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नॉर्वे में क्यों मुश्किल में पड़ते हैं भारतीय मां-बाप?

Thu, 09 Feb 2017 11:01 AM IST
सुदीपा चक्रवर्ती, बीबीसी
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नॉर्वे में 2008 से 2015 के बीच भारतीय महिलाओं के 20 नवजात बच्चों को देखभाल के लिए नॉर्वे चाइल्ड वेलफेयर सर्विस (एनसीडब्ल्यूएस) ने अपने कब्जे में लिया। इसके अलावा 13 बच्चों को अपने माता पिता के घर से बाहर रखना पड़ा। एनसीडब्ल्यूएस के मुताबिक अगर अपने ही घर में बच्चों पर किसी तरह का खतरा हो तो स्थानीय नगर निगम की चाइल्ड वेलफेयर सर्विस पैरेंट्स की अनुमति के बिना भी बच्चों को अपने अधिकार में ले सकती है।
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पिछले साल 13 दिसंबर को इसी तरह के प्रावधानों के चलते करीब पांच साल के आर्यन को अधिकारियों ने अपने कब्जे में ले लिया। आर्यन के पिता नॉर्वे के हैं, लेकिन मां भारतीय नागरिक हैं। इस मामले स्थानीय अधिकारियों को शिकायत मिली थी कि माता पिता बच्चे की पिटाई करते हैं। इस शिकायत के बाद स्थानीय अधिकारियों ने बच्चे के केजी क्लास का दौरा किया और उसे अपने माता पिता के घर से दूर रखने का फैसला लिया।

क्या है नॉर्वे का कायदा?

इस घटना के दो महीने पूरे होने वाले हैं, लेकिन परिवार की लगातार कोशिशों और भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के दखल के बाद भी परिवार को बच्चा नहीं सौंपा गया है। परिवार को प्रत्येक दो सप्ताह में एक बार बच्चे को देखने का मौका मिल पाता है, जबकि जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक बच्चा अपने घर लौटना चाहता है और उसे अपने मां बाप की कमी खल रही है।

नॉर्वे चाइल्ड वेलफेयर सर्विस के तरह डायरेक्टरेट फॉर चिल्ड्रेन, यूथ एंड फैमिली अफेयर्स की उप महानिदेशक क्रिस्टीन यू स्टेनरेम के मुताबिक नॉर्वे में बच्चों के साथ किसी तरह की हिंसा को सहन नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया, "नॉर्वे में बच्चों और उनके अधिकारों के प्रति स्पष्ट कानून है और बच्चों के साथ किसी तरह की हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाता।
 

जब बच्चों को पैरेंट्स से अलग रखने में काफी मुश्किल हुई है

ऐसे मामले भी आए हैं जब बच्चों को पैरेंट्स से अलग रखने में काफी मुश्किल हुई है लेकिन इस बात के लिए कड़े कानून हैं कि बच्चों को माता पिता से अलग रखना है। इसको अदालत में चुनौती दी जा सकती है।" वैसे जानकारों के मुताबिक एनसीडब्ल्यूएस को दुनिया के दूसरे देशों की संस्कृति के बारे में जानकारी नहीं है, कई मामलों पारदर्शिता और विदेशी संस्कृति के बारे में जानकारी से चीजें आसान हो सकती हैं।

कितना संतुलित है कानून?

ऐसे कई मामलों में पैरेंट्स की ओर से अदालत में पक्ष रखने वाले वकील मैग्ने ब्रून कहते हैं, "नॉर्वे में बच्चों की सुरक्षा को लेकर संतुलित कानून है, लेकिन कई बार और कुछ मामलों में मुश्किलें इस कानून को लागू करने के ढंग से होती हैं।"

लोगों को विदेशी संस्कृति और उनके द्वारा बच्चों के लालन पालन के तौर तरीकों के बारे में पता नहीं होता

