नोटबंदी के फैसले के बाद आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल, वित्त सचिव अशोक लवासा और बैंकिंग सचिव अंजुलि छिब दुग्गल की गहरी चुप्पी से शेयर और करेंसी मार्केट चिंतित हैं। कारोबारियों और उद्योगपतियों में इस बात को लेकर हताशा है कि अब तक सरकार की ओर से उन्हें भरोसा दिलाने वाली कोई बात क्यों नहीं कही गई।
विशेषज्ञों के मुताबिक भ्रम की स्थिति की वजह से बाजार में अस्थिरता है। 8 नवंबर को नोटबंदी के फैसले से पहले सेंसेक्स 27,600 पर था लेकिन दस कारोबारी सत्रों में ही लुढ़क कर 25,700 पर पहुंच गया। ऐसे वक्त में आरबीआई गवर्नर, वित्त, बैंकिंग सचिव और वित्तीय और मौद्रिक व्यवस्था का नियमन करने वाली संस्थाओं के कर्ता-धर्ताओं को निवेशकों का डर दूर करने लिए कुछ बोलना चाहिए था।
हालांकि वित्त मंत्री ने थोड़ी कोशिश की और उनके साथ आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास भी ऐसी पहल करते दिखे। लेकिन ऐसा लग रहा था कि वही दोनों आरबीआई और अन्य वित्तीय संस्थानों की ओर से बोल रहे हों।
बाजार के विशेषज्ञों के मुताबिक आरबीआई काफी हद तक एक स्वतंत्र नियामक है, जिसका निवेशकों की धारणाओं पर असर पड़ता है। इसी तरह बाजार में वित्त और बैंकिंग सचिवों के बयानों को भी काफी तवज्जो दी जाती है।