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आखिर सरकार के गले में कौन बांध रहा है राफेल की घंटी

Tue, 25 Sep 2018 10:14 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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17 विकल्प होने के बाद भी राफेल लड़ाकू विमान सौदे में ऑफसेट पार्टनर के रूप में रिलायंस डिफेंस को चुने जाने का मुद्दा अब नये मोड़ की तरफ है। अभी तक इस मुद्दे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा था, लेकिन अब यह धीरे-धीरे रक्षा मंत्रालय और भारत सरकार की स्वायत्तशासी एजेंसियों के मुहाने पर जांच के लिए खड़ा होने लगा है। 

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रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का बयान आने के बाद अऑफसेट पार्टनर के रूप में रिलायंस डिफेंस को चुने जाने के प्रकरण की जांच का वक्तव्य दिया था। रक्षा मंत्री का अभी भी कहना है कि इस मामले की जांच जारी है और जबतक जांच पूरी नहीं हो जाती कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे में एक बड़ा सवाल है कि राफेल लड़ाकू विमान सौदे के मामले में सरकार के गले में घंटी कौन बांध रहा है?

क्यों चुना रिलायंस डिफेंस को?

लाख टके के इस सवाल पर पूरा रक्षा मंत्रालय मौन है? विदेश मंत्रालय के अधिकारी भी होठ सिले हुए हैं। रक्षा मंत्री का कहना है कि इस मामले की एक जांच चल रही है। इसी के साथ वह यह भी कहती हैं कि उन्हें क्या पता, रिलायंस डिफेंस को फ्रांस की डास्सो एवियेशन ने क्यों चुना? फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद का पहले दिन बयान आया कि भारत सरकार के दबाव के कारण रिलायंस डिफेंस को चुने जाने के सिवा कोई विकल्प नहीं था। 
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हालांकि बाद में ओलांद ने दबाव बढ़ने पर अपने बयान में थोड़ा तब्दीली कर दी। लेकिन प्राप्त जानकारी के अनुसार राफेल लड़ाकू विमान सौदे के लिए फ्रांस के पास 17 भारतीय कंपनियों की जानकारी दी गई थी। इनमें देश की सार्वजनिक क्षेत्र की एकमात्र विमान निर्माता कंपनी हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड(एचएएल) और टाटा डिफेंस, महिन्द्रा डिफेंस समेत कई निजी भारतीय कंपनियां शामिल थीं। लेकिन इन सभी को दरकिनार करते हुए डास्सो एवियेशन ने ऑफसेट पार्टनर के तौर पर रिलायंस डिफेंस को चुना। वह रिलांयस डिफेंस जिसकी पंजीकरण इस सौदे को हरी झंडी मिलने के दो सप्ताह पहले ही हुआ था।

क्या है ऑफसेट पार्टनर ?

यूपीए-1 सरकार रक्षा खरीद नीति लाई थी। इस नीति में देश में रक्षा तकनीक को बढ़ावा देने, रक्षा क्षेत्र की निजी और सार्वजनिक कंपनियों को अवसर तथा प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण देने के लिए ऑफसेट को स्थान दिया था। ऑफसेट क्लाज का आशय है कि जो भी विदेशी कंपनी भारत से रक्षा क्षेत्र में साजो-सामान का सौदा करेगी, उसे सौदे की पूरी राशि का एक हिस्सा भारत की रक्षा क्षेत्र की जुड़ी कंपनी में निवेश करना होगा। 

यहां से वह संयुक्त उद्यम के जरिए कल पुर्जे का आयात करेगी। इस ऑफसेट क्लाज के कारण ही देश के नामी उद्योगपति घरानों ने रक्षा क्षेत्र में रुचि लेना शुरू कर दिया था। इसमें सुनील भारती मित्तल, अंबानी समेत अन्य शामिल हैं।

क्या गलत हैं फ्रांस्वा ओलांद?

यह जांच का विषय है, लेकिन जिस तरह से अनिल अंबानी की स्वामित्व वाली रिलायंस डिफेंस को ऑफसेट पार्टनर चुना वह रक्षा मंत्रालय अधिकारियों के मन में भी सवाल खड़े कर रहा है। फ्रांस्वा ओलांद सही हों या गलत लेकिन उनके बयान ने संदेह को मजबूत आधार दे दिया है। डास्सो एवियेशन ने रिलायंस डिफेंस को ऑफसेट पाटर्नर चुने जाने के दो बड़े कारण बताये हैं। 

पहला तो यह कि रिलायंस डिफेंस के पास नागपुर में ऑफसेट पार्टनर बनने के लिए पर्याप्त जमीन है। यह जमीन नागपुर हवाई अड्डे के पास है और इससे आवाजाही में आसानी होगी। दूसरा डेसाल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड(डीआरडीएल) का यह फैसला डास्सो(डेसाल्ट) एवियेशन के सीईओ ने लिया है। फ्रांस की कंपनी ने यह सफाई बाकायदा बयान जारी करके दिया है। डास्सो एवियेशन के दोनों जवाब चौकाने वाले हैं।

क्या है ऑफेट में सरकार की भूमिका

रक्षा सौदे के अंतिम रूप से पहले सौदा पाने वाली विदेशी कंपनी को ऑफसेट पाटर्नर चुनना होता है। भारत सरकार से किसी देश की सरकार द्वारा होने वाले किसी रक्षा सौदे और ऑफसेट क्लॉज की दशा में रक्षा मंत्रालय द्वारा भारतीय रक्षा क्षेत्र की कंपनियों के नाम सुझाए जाते हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार उस देश की कंपनी उपलब्ध कराए गए कंपनियों के नाम में से एक नाम चुनकर अपने देश की सरकार को देती है।  

सूत्र बताते हैं कि इस मामले में भी ऐसा ही होने की संभावना है। बताते हैं ऑफसेट पार्टनर की सूचना भारत सरकार के पास आती है और इसके बाद रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी अऑसेट क्लॉज के तहत निर्धारित राशि के भारतीय कंपनी के साथ निवेश, राशि के आने, कल-पुर्जे बनाने में खर्च होने और अन्य की निगरानी भर का रहता है।

फिर कौन बांध रहा है सरकार के गले में घंटी

संसद के शीतकालीन सत्र की पटकथा तैयार है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस लगातार इस मुद्दे को उठा रही है। वहीं कांग्रेस पार्टी  ने प्रतिनिधि मंडल के साथ जाकर सीवीसी और सीएजी को ज्ञापन देकर राफेल लड़ाकू विमान प्रकरण के जांच की मांग शुरू कर दिया है। सीएजी और सीवीसी दोनों स्वायत्तशासी संस्थान हैं। सीवीसी का कार्य भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करना है, जबकि सीएजी सरकार के खर्चों का लेखा परीक्षण करती है। दोनों ही संवैधानिक निकायों की पहुंच सरकार के हर गोपनीय दस्तावेज तक संभव है। 

वहीं कांग्रेस पार्टी के नेताओं की निगाह रक्षा मंत्रालय की जांच पर भी है। एक उच्चपदस्थ सूत्र का कहना है कि अभी तक यह मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित था, लेकिन अब धीरे-धीरे सरकार और सरकार की जांच एजेंसियों के जांच के दायरे में आ रहा है। माना जा रहा है कि संसद के शीतकालीन सत्र तक यह काफी बड़ा रूप ले सकता है।

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