उनके मुताबिक कई मामलों में मुश्किलें इसलिए होती हैं क्योंकि नॉर्वे की चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज के लोगों को विदेशी संस्कृति और उनके द्वारा बच्चों के लालन पालन के तौर तरीकों के बारे में पता नहीं होता है। ब्रून कहते हैं, "अधिकारी विदेशी परिवारों का भरोसा हासिल नहीं कर पाते। इससे उन परिवारों के प्रति भेदभाव जैसी स्थिति बन जाती है। विश्वास और संवाद में कमी के चलते परिवार डर भी जाते हैं और सच बताने से बचते हैं।"

2011 में सागरिका और अनुरूप भट्टाचार्य के दोनों बच्चे (तीन साल के अभिज्ञान और एक साल के ऐश्वर्या) को देखभाल के लिए अधिकारियों ने अपने पास रख लिया था।
दो महीने तक जांच अधिकारी हर रोज सागरिका के घर आते रहे थे। उस अनुभव के बारे में सागरिका कहती हैं, "उनके पूछताछ के तौर तरीकों से काफी गलतफहमियां बन गई थीं, वे हमारी संस्कृति के नजरिए से चीजों को नहीं देख रहे थे। जो भी मैं कहती है, उसे वे निगेटिव नजरिए से देखते।" 

हम लोगों के बीच संवाद सही से हो और भरोसा उत्पन्न हो सके।

सागरिका आगे कहती हैं, "मैं तब नॉर्वे की भाषा नहीं बोल पाती थीं, थोड़ा बहुत समझ सकती थी। दोनों जांच अधिकारियों को हमारी संस्कृति के बारे में कुछ जानकारी नहीं थी। कई मौकों पर मुझे दुभाषिए या विशेषज्ञ की जरूरत महसूस होने लगी थी, ताकि हम लोगों के बीच संवाद सही से हो और भरोसा उत्पन्न हो सके।"

संस्कृति का अंतर

2011 में भट्टाचार्य का मामले की वकील रही सुरन्या अय्यर कहती हैं, "नॉर्वे में वैसे किसी भी व्यवहार को ये सबूत मान लिया जाता है कि आप पैरेंटिंग सही नहीं कर रहे हैं। 80 फीसदी मामलों में बच्चों को इसलिए अलग रखा जाता है कि क्योंकि अधिकारियों के मुताबिक माता पिता को सही पैरेंटिंग करने नहीं आता।" सुरन्या आगे कहती हैं, "ऐसा दूसरे देश की संस्कृति की समझ नहीं होने से होता है, जैसे बाहर से आए परिवारों मे बच्चों को अपने बेड पर सुलाने और चम्मच और हाथ से बच्चों को खिलाने की संस्कृति रही है लेकिन यहां ये सब चलन में नहीं है। अधिकारी इन सब बातों को नोट करते हैं। ये सब बातें यहां पैरेंट्स के खिलाफ जाती हैं।"
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भारत में बच्चों को मां-बाप की संपत्ति माना जाता है

हालांकि हाल के दिनों में नॉर्वे की चाइल्स वेलफेयर सर्विसेज ने दुभाषियों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की कोशिश की है। क्रिस्टीन यू स्टेनरेम कहती हैं कि अभी और विशेषज्ञों को रखने की जरूरत है। वहीं भारत और पाकिस्तान के कई परिवारों के लिए दूभाषिए के तौर पर काम करने वाली पत्रकार सरोज चुम्बर के मुताबिक नॉर्वे में आने वाले लोगों को ये सीखना चाहिए कि वे अपने बच्चे पर हाथ नहीं उठा सकते।

सरोज कहती हैं, "जिस तरह से वे नॉर्वे की भाषा सीखते हैं, उसी तरह से उन्हें नॉर्वे में बच्चों के अधिकारों के बारे में जानना चाहिए।"नॉर्वे के एक प्रमुख समाचार पत्र में काम करने वाली माला वांग नवीन कहती हैं, "भारत में बच्चों को मां-बाप की संपत्ति माना जाता है, जबकि नॉर्वे में उन्हें अलग अपने अधिकारों से युक्त नागरिक माना जाता है। मेरी समझ से इसी अंतर के चलते ऐसी मुश्किलें देखने को मिलती हैं।"
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