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पाकिस्तान से 'मोहब्बत' करने वाले चीन के लिए क्यों 'कबाब में हड्डी' है भारत, जानें

Tue, 04 Oct 2016 09:10 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : Getty Images file
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भारत के साथ रिश्तों में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान चीन के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाने में लगा हुआ है। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ चीन के साथ संबंधों को पहली वरीयता देते हैं। दोनों देशों के बीच इस प्रगाढ़ रिश्ते की बानगी समय-समय सामने भी आती रही है। संयुक्त राष्ट्र में भारत की ओर से आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने के लिए लाए गए प्रस्ताव को चीन ने वीटो कर दिया।  
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सुरक्षा परिषद के 15 देशों में चीन इकलौता देश रहा, जिसने भारत के प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि 14 देशों ने भारत की कोशिश का समर्थन किया। उरी हमले के लिए भारत ने जैश ए मोहम्मद को जिम्मेदार ठहराया था। चीन और पाकिस्तान के रिश्ते भारत के लिए हमेशा से चिंता का विषय रहे हैं, यहां पढ़िए आखिर क्यों चीन, पाकिस्तान से 'मोहब्बत' करता है और भारत को 'कबाब में हड्डी' मानता है। 
मुंबई हमले के बाद चीन ने लश्कर ए तैयबा के सरगना जकी उर रहमान लखवी को आतंकी घोषित करने के भारत के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र में वीटो कर दिया।

चीन के साथ पाकिस्तान के 6 दशक से भी ज्यादा पुराने रिश्ते में कई ऐसे मौके आए हैं, जब पाकिस्तान के प्रिय दु्र्दांत आतंकियों के पक्ष में चीन खड़ा रहा है। लखवी के साथ जमात उद दावा को भी आतंकी संगठन घोषित होने से बचाने के लिए ड्रैगन ने अपने वीटो अधिकार का उपयोग किया था। मुंबई हमले से पहले तीन बार चीन ने जमात उद दावा को आतंकी संगठन करार दिए जाने को रोक दिया। बावजूद इसके कि चीन को आईएसआई, पाकिस्तान आर्मी और जमात उद दावा/लश्कर ए तैयबा के रिश्तों के बारे में बखूबी पता है। 
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संयुक्त राष्ट्र में चीन के वीटो अधिकार का इस्तेमाल पाकिस्तान के साथ उसके प्रगाढ़ होते रिश्तों का सबूत है। यह एक ऐसा मसला है जिस पर नवाज शरीफ और आर्मी चीफ राहील शरीफ दोनों एकमत हैं।

पाकिस्तान में चीन का सबसे बड़ा निवेश

- फोटो : Getty Images file
बीजिंग पाकिस्तान को डिप्लोमेटिक सपोर्ट, आर्थिक निवेश, हथियार और टेक्नोलॉजी देता है। पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के विकास के लिए चीन का सहयोग जरूरी है। चीन और पाकिस्तान के संबंधों का चरम इस समय 46 बिलियन डॉलर का निवेश है। इस निवेश के जरिए चीन, पाकिस्तान के साथ मिलकर आर्थिक गलियारा बना रहा है और इसके तहत (CPEC - China Pakistan economic Corridor) शिनजिंयाग के काशगर को पाकिस्तान के ग्वादर से जोड़ रहा है।  

आर्थिक गलियारे के पावर प्रोजेक्ट्स, फाइबर ऑप्टिक लिंक्स, रोड और एनर्जी सप्लाई से जुड़े प्रोजेक्ट अगर पूरे हुए, तो अगले 15 सालों में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का चेहरा बदल जाएगा। एक देश में यह अब तक सबसे बड़ा निवेश है, और इसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के मार्शल प्लान को भी बौना बना दिया है। चीन के प्रयास और प्रोजेक्ट की सुरक्षा के लिए दोनों शरीफ ने पाकिस्तान आर्मी की एक स्पेशल डिवीजन बनाने का वादा किया, जो सिर्फ चीनियों की सुरक्षा करेगी। 

पाकिस्तान की एलीट सिक्योरिटी फोर्स और इसके 10 हजार जवानों के एक डिवीजन की जिम्मेदारी बलूचिस्तान में चीनी प्रोजेक्ट की सुरक्षा करना है। 

 

'चीन, अमेरिका से ज्यादा विश्वसनीय'

- फोटो : Getty Images
नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही आर्थिक गलियारे पर विचार चल रहा था, लेकिन शरीफ बड़ी सक्रियता से इसे आगे बढ़ा रहे थे। 2013 के बाद शरीफ ने चीन का कई बार दौरा किया। अपने पिछले कार्यकाल में भी शरीफ चीन का दौरा करते रहे हैं। यही नहीं करगिल युद्ध के समय भी नवाज शरीफ ने जोर देकर कहा था कि चीन, अमेरिका से ज्यादा विश्वसनीय है और सऊदी अरब से ज्यादा शक्तिशाली सहयोगी है। 

चीन और पाकिस्तान की यह दोस्ती भारत के साथ 1962 की लड़ाई के पहले से चली आ रही है, भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि युद्ध से पहले फील्ड मार्शल अयूब खान ने चीन का दौरा किया, माना जाता है कि अयूब खान का अमेरिका के प्रति विश्वास गिर रहा था। 

1962 की लड़ाई के समय अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि पाकिस्तान कश्मीर में दूसरा मोर्चा न खोल दे, जबकि भारत हिमालय की पहाड़ियों में चीन से लड़ रहा था।

 
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PM मोदी ने किया आर्थिक गलियारे का विरोध 

- फोटो : PTI
1962 की लड़ाई के बाद चीन और पाकिस्तान ने अपने सीमा विवाद तुरंत सुलझा लिए और इसी की बुनियाद पर आर्थिक गलियारे की योजना पनपी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चीन दौरे पर इसका विरोध किया, हालांकि मोदी ने अपने विरोध को कश्मीर तक ही सीमित रखा, जोकि इस पूरे प्रोजेक्ट के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

मसूद अजहर, जकी उर रहमान और जमात उद दावा पर चीन के वीटो का भारत ने विरोध किया है, लेकिन इसका आर्थिक गलियारे की योजना पर कोई खास असर नहीं पड़ा। चीन ने भारत के विरोध को हमेशा नजरअंदाज किया है। मोदी के कार्यकाल में पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते 'शीत युद्ध' की स्थिति में आ गए हैं।

Economic Times के लिए लिखे अपने लेख में ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन इंटेलिजेंस प्रोजेक्ट के डायरेक्टर ब्रूस रिडल कहते हैं, 'भारत, चीन के साथ डील करने के मामले चतुराई दिखा रहा है, बजाय इसके कि वह आर्थिक गलियारे का विरोध करे और बेअसर रहे। यह थोड़ा मुश्किल होगा, लेकिन भारत के साथ रिश्तों में तनाव कम होना पाकिस्तान आर्मी को नहीं पचेगा। पाकिस्तानी आर्मी के अधिकारी अभी भारत को लेकर पूर्वाग्रह पाले हुए हैं। यही वजह है कि लश्कर ए तैयबा जैसे आतंकी संगठन के साथ अंतरंगता बनाए हुए हैं।
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