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सज्जन का सफर: संजय की दोस्ती ने सांसद बनाया, एक दंगे और दो मामलों ने ऐसे खत्म किया सज्जन कुमार का सियासी रसूख

Thu, 20 Aug 2026 02:43 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

सज्जन कुमार के निधन के बाद 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े वे मामले फिर चर्चा में हैं, जिनमें लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद उन्हें अलग-अलग मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। कांग्रेस के पूर्व सांसद का राजनीतिक सफर, दंगों में उनकी भूमिका और अदालत के फैसले भारतीय राजनीति के एक लंबे और विवादित अध्याय से जुड़े रहे हैं।
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नहीं रहे सज्जन कुमार - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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पूर्व सांसद और कांग्रेस नेता सज्जन कुमार का निधन हो गया है। उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल लाया गया था, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामले में दोषी ठहराए गए सज्जन कुमार पिछले करीब सात साल से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद थे। उनके निधन के बाद एक बार फिर 1984 के सिख विरोधी दंगों और उनमें सज्जन कुमार की भूमिका से जुड़े मामलों की चर्चा हो रही है। 

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ऐसे में आइए जानते हैं कि कौन थे सज्जन कुमार? तिहाड़ जेल में क्यों बंद थे? क्या था 1984 का सिख विरोधी दंगा? सिख दंगों में क्या रही थी सज्जन कुमार की भूमिका?

सज्जन कुमार कौन थे?

सज्जन कुमार का जन्म 23 सितंबर 1945 को हुआ था। उनके पिता का नाम रघुनाथ सिंह था। उन्होंने सिर्फ मैट्रिक तक पढ़ाई की थी। राजनीति में आने से पहले वह बेकरी चलाते थे। उन्हें कांग्रेस के दिवंगत नेता संजय गांधी का करीबी माना जाता था।

सज्जन कुमार ने 1977 में पहली बार दिल्ली नगर निगम के पार्षद के तौर पर राजनीति में कदम रखा। इसके बाद उन्हें दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी का महासचिव बनाया गया। कांग्रेस के टिकट पर 1980 में वह बाहरी दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र से 7वीं लोकसभा के लिए सांसद चुने गए। इसके बाद 1991 में उन्होंने फिर लोकसभा चुनाव जीता। साल 2004 में भी वह बाहरी दिल्ली सीट से चुनाव जीते और उन्हें रिकॉर्ड 85 लाख से ज्यादा वोट मिले थे।

तिहाड़ जेल में क्यों बंद थे सज्जन कुमार?

सज्जन कुमार 31 दिसंबर 2018 से तिहाड़ जेल में बंद थे। 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उन्होंने जेल में करीब सात साल बिताए। अप्रैल 2026 में उन्होंने अपनी बीमार पत्नी से मिलने के लिए सुप्रीम कोर्ट से राहत मांगी थी, लेकिन कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी।

राजनीतिक करियर - फोटो : Amar Ujala

क्या था 1984 का सिख विरोधी दंगा?

1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में सिख विरोधी दंगे भड़क गए थे। हालांकि ये पूरी कहानी इंदिरा गांधी की हत्या से भी करीब चार महीने पहले से शुरू हुई थी। जब ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था। 

जून 1984: ऑपरेशन ब्लू स्टार
जून 1984 में स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद खालिस्तानी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके कई साथियों को भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत मार गिराया था। इस अभियान को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने मंजूरी दी थी। स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई को लेकर सिख समुदाय के एक बड़े हिस्से में गहरी नाराजगी और आक्रोश पैदा हुआ था।

31 अक्तूबर 1984: इंदिरा गांधी की हत्या
ऑपरेशन ब्लू स्टार के कुछ महीने बाद 31 अक्तूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके बाद देशभर में सिख विरोधी दंगे भड़क गए। माना जाता है कि इन दंगों में तीन हजार से पांच हजार लोगों की मौत हुई थी। अकेले दिल्ली में करीब दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे।

इस घटना के करीब 41 साल बाद भी 1984 के दंगों से जुड़े मामलों में कानूनी कार्रवाई जारी रही। सज्जन कुमार के अलावा कांग्रेस के एक अन्य नेता जगदीश टाइटलर पर भी मामले चलते रहे हैं। कांग्रेस नेता एचकेएल भगत और कमलनाथ भी सिख दंगों से जुड़े मामलों में आरोपी रह चुके हैं।

सिख दंगों में क्या रही थी सज्जन कुमार की भूमिका?

