जायज़ वजह हो तो उसके लिए भी शरीयत में उपाय है लेकिन गुरुग्राम जैसे जगहों पर नमाज़ पढ़ने से रोकना मामला राजनीति से प्रेरित है। वह कहते हैं कि अगर कोई कानून व्यवस्था का मसला हो तो नमाज़ को खुले में पढ़ने से रोका जा सकता है, अगर ऐसा नहीं है तो इस पर रोक नहीं लगाई जा सकती है।
 
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