मंगलवार को ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के चुनावों के लिए मतदान संपन्न हुआ। नतीजे 4 दिसंबर को आएंगे। यह देश का पहला नगर निगम का चुनाव था जिसमें देश के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री तक ने प्रचार किया। आखिर इन चुनाव में इतना क्या दांव पर लगा है भाजपा के लिए?
इन चुनावों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि इस बदली हुई भाजपा के लिए हर चुनाव एक युद्ध की तरह है जिसे वह हर हालत में जीतना चाहती है। सामान्यता विधानसभा तो दूर लोकसभा उपचुनाव में भी किसी राष्ट्रीय पार्टी के केंद्रीय नेता प्रचार करने नहीं जाते। यह तो महज एक नगर निगम का चुनाव था।
लेकिन त्रिपुरा विधानसभा में शून्य सीटों से अचानक सरकार बना लेना, पश्चिम बंगाल विधानसभा में 4 सीटों से सरकार बनाने की स्थिति में आ जाना और जम्मू-कश्मीर में सरकार बना लेना, यह केवल नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा की भाजपा के लिए संभव है।
ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम का चुनाव इसी नजर से देखा जाना चाहिए। तेलंगाना के पिछली विधानसभा चुनाव महज एक सीट जीतने वाली पार्टी आज सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) को हैदराबाद नगर निगम जीतने के लिए चुनौती दे रही है। जाहिर है कि अगला कदम तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनाव होंगे। जैसे वह कर्नाटक में अब अपनी जड़ें मजबूती से जमा चुकी है।
चार जिलों के 150 डिवीजन में हुए चुनावों में कुल 1,122 उम्मीदवार मैदान में थे। फरवरी, 2016 में हुए पिछले चुनाव में के चंद्रशेखर राव की टीआरएस को 99 सीटें, ओवैसी की एआईएमआईएम को 44 और भाजपा को 4 सीटें मिली थी। कांग्रेस ने दो और तेलुगु देशम पार्टी ने एक सीट पर जीत हासिल की थी।
पुराने हैदराबाद में अजेय है एआईएमआईएम
ग्रेटर हैदराबाद में करीब 65 प्रतिशत हिन्दू हैं, जबकि 30 फीसदी मुस्लिम आबादी है। शेष अन्य धर्म और वर्ग के लोग हैं। पुराने हैदराबाद के कुछ हिस्सों में मुसलमानों की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी है। यही वजह है कि वहां से हमेशा ओवैसी की पार्टी ही जीतती है।
ओवैसी की होती है प्रतिक्रिया
लेकिन हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनावों ने साबित कर दिया की ओवैसी की उपस्थिति मात्र से किसी भी चुनाव में विपरीत प्रतिक्रिया भी उत्पन्न होती है। भाजपा को इसी प्रतिक्रिया का फायदा मिलने की संभावना है।