सज्जन कुमार का नाम दिल्ली में सिखों के खिलाफ हुए दंगों को भड़काने के आरोपों में प्रमुखता से सामने आया था। खास तौर पर दिल्ली के सुल्तानपुरी, कैंट और पालम कॉलोनी जैसे इलाकों में उनके खिलाफ आरोप लगाए गए थे।

दंगों के पीड़ितों के मुताबिक, 1 नवंबर 1984 को दिल्ली में भीड़ को संबोधित करते हुए सज्जन कुमार को यह कहते सुना गया था- 'हमारी मां मार दी, सरदारों को मार दो।'

सज्जन कुमार के खिलाफ दर्ज मामलों में कई गवाहों ने अपने बयान में आरोप लगाया कि उन्होंने निजी तौर पर सिखों के घरों की पहचान करवाकर भीड़ को हमले के लिए उकसाया था। आरोप यह भी थे कि उनके समर्थकों ने वोटर लिस्ट के जरिए सिखों के घरों और कारोबार की पहचान की और उनके घरों और दुकानों में तोड़फोड़ या आगजनी की। कई सिखों को उनके घरों से निकालकर मार दिया गया।

1984 का सिख दंगा - फोटो : Amar Ujala

किन घटनाओं से जुड़ा सज्जन कुमार का नाम?

आरोपों के मुताबिक, सज्जन कुमार के उकसावे के बाद दिल्ली कैंट के राजनगर इलाके में भीड़ ने पांच सिखों- केहर सिंह, गुरप्रीत सिंह, रघुवेंद्र सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और कुलदीप सिंह की हत्या कर दी थी।

पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स यानी PUDR और पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज यानी PUCL की तथ्य खोजने वाली टीमों ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि दिल्ली के सुल्तानपुरी इलाके में हुए दंगों के दौरान कई सिख पीड़ितों ने कांग्रेस सांसद पर भीड़ को भड़काने का आरोप लगाया था। बाद में कई लोगों ने इस सांसद की पहचान सज्जन कुमार के तौर पर की।

कैसे हुई कानूनी कार्रवाई?

सज्जन कुमार के खिलाफ कई आरोप और सबूत सामने आने के बावजूद लंबे समय तक उनके खिलाफ किसी मामले में आरोप तय नहीं हो सके। साल 2002 में सिख दंगों से जुड़े एक मामले में दिल्ली की निचली अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था। इसके बाद 2005 में सीबीआई ने जीटी नानावटी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर सज्जन कुमार के खिलाफ नया केस दर्ज किया।

2010 में इस मामले की सुनवाई दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत में हुई। इस मामले में बलवान खोखर, महेंद्र यादव, महा सिंह समेत कई अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया था।

सीबीआई ने हाईकोर्ट के सामने कहा था कि घटनाओं के चश्मदीद गवाहों ने जांच के लिए गठित आयोग के सामने सज्जन कुमार का नाम लिया था और उनके खिलाफ नरसंहार में भूमिका की जांच की मांग की गई थी। हालांकि, निचली अदालत ने चश्मदीदों को गवाही देने से रोक दिया था।

इसी मामले की सुनवाई के दौरान एक अन्य चश्मदीद गवाह चमकौर ने कोर्ट को बताया था कि उन्होंने सज्जन कुमार को सुल्तानपुरी इलाके में भीड़ को संबोधित करते हुए देखा था।
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उम्रकैद की सजा - फोटो : Amar Ujala

किस-किस मामले में मिली उम्रकैद की सजा?

पहला मामला- दिल्ली कैंट
17 दिसंबर 2018 को दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली कैंट इलाके में पांच सिखों की हत्या के मामले में सज्जन कुमार को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला पालम कॉलोनी में हुई हत्याओं से भी जुड़ा था।

दूसरा मामला- सरस्वती विहार
फरवरी 2025 में राउज एवेन्यू कोर्ट ने सरस्वती विहार में 1 नवंबर 1984 को एक पिता-पुत्र की हत्या और भीड़ को उकसाने के मामले में सज्जन कुमार को दूसरी बार उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, सज्जन कुमार ने भीड़ को उकसाया, जिसके बाद बड़े स्तर पर सिखों के घरों और दुकानों में लूटपाट और आगजनी हुई। इसी दौरान एक घर में लूट और आग लगाने से पहले भीड़ ने दो सिखों को जिंदा जला दिया था।

इस मामले की जांच कर रही तीन सदस्यीय विशेष जांच टीम यानी SIT ने जसवंत सिंह की पत्नी को चश्मदीद गवाह के तौर पर पेश किया था। हालांकि, सज्जन कुमार की ओर से पेश वकीलों ने उनकी गवाही पर सवाल उठाए। उनका दावा था कि वह घटना के सात साल बाद गवाह के तौर पर सामने आई थीं, इसलिए उनकी गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

बताया जाता है कि इस मामले में पहली एफआईआर घटना के करीब सात साल बाद 1991 में दर्ज हुई थी। यह एफआईआर 9 सितंबर 1985 को दिए गए एक हलफनामे के आधार पर दर्ज हुई थी, जिसे शिकायतकर्ता ने जस्टिस रंगनाथ मिश्र के नेतृत्व वाले आयोग को सौंपा था।

2014 में मोदी सरकार की ओर से गठित एसआईटी ने 1984 के सिख दंगों से जुड़े मामलों की जांच तेज की और पुराने मामलों को दोबारा खंगालना शुरू किया। सज्जन कुमार के खिलाफ भी इन्हीं मामलों में कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ी और अंततः उन्हें दो अलग-अलग मामलों में उम्रकैद की सजा हुई।
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