आयुध फैक्टरी में लंबे समय तक कार्यरत रहे एक अधिकारी का कहना है कि जब से यहां निजीकरण का मामला उठा है, कर्मचारी और इंजीनियर मन लगाकर काम नहीं कर पा रहे हैं। कई बार हड़ताल भी हो चुकी हैं। छोटे से छोटे पुर्जे मंगाने के लिए फाइल ऊपर भेजनी पड़ रही है। एमपीवी हम अपनी मनमर्जी से नहीं बना सकते। उसके लिए संबंधित बल की जरुरतों को ध्यान में रखना पड़ता है। पहले जो एमपीवी बने थे, उनकी क्षमता कम रही है।मतलब, एमपीवी का निचला हिस्सा महज 10 किलोग्राम तक का टीएनटी विस्फोट झेल सकता है।
अगर टायर के नीचे 14 किलोग्राम का विस्फोट होता है तो भी जवान सुरक्षित रहते हैं। अब आतंकियों और नक्सलियों ने अधिक क्षमता वाली माइन यानी जमीन में विस्फोटक सामग्री दबाना, का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया है। नए एमपीवी 20-30 किलोग्राम तक का विस्फोट झेल सकें, इसके लिए नई तकनीक की आवश्यकता पड़ती है। आयुध फैक्टरी के खरीद नियम कठोर होने के कारण उपकरण और दूसरी निर्माण सामग्री समय पर नहीं मिल पाती।
यदि कोई बेहतर क्वालिटी का पुर्जा विदेश से मंगवाना हो या देश में प्राइवेट फैक्ट्री से लेना हो तो उसके लिए लंबी चौड़ी औपचारिकता पूरी करनी पड़ती है। जैसे अब कहा जा रहा है कि पहले एमएसएमई के पास जाओ। अगर वे पुर्जा बनाते हैं तो उन्हीं से खरीद लो। इस कारण एमपीवी खरीद प्रक्रिया पीछे चली जाती है। इससे कर्मियों की कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है। प्रोक्योरमेंट रुल का जटिल होना और वित्तीय शक्तियां कम होने के कारण समय पर उपकरण तैयार नहीं हो पा रहे हैं।
केंद्रीय सुरक्षा बलों के दिल्ली मुख्यालय में तैनात एक बड़े अधिकारी का कहना है कि एमपीवी या बुलेटप्रूफ वाहन, जैसे तकनीकी मामलों में खरीद के लिए हर एक बल मुख्यालय में अलग से एक टेक्नीकल विंग होनी चाहिए।बलों में आरएंडडी यानी रिसर्च एंड डेवेलपमेंट की बात होती है, मगर उसके लिए किसी एक्सपर्ट को नहीं लाया जाता। अगर कहीं औपचारिकता के लिए वह इकाई स्थापित की गई है तो उसे स्वायत्तता नहीं दी गई।प्रोविजनिंग शाखा में योग्य तकनीकी एक्सपर्ट का अभाव है।
जिन्हें ऐसी तकनीकी मामलों की कोई जानकारी नहीं है, उन्हें एक्सपर्ट के पद पर बैठा दिया जाता है। जो एक्सपर्ट हैं, वे दूरवर्ती किसी बटालियन में ड्यूटी दे रहे होते हैं।इन सबके चलते बल मुख्यालय में तकनीकी उपकरणों की खरीद और ट्रायल प्रक्रिया में देरी होती है। दो तीन साल पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एमपीवी खरीद में कई तरह की दिक्कतें दूर कर इन वाहनों की खरीद प्रक्रिया शुरू करने के आदेश जारी किए थे। उसके बाद कछुआ गति से यह योजना आगे बढ़ी है।