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क्यों नहीं मिल पाए सुरक्षा बलों को 1000 माइनिंग प्रोटेक्टेड व्हीकल, 10 साल में बीस फीसदी एमपीवी की ही क्यों हुई सप्लाई

Sat, 10 Oct 2020 05:35 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा जाता है कि सीआरपीएफ को 668, बीएसएफ 224, सीआईएसएफ 10, आईटीबीपी 40, एनएसजी 16, एसएसबी 07 और असम राइफल में 92 एमपीवी की जरूरत है...
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विस्तार
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उग्रवादियों और नक्सलियों के साथ लड़ रहे केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को माइनिंग प्रोटेक्टेड व्हीकल (एमपीवी) मुहैया कराने का मामला लंबे समय तक अधर में लटकता रहा है। इन बलों के लिए लगभग 1000 एमपीवी की खरीद की जानी थी, लेकिन दस साल में केवल बीस फीसदी एमपीवी खरीदे जा सके हैं। संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा जाता है कि सीआरपीएफ को 668, बीएसएफ 224, सीआईएसएफ 10, आईटीबीपी 40, एनएसजी 16, एसएसबी 07 और असम राइफल में 92 एमपीवी की जरूरत है।

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मौजूदा समय में सीआरपीएफ के पास लगभग 150, बीएसएफ में 30, असम राइफल 30 और आईटीबीपी 36 के पास 23 एमपीवी बताए जाते हैं। पर्याप्त संख्या में एमपीवी न होने के कारण जवानों को जोखिम भरे इलाकों में सामान्य वाहनों में सफर करना पड़ता है। केंद्रीय सुरक्षा बलों के एक बड़े अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि एमपीवी की समय पर खरीद न होने के पीछे कई वजह रही हैं। इसमें बलों की ओर से कोई ढिलाई नहीं बरती गई। सरकार ने निजीकरण प्रक्रिया के तहत सरकारी संस्थानों में खरीद व निर्माण की शर्तें इतनी कठोर बना दी हैं कि एमपीवी जैसी अहम खरीद में एक दशक लग जाता है। अब एमपीवी जिस रफ्तार से बन रही है, उसे देखकर लगता है कि तय संख्या में इन वाहनों की सप्लाई पूरी होने में अगले दस साल लग जाएंगे।

बता दें कि केंद्रीय सुरक्षा बलों में 1057 माइनिंग प्रोटेक्टेड व्हीकल (एमपीवी) और 200 से ज्यादा बुलेटप्रूफ गाड़ियां खरीदने की योजना करीब एक दशक पहले बनी थी। इन वाहनों की फाइलें वर्षों तक एक विभाग से दूसरे विभाग में घूमती रही, लेकिन यह तय नहीं हो पाया कि एमपीवी कौन बनाएगा।उस वक्त नक्सली क्षेत्रों और जम्मू-कश्मीर में तैनात अर्धसैनिक बलों के पास मुट्ठीभर एमपीवी भी नहीं थे। एमपीवी की फाइल जैसे ही आगे बढ़ती तो उस पर कोई न कोई आब्जेक्शन लग जाता।
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सीआरपीएफ को एमपीवी खरीद के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया था। वजह, सीआरपीएफ को ही इन वाहनों की सबसे अधिक जरुरत थी। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के अलावा कश्मीर में भी बड़े पैमाने पर सीआरपीएफ तैनात रही है। अधिकारी के मुताबिक, सभी तरह की ग्राउंड टेस्टिंग पूरी होने में ही सात वर्ष लग गए थे। जबलपुर आयुध फैक्टरी के साथ यह खरीद प्रक्रिया शुरू की गई थी। अब वहां पर भी दिक्कत आ गई। जितनी संख्या में एमपीवी खरीदी जानी हैं, वह प्रक्रिया कई वर्षों में पूरी होगी। वजह, केंद्र सरकार ने आयुध फैक्टरी के नियमों में कई तरह के बदलाव किए हैं। फैक्ट्री में तकनीकी पुर्जों एवं मशीनरी की खरीद प्रक्रिया कठोर बना दी गई है।

