कोरोना वायरस आज पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा संकट बना हुआ है। इस खतरनाक वायरस की चपेट में आकर लाखों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, वहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी बड़ा झटका लगा है। इसी बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के ताजा बयान से एक और झटका लगा है।
कोरोना वायरस पर नियंत्रण के लिए पहले दावा किया जा रहा था कि 'हर्ड इम्युनिटी' के जरिए इसका खात्मा किया जा सकता है। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने ताजा बयान में ऐसी किसी भी संभावना से साफ इनकार कर दिया है।
डब्ल्यूएचओ ने दावों को किया खारिज
डब्ल्यूएचओ ने मंगलवार को कहा कि फिलहाल दुनिया के किसी भी देश में कोरोना के खिलाफ 'हर्ड इम्युनिटी' उत्पन्न नहीं हुई है। डब्ल्यूएचओ ने उन देशों के दावे को सिरे से खारिज कर दिया जो कि कोरोना के घटते मामलों के मद्देनजर अपने यहां लोगों में 'हर्ड इम्युनिटी' (सामूहिक रोग प्रतिरोध क्षमता) पैदा होने का दावा कर रहे थे।
'हर्ड इम्युनिटी' की उम्मीद में नहीं रहना चाहिए- डॉ. रेयान
बता दें कि कुछ समय पहले ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने दावा किया था कि ब्रिटेन में कुछ लोगों के बीच 'हर्ड इम्युनिटी' विकसित हो रही है। डब्ल्यूएचओ के आपातकालीन मामलों के प्रमुख डॉक्टर माइकल रेयान ने कहा कि हमें 'हर्ड इम्युनिटी' हासिल करने की उम्मीद में नहीं रहना चाहिए। अभी हम उस स्थिति के आसपास भी नहीं हैं जो वायरस के प्रसार को रोकने के लिए जरूरी है।
10 से 20 प्रतिशत आबादी में ही एंटीबॉडीज
डॉ. रेयान ने आगे कहा कि 'हर्ड इम्युनिटी' कोई समाधान नहीं है और न ही हमें इसकी उम्मीद करनी चाहिए। आज तक हुए अधिकतर अध्ययनों में यही बात सामने आई है कि सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत आबादी में ही संबंधित एंटीबॉडीज हैं, जो लोगों को 'हर्ड इम्युनिटी' पैदा करने में सहायक हो सकते हैं। लेकिन इतनी कम एंटीबॉडीज की दर से 'हर्ड इम्युनिटी 'को नहीं पाया जा सकता है।
डब्ल्यूएचओ ने दी चेतावनी
इसके अलावा डब्ल्यूएचओ ने चेतावनी जारी करते हुए कहा कि 20 से लेकर 40 साल के युवा कोरोना का संक्रमण दुनिया भर में फैला रहे हैं, उन्हें सतर्कता बरतने की जरूरत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, सिर्फ अकेले अमेरिका में कोरोना संक्रमण के मामले एक करोड़ 15 लाख तक पहुंचने की आशंका है और इस दौरान चार लाख लोगों की मौत की भी आशंका है।
दिल्ली में भी 'हर्ड इम्युनिटी' विकसित होने की आस
डब्ल्यूएचओ के बयान से दिल्ली के दावों को भी झटका लगा है। पिछले कुछ दिनों से लगातार इस तरह के डाटा सामने आ रहे हैं कि दिल्ली की करीब 40 से 45 फीसदी आबादी में कोरोना ऐंटिबॉडीज विकसित हो चुकी हैं। बहुत मामूली से अंतर के साथ लगभग इसी तरह का आंकड़ा अलग-अलग सूचनाओं में सामने आ रहा है। साथ ही दिल्ली के अस्पतालों में उमड़ी कोरोना संक्रमितों की भीड़ अब बहुत ही कम हो चुकी है। दिल्ली की इस स्थिति को देखते हुए अब अन्य राज्यों और पूरे देश को 'हर्ड इम्युनिटी' विकसित होने की अवधारणा को बल मिल रहा था।
क्या होती है 'हर्ड इम्युनिटी'?
सामान्य भाषा में समझे तो हर्ड का अर्थ अंग्रेजी में झुंड होता है, इम्युनिटी का अर्थ रोग प्रतिरोधक क्षमता और 'हर्ड इम्युनिटी' यानी सामुहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता। 'कोरोना काल' में सबसे ज्यादा चर्चा आजकल ‘इम्युनिटी’ की ही हो रही है। यानी जब तक कोरोना वायरस की वैक्सीन नहीं आ जाती तब तक हमें अपनी इम्युनिटी को ही मजबूत रखना होगा। 'हर्ड इम्युनिटी' किसी महामारी या संक्रमण के काल में लोगों के शरीर में विकसित होने वाली ऐसी रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है, जो क्षमता अगर 60 प्रतिशत से अधिक आबादी में विकसित हो जाए तो संक्रमण का प्रसार रुक जाता है।
'हर्ड इम्युनिटी’ होने का मतलब है कि एक बड़े हिस्से या आमतौर पर 60 से 90 फीसदी लोगों में किसी वायरस से लड़ने की ताकत को पैदा करना। ऐसे लोग बीमारी के लिए इम्यून हो जाते हैं। जैसे-जैसे इम्यून (रोग प्रतिरोधक क्षमता) वाले लोगों की संख्या में इजाफा होता जाएगा। वैसे-वैसे वायरस का खतरा कम होता जाएगा। इस वजह से वायरस के संक्रमण की जो चेन बनी हुई है वो टूट जाएगी। यानी वो लोग भी बच सकते हैं जिनकी इम्युनिटी कमजोर है।