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राममंदिर पर अध्यादेश लाने से बच रही है मोदी सरकार? पार्टी की मीटिंग में बनी थी ये राय

Fri, 04 Jan 2019 04:19 PM IST
Amit Digital अमित शर्मा, नई दिल्ली
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डेमो - फोटो : डेमो
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राममंदिर मुद्दे की जल्द सुनवाई की मांग को लेकर दायर एक याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रूख पर सबकी निगाहें हैं। कानून विशेषज्ञों की राय है कि अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले की रोजाना सुनवाई पर राजी भी हो जाता है तो भी इस बात की सम्भावना बहुत कम है कि वह अगले आम चुनाव के पहले इस मामले में कोई फैसला दे दे।
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वहीं आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) लगातार सरकार पर दबाव डाल रहे हैं कि वह कोर्ट के फैसले की प्रतीक्षा किये बिना राममंदिर के निर्माण के लिए संसद में कानून बनाये या अध्यादेश लेकर आये। सवाल यह है कि आरएसएस, विहिप और हिन्दू संतों के स्पष्ट रुख के बाद भी भाजपा मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश लाने से क्यों बच रही है?

दरअसल, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले दिनों दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में राममंदिर के निर्माण के लिए सरकार से कानून या अध्यादेश लाने की स्पष्ट मांग कर दी थी। इसके बाद उन्होंने कई अवसरों पर इस बात को दुहराया जिसके बाद भाजपा पर काफी दबाव बढ़ गया था। भाजपा के एक शीर्ष नेता के मुताबिक आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की राय के बाद इस मुद्दे पर पार्टी की एक हाई लेवल मीटिंग बुलाई गई थी।
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इस मीटिंग में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, संगठन महामंत्री रामलाल, वित्तमंत्री अरुण जेटली, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, एचआरडी मंत्री प्रकाश जावड़ेकर सहित दर्जनों नेता मौजूद थे। पार्टी से जुड़े कानून के जानकार भी इस मीटिंग का अहम हिस्सा थे।

मीटिंग में काफी गहन विचार-विमर्श के बाद इस मुद्दे पर आम सहमती बनी थी कि ऐसे समय में जब मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा हो, सरकार के द्वारा अध्यादेश लाना उचित नहीं होगा। राय यह भी थी कि अगर सरकार कोई अध्यादेश लेकर आती भी है तो उसके खिलाफ याचिका दाखिल हो जायेगी और मंदिर निर्माण का मामला एक और क़ानूनी पचड़े में पड़ जायेगा जिससे इस मामले में और अधिक देरी हो सकती है। इसलिए इस मामले पर पार्टी ने हमेशा सुप्रीम कोर्ट की बात मानने की बात कही। 

प्रयागराज की धर्मसंसद से बनेगा दबाव
प्रयागराज में इस समय कुंभ स्नान का पर्व चल रहा है। इसी कुंभ में 31 जनवरी और एक फरवरी को धर्म संसद का आयोजन होगा जिसमें देश भर के लाखों संत उपस्थित होंगे। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी पहली बार इसमें शामिल होने जा रहे हैं।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी धर्मसंसद में पहुंचेंगे। विहिप के राष्ट्रीय सचिव विजय शंकर तिवारी का कहना है कि इस धर्म संसद से मंदिर निर्माण का अहम रास्ता निकल सकता है। संतों का जो भी आदेश होगा, वह विहिप को मान्य होगा। बता दें कि इसके पहले 4 अक्तूबर को दिल्ली में संतों की उच्चाधिकार समिति की बैठक हुई थी। इसके बाद तालकटोरा मैदान में धर्म संसद का आयोजन भी हुआ था। दोनों ही कार्यक्रमों में मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की बात हुई थी।

विहिप के रामलीला मैदान के कार्यक्रम में भी संतों और आरएसएस प्रमुख भैया जी जोशी के द्वारा सरकार को कानून बनाने की स्पष्ट राय दी गई थी। ऐसे में प्रयागराज की धर्मसंसद में भी इसी तरह का प्रस्ताव पास होने की संभावना है। माना जा रहा है कि इसके बाद सरकार के लिए कानून बनाने या अध्यादेश लाने से बचना संभव नहीं होगा। 
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बंटी है कानून विशेषज्ञों की राय 

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के मुताबिक सरकार द्वारा ऐसे समय में कानून लाना उचित नहीं होगा जब कि वह मामला सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन हो। अगर सरकार यह कदम उठाती है तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकेगी जहां इसके खारिज होने की पूरी संभावना है। जबकि सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य वरिष्ठ वकील और विहिप के अध्यक्ष आलोक कुमार के मुताबिक़ केंद्र सरकार के पास किसी भी मुद्दे पर कानून बनाने या अध्यादेश लाने का अधिकार सुरक्षित है और इसे चैलेंज नहीं किया जा सकता।

जहां तक अध्यादेश के खिलाफ अपील की बात है तो वह किसी भी नागरिक के पास हमेशा यह अधिकार बना रहेगा कि वह किसी भी कानून के खिलाफ याचिका दायर कर सकता है। उसके बाद यह मामला कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में जाता है। लेकिन सरकार के द्वारा अध्यादेश लाने के उसके अधिकार को चैलेन्ज नहीं किया जा सकता। 

क्या कहती है भाजपा 

भारतीय जनता पार्टी मंदिर निर्माण के लिए हमेशा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अंतिम मानने की बात कहती रही है। अपने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यही रुख दिखाया जिससे यह सन्देश गया है कि भाजपा अब इस मुद्दे पर अध्यादेश लेकर नहीं आएगी। लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि एक राष्ट्र के प्रधानमंत्री होते हुए नरेंद्र मोदी और कोई बात कह भी नहीं सकते थे।

यह संवैधानिक मर्यादा के खिलाफ होता। लेकिन पार्टी सूत्रों ने यह स्पष्ट किया है कि धर्म संसद के बाद पार्टी इस मुद्दे पर कोई बड़ा फैसला ले सकती है जो उसके आधार वोट बैंक का विश्वास पार्टी के प्रति मजबूत करेगा। यानी राममंदिर पर भाजपा का अंतिम दांव आना अभी बाकी है। माना जा रहा है कि वह फरवरी में इस मुद्दे पर अहम फैसला ले सकती है। 
 
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