ऐसे में किस तरह एमपीवी की सप्लाई समय पर दे सकेंगे

आयुध फैक्टरी में लंबे समय तक कार्यरत रहे एक अधिकारी का कहना है कि जब से यहां निजीकरण का मामला उठा है, कर्मचारी और इंजीनियर मन लगाकर काम नहीं कर पा रहे हैं। कई बार हड़ताल भी हो चुकी हैं। छोटे से छोटे पुर्जे मंगाने के लिए फाइल ऊपर भेजनी पड़ रही है। एमपीवी हम अपनी मनमर्जी से नहीं बना सकते। उसके लिए संबंधित बल की जरुरतों को ध्यान में रखना पड़ता है। पहले जो एमपीवी बने थे, उनकी क्षमता कम रही है।मतलब, एमपीवी का निचला हिस्सा महज 10 किलोग्राम तक का टीएनटी विस्फोट झेल सकता है।

अगर टायर के नीचे 14 किलोग्राम का विस्फोट होता है तो भी जवान सुरक्षित रहते हैं। अब आतंकियों और नक्सलियों ने अधिक क्षमता वाली माइन यानी जमीन में विस्फोटक सामग्री दबाना, का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया है। नए एमपीवी 20-30 किलोग्राम तक का विस्फोट झेल सकें, इसके लिए नई तकनीक की आवश्यकता पड़ती है। आयुध फैक्टरी के खरीद नियम कठोर होने के कारण उपकरण और दूसरी निर्माण सामग्री समय पर नहीं मिल पाती।

यदि कोई बेहतर क्वालिटी का पुर्जा विदेश से मंगवाना हो या देश में प्राइवेट फैक्ट्री से लेना हो तो उसके लिए लंबी चौड़ी औपचारिकता पूरी करनी पड़ती है। जैसे अब कहा जा रहा है कि पहले एमएसएमई के पास जाओ। अगर वे पुर्जा बनाते हैं तो उन्हीं से खरीद लो। इस कारण एमपीवी खरीद प्रक्रिया पीछे चली जाती है। इससे कर्मियों की कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है। प्रोक्योरमेंट रुल का जटिल होना और वित्तीय शक्तियां कम होने के कारण समय पर उपकरण तैयार नहीं हो पा रहे हैं।

सुरक्षा बलों में भी इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता

केंद्रीय सुरक्षा बलों के दिल्ली मुख्यालय में तैनात एक बड़े अधिकारी का कहना है कि एमपीवी या बुलेटप्रूफ वाहन, जैसे तकनीकी मामलों में खरीद के लिए हर एक बल मुख्यालय में अलग से एक टेक्नीकल विंग होनी चाहिए।बलों में आरएंडडी यानी रिसर्च एंड डेवेलपमेंट की बात होती है, मगर उसके लिए किसी एक्सपर्ट को नहीं लाया जाता। अगर कहीं औपचारिकता के लिए वह इकाई स्थापित की गई है तो उसे स्वायत्तता नहीं दी गई।प्रोविजनिंग शाखा में योग्य तकनीकी एक्सपर्ट का अभाव है।

जिन्हें ऐसी तकनीकी मामलों की कोई जानकारी नहीं है, उन्हें एक्सपर्ट के पद पर बैठा दिया जाता है। जो एक्सपर्ट हैं, वे दूरवर्ती किसी बटालियन में ड्यूटी दे रहे होते हैं।इन सबके चलते बल मुख्यालय में तकनीकी उपकरणों की खरीद और ट्रायल प्रक्रिया में देरी होती है। दो तीन साल पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एमपीवी खरीद में कई तरह की दिक्कतें दूर कर इन वाहनों की खरीद प्रक्रिया शुरू करने के आदेश जारी किए थे। उसके बाद कछुआ गति से यह योजना आगे बढ़ी है।

 

 

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