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सीरिया मिसाइल हमले पर चुप क्यों है भारत?

Mon, 16 Apr 2018 02:14 PM IST
बीबीसी, हिंदी
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अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने सयुंक्त रूप से शनिवार की सुबह सीरिया में कई जगहों पर मिसाइल हमलों को अंजाम दिया है। ये हमला सीरिया में बीते हफ़्ते हुए रासायनिक हमले की प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया है।
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सीरिया ने इस हवाई हमले को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का घोर उल्लंघन बताया है। वहीं, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस हवाई हमले को उकसावे की कार्रवाई बताया है। रूस और ईरान ने इस हमले के नतीजे सामने आने की चेतावनी दी है।

रूस-अमेरिका में तनाव बढ़ा तो भारत कहां जाएगा?
दुनिया के ताकतवर मुल्क इस मुद्दे पर दो धड़ों में बंटते दिख रहे हैं। एक ओर रूस, ईरान और सीरिया ने इस हमले का विरोध किया है। वहीं, दूसरी ओर जर्मनी, इसराइल, कनाडा, तुर्की, और यूरोपीय संघ ने अमेरिका के इस कदम का स्वागत किया है।
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लेकिन, भारत सरकार की ओर से अब तक इस ताजा घटनाक्रम पर किसी तरह की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। जबकि भारत के दोनों पक्षों के साथ करीबी संबंध हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर इन दोनों गुटों में तनाव बढ़ता है तो भारत किस ओर खड़ा दिखाई देगा।

मध्य-पूर्व मामलों के जानकार कमर आगा कहते हैं, "अगर इन मुल्कों के बीच तनाव आगे बढ़ता है तो भारत के लिए स्थिति बेहद जटिल हो जाएगी। एक तरफ अमेरिका और ब्रिटेन है जिनसे हमारे आज ही नहीं बेहद पुराने संबंध हैं। दूसरी तरफ रूस है जिसके साथ भी हमारे पुराने संबंध हैं और रूस ने हमारा खुलकर साथ भी दिया है। लेकिन अगर बदलते हुए परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इस समय भारत के संबंध पश्चिमी देशों से अच्छे बने हुए हैं। ये तय है कि भारत जंग नहीं चाहेगा, यूएन के रास्ते चलने की बात करेगा।"

वह आगे बताते हैं, "भारत जंग कभी नहीं चाहेगा क्योंकि इससे तेल महंगा होता है जिसका सीधा असर इसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इसके साथ ही मध्य-पूर्व भारत के बेहद करीब है, यह कभी नहीं चाहेगा कि वहां अस्थिरता बढ़े। 85 लाख भारतीय वहां काम करते हैं, इस क्षेत्र में भारत का व्यापार बेहद बड़ा है। ऐसे में भारत चाहेगा कि बातचीत से ही मामला सुलझ जाए।"

भारत को इस चुप्पी से क्या मिलेगा?
अमेरिका ने इससे पहले यूएन की अनुमति के बिना ही इराक पर भी हमला बोला था। उस दौरान भी भारत ने अमेरिका के पक्ष या विपक्ष में कुछ नहीं बोला था।लेकिन इतिहास में थोड़ा और पीछे जाएं तो पता चलता है कि जवाहरलाल नेहरू के दौर में भारत सैद्धांतिक रूप से अपनी बात रखने में आगे हुआ करता था।

रक्षा मामलों के जानकार सुशांत सरीन बताते हैं, "भारत ने बीते 20 सालों में चीन, रूस और अमेरिका के बीच संबंधों में रणनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश की है। क्योंकि अमेरिका के साथ बढ़ती दोस्ती के बाद भी भारत, रूस को नहीं छोड़ सकता है। इसकी वजह ये है कि रूस हमें रक्षा संबंधी मदद करता है। जैसे रूस अपनी न्युक्लियर सबमरीन और विशेष विमान देता है। अमेरिका ये सब नहीं देता है।"

"भारत के साथ एक व्यावहारिक समस्या ये है कि भारत का सैन्य साजोसामान अभी भी 70 फीसदी रूस में बना हुआ है। अगर भारत इस पर कोई रुख अख़्तियार करता है तो इन सैन्य साजो-सामान के पार्ट्स और गोला-बारूद की एक विकट समस्या खड़ी हो सकती है। अमेरिका के खिलाफ भारत का, खासतौर पर मोदी सरकार के दौर में, किसी तरह की पोजिशन लेने का सवाल ही खड़ा नहीं होता।"

क्या ये ख़ास विदेश नीति मोदी सरकार की देन है?
भारत की विदेश नीति के इतिहास को देखें तो एक समय ऐसा भी आया है जब भारत कमजोर देशों के पक्ष में खड़ा होता दिखाई देता रहा है। कभी भारत के शहरों-कस्बों में फलस्तीन दिवस मनाकर फलस्तीन क्षेत्र में रहने वाले लोगों के साथ एकजुटता दिखाई जाती है।

जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सोहराब बताते हैं, "भारत की विदेश नीति में बुनियादी तब्दीली आई है। भारत की वर्तमान हुकूमत इसराइल के साथ है। भारत ने ये मान लिया है कि अब इस क्षेत्र से कोई सियासी मुद्दे से कोई मतलब नहीं है। बस कॉमर्शियल रिश्तों को आगे बढ़ाना है। इसीलिए ये किसी भी मसले पर कोई स्टैंड नहीं ले रहा है। भारत उसूल की बात भी करता है कि किसी भी मुल्क की सरकार को बाहरी ताकत द्वारा बदला नहीं जाना चाहिए। लेकिन भारत के सामने ये सवाल ये भी है अगर कोई सरकार अपनी जनता की हिफ़ाजत नहीं कर सकती है, उनके मानव अधिकारों को सुरक्षित नहीं रख सकती है तो ऐसी स्थिति में क्या ये उसूल ठीक हैं?"

"एक समय ऐसा होता था जब भारत एक ताकतवर मुल्क नहीं था तब भारत तीसरी दुनिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिकी देशों का नायक था। इसके बदले में भारत को इन देशों से बहुत राजनीतिक समर्थन मिला। लेकिन अब जब भारत सुपरपॉवर बन चुका है तब भारत इसराइल का पिछलग्गू बना हुआ है।"

हालांकि, रक्षा मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सरीन इस बात से सहमत नजर नहीं आते कि भारत की नीति में ये आमूलचूल बदलाव मौजूदा सरकार के समय में आया है।सरीन कहते हैं कि भारत ने हमेशा ही अपने हितों को तरजीह दी है, नेहरू सरकार के दौर में भी ऐसे कई वाकये आए हैं जब भारत ने कई व्यावहारिक फैसले किए हैं।

कमर आगा भी कहते हैं कि भारत सरकार व्यवहारिका के आधार पर सभी पक्षों से संबंध रखते हुए आगे बढ़ रही है और सयुंक्त राष्ट्र संघ के रास्ते से सभी अंतर्राष्ट्रीय मसलों को सुलझाने की बात करती है।
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