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Shantanu Naidu: टाटा के न्यूजलेटर में छपे एक लेख ने बदल दी जिंदगी, बना दिया रतन टाटा का सबसे अच्छा दोस्त

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Thu, 10 Oct 2024 07:30 PM IST

सार

Shantanu Naidu: शांतनु नायडू रतन टाटा की निजी निवेश कंपनी आरएनटी कार्यालय में महाप्रबंधक हैं। रतन टाटा शांतनु को अपने बेटे की तरह मानते थे। शांतनु एक उद्यमी हैं और मोटोपाज जैसे मुहिम से भी दशकों से जुड़े हैं जो आवारा कुत्तों की सुरक्षा के लिए काम करती है। यही मुहिम रतन टाटा और शांतनु की गहरी दोस्ती का कारण भी बनी।
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रतन टाटा और शांतनु नायडू - फोटो : AMAR UJALA
करोबार जगत की दिग्गज हस्ती रतन टाटा अब हमारे बीच नहीं हैं। 86 वर्ष की उम्र में रतन टाटा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। मशहूर उद्योगपति के निधन से देश भर में शोक की लहर है। राजनेताओं, उद्योगपतियों से लेकर खिलाड़ियों और अभिनेताओं तक कई लोग उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं। रतन टाटा सबसे करीबी दोस्त और उनके साथ हमेशा साये की तरह खड़े रहने वाले शांतनु नायडू ने भी रतन टाटा को श्रद्धांजलि दी है। शांतनु ने रतन टाटा को याद करते हुए लिखा, 'इस दोस्ती के बाद अब उनके जाने से मेरी जिंदगी में एक खालीपन आ गया है, जिसे भरने में मैं अपनी बाकी जिंदगी बिताऊंगा। दुख प्रेम की कीमत है, अलविदा, मेरे प्रिय दीपस्तंभ।'

रतन टाटा और उनके सबसे करीबी दोस्त शांतनु नायडू के रिश्ते की चर्चा हमेशा रही है। हाल के वर्षों में रतन टाटा अपने सहयोगी के साथ सभी सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखते थे। दोनों की मुलाकात कैसे हुई और दोस्ती इतनी गहरी कैसे हुई, इसके तमाम किस्से हैं। आइये जानते हैं शांतनु नायडू के बारे में सब कुछ...
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रतन टाटा और शांतनु नायडू - फोटो : AMAR UJALA
करोबार जगत की दिग्गज हस्ती रतन टाटा अब हमारे बीच नहीं हैं। 86 वर्ष की उम्र में रतन टाटा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। मशहूर उद्योगपति के निधन से देश भर में शोक की लहर है। राजनेताओं, उद्योगपतियों से लेकर खिलाड़ियों और अभिनेताओं तक कई लोग उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं। रतन टाटा सबसे करीबी दोस्त और उनके साथ हमेशा साये की तरह खड़े रहने वाले शांतनु नायडू ने भी रतन टाटा को श्रद्धांजलि दी है। शांतनु ने रतन टाटा को याद करते हुए लिखा, 'इस दोस्ती के बाद अब उनके जाने से मेरी जिंदगी में एक खालीपन आ गया है, जिसे भरने में मैं अपनी बाकी जिंदगी बिताऊंगा। दुख प्रेम की कीमत है, अलविदा, मेरे प्रिय दीपस्तंभ।'

रतन टाटा और उनके सबसे करीबी दोस्त शांतनु नायडू के रिश्ते की चर्चा हमेशा रही है। हाल के वर्षों में रतन टाटा अपने सहयोगी के साथ सभी सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखते थे। दोनों की मुलाकात कैसे हुई और दोस्ती इतनी गहरी कैसे हुई, इसके तमाम किस्से हैं। आइये जानते हैं शांतनु नायडू के बारे में सब कुछ...

रतन टाटा और शांतनु नायडू - फोटो : linkedin//shantanu-naidu
कौन हैं शांतनु नायडू
रतन टाटा ने शांतनु नायडू को अपने करीबी लोगों में से एक के रूप में अपनाया है और उन्हें बेटे की तरह मानते थे। 31 वर्षीय शांतनु एक उद्यमी हैं और गुड फेलोज स्टार्टअप के संस्थापक भी हैं। वह मोटोपाज जैसे मुहिम से भी दशकों से जुड़े हैं। शांतनु की लिंक्डइन प्रोफाइल के अनुसार, वह रतन टाटा की निजी निवेश कंपनी आरएनटी कार्यालय में महाप्रबंधक हैं। 

कैसा रहा है करियर?
शांतनु ने 2010 में सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया और 2014 में यहां से बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग (बीई) की पढ़ाई पूरी की। 2014 में शांतनु ने पुणे में टाटा एलेक्सी में ऑटोमोबाइल डिजाइन इंजीनियर के तौर पर काम शुरू किया। टाटा एलेक्सी में उन्होंने सितंबर 2014 से जुलाई 2016 तक काम किया। इसके बाद शांतनु अमेरिका चले गए। यहां न्यूयॉर्क के कॉर्नेल जॉनसन ग्रेजुएट स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में 2016 से 2018 के बीच एमबीए की पढ़ाई की।



जुलाई 2018 में शांतनु को टाटा ट्रस्ट्स में चेयरमैन के कार्यालय का उप महाप्रबंधक बना दिया गया। वहीं मई 2022 में वह रतन टाटा की निजी निवेश कंपनी आरएनटी कार्यालय में महाप्रबंधक बन गए।
 

रतन टाटा और शांतनु नायडू - फोटो : AMAR UJALA
रतन टाटा से कैसे जुड़े?
शांतनु नायडू की रतन टाटा के साथ घनिष्ठ मित्रता की वजह बेहद दिलचस्प है। शांतनु पिछले छह साल से अधिक समय से दिग्गज कारोबारी और टाटा समूह के मानद चेयरमैन रतन टाटा के साथ काम कर रहे थे। हालांकि, दोनों की मुलाकात 2014 में हुई जब शांतनु पुणे में टाटा एलेक्सी में ऑटोमोबाइल डिजाइन इंजीनियर के तौर पर काम कर रहे थे। पुणे में देर रात हाईवे से गुजरते समय शांतनु को सड़क पर कुत्तों के शव दिखाई देते थे, जिनकी तेज रफ्तार से चलने वाली गाड़ियों के नीचे आने से मौत हो जाती थी।

इन घटनाओं ने शांतनु को बहुत परेशान किया और वह सोचने लगे कि आवारा कुत्तों की जान कैसे बचाई जा सकती है। इससे शांतनु परेशान हो गए और सोचने लगे कि वह सड़क पर रहने वाले कुत्तों की जान कैसे बचा सकते हैं। एक साक्षात्कार में शांतनु ने बताया कि उन्होंने उन लोगों से बात की जो कुत्तों की वजह से सड़क दुर्घटनाओं में घायल हुए थे जिनसे दृश्यता की कमी की परेशानी पता चली। 'दृश्यता की इतनी कमी थी कि चालक को अपनी जान खतरे में डाले बिना यह तय करने का पर्याप्त समय मिल सके कि उसे किस रास्ते पर जाना है। चूंकि मैं एक ऑटोमोबाइल इंजीनियर था, इसलिए मेरे मन में कुत्तों के लिए कॉलर बनाने का विचार आया जिससे वे रात में स्ट्रीट लाइट के बिना भी दिखाई दे सकें।'

शांतनु नायडू - फोटो : motopaws
चंदा करके बनाया डॉग कॉलर 
कई तरह के प्रयासों के बाद शांतनु ने एक डॉग कॉलर बनाया। कॉलर को बनाने के लिए शांतनु और उनके मित्रों ने चंदा किया। शांतनु ने बताया, 'मैं तब 23 साल का था और मेरे दोस्तों और मेरे पास इसे खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।' लेकिन यह छोटा सा प्रयास लोगों की नजर में भी आ गया। शांतनु का गली के कुत्तों के लिए रिफ्लेक्टिव कॉलर रात में उनकी जान बचा रहा था और लोग लगातार प्रतिक्रिया भेज रहे थे कि यह एक मुहिम अच्छी है और इससे उन्हें कम दृश्यता के कारण किसी की जान को बचाने में मदद मिली। 

रतन टाटा - फोटो : instagram/ratantata
न्यूजलेटर से टाटा को शांतनु का काम की जानकारी हुई
शांतनु का यह काम टाटा समूह और रतन टाटा तक पहुंच गया जिनका खुद कुत्तों से काफी लगाव था। एक युवा के इस नेक काम के बारे में टाटा समूह की कंपनियों के न्यूजलेटर में लिखा गया और यह रतन टाटा के ध्यान में आया। शांतनु ने साक्षात्कार में बताया, 'लोगों ने मुझे इस बारे में रतन टाटा को लिखने को कहा और उन्होंने ऐसा किया और लंबे समय तक कुछ नहीं हुआ। लेकिन मेरे पिता आशावान थे।'

रतन टाटा के साथ शांतनु नायडू - फोटो : पीटीआई
अचानक रतन टाटा से मिलने का निमंत्रण मिला
एक दिन शांतनु को रतन टाटा से मुंबई में उनके कार्यालय में मिलने का निमंत्रण मिला। शांतनु कहते हैं, 'टाटा ने हमारे काम के लिए बहुत प्यार जताया, क्योंकि उन्हें स्ट्रीट डॉग्स से बहुत प्यार है और उन्होंने मुझसे पूछा कि हमें किस तरह का सहयोग चाहिए। मैंने कहा कि हमें किसी तरह का सहयोग नहीं चाहिए, लेकिन हम छात्र हैं, इसलिए उन्होंने जोर दिया और हमारे प्रयास में अघोषित निवेश किया।' 

रतन टाटा और उनके सबसे करीबी दोस्त शांतनु नायडू - फोटो : AMAR UJALA
दोस्ती बढ़ती गई
इस जुड़ाव के बाद शांतनु रतन टाटा के संपर्क में रहे और अक्सर उनसे सलाह और मार्गदर्शन लेते रहे। शांतनु कहते हैं, 'हमारे निवेश के बाद मैं उनके संपर्क में रहा और उनसे विभिन्न विषयों और मुद्दों पर बात करता रहा और हमारी दोस्ती बढ़ती गई। एक दिन मैंने टाटा को कॉर्नेल में एमबीए करने की अपनी योजना के बारे में बताया। जैसे ही मुझे कॉर्नेल में दाखिला मिला मैंने टाटा को बताया कि मैं स्नातक होने के बाद टाटा ट्रस्ट में योगदान करने का अवसर तलाशने के लिए भारत लौटूंगा।' 

शांतनु नायडू - फोटो : PTI
'दुख प्रेम की कीमत है'
जब शांतनु अपनी डिग्री लेकर वापस लौटे तो टाटा ने उन्हें अपने कार्यालय में शामिल होने के लिए कहा। यह 2018 की बात है। और तब से वह उनके कार्यालय में काम कर रहे हैं। शांतनु को उम्मीद है कि वह निकट भविष्य में रतन टाटा से सीखी गई बातों की सूची संकलित करेंगे। अब जब रतन टाटा ने दुनिया को अलविदा कह दिया है तो शांतनु को अपने 'दीपस्तम्भ' के जाने का भारी गम है। लेकिन शांतनु कहते हैं...दुख प्रेम की कीमत है...।
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