मुंबई के बांद्रा और ठाणे के मुंब्रा में मजदूरों, कामगारों की भीड़ ने लॉकडाउन की व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दीं। यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले दिल्ली में मार्च महीने के आखिरी सप्ताह में ऐसा हुआ था। तीन दिन पहले सूरत में भी दूसरे राज्यों के मजदूर सड़क पर उतर आए थे।
अहमदाबाद में भी यही हुआ। आखिर इस तरह के हालात के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या इसके पीछे कुछ लोगों की साजिश है या फिर सरकार के तंत्र से भी कोई बड़ी चूक हुई है? फिलहाल मुंबई पुलिस मामले की पड़ताल कर रही है, लेकिन मजदूरों के बांद्रा में जमावड़े को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।
क्या रेलवे के चीफ कामर्शियल मैनेजर की चिट्ठी जिम्मेदार नहीं?
साउथ सेंट्रल रेलवे के डिप्टी चीफ कमर्शियल मैनेजर ए बालेश्वरा राव ने डिप्टी कमर्शियल मैनेजर को चिट्ठी लिखी। यह चिट्ठी प्रधानमंत्री की लॉकडाउन को लेकर राज्यों के सीएम से चर्चा के बाद जारी हुई।
सीसीएम ने 13 अप्रैल को पत्र लिखकर जनसाधारण एक्सप्रेस (अनारक्षित) को चलाने के संदर्भ में मजदूरों की पलायन संबंधी संख्या के बारे में जानकारी मांगी। रेलवे ने लॉकडाउन से अब तक 39 लाख टिकट भी बुक किए।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह इसे बड़ी चूक मानते हैं। इसमें वह रेलवे की तरफ से की गई बड़ी लापरवाही मानते हैं। संजय सिंह का कहना है कि सीसीएम के पत्र को आधार बनाकर मुंबई और महाराष्ट्र में टीवी चैनलों ने खबर भी प्रसारित की। आखिर इसमें मजदूरों का क्या दोष है?
गरीब, मजदूर क्यों जाना चाहते हैं?
शिवसेना के लोकसभा में नेता विनायक राउत मुंबई की एक तस्वीर खींचते हैं। वहां की चाल, झुग्गी बस्तियों में दिन में भी सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती। धारावी जैसे क्षेत्र का भी हाल यहीं है। यहां तीन-चार मंजिल की झुग्गियां हैं। पतली-संकरी गलियां हैं। इनमें मेहनतकश रहते हैं।
भाजपा के नेता चंद्रकांत पाटील का भी मानना है कि मुंबई में आबादी काफी घनी है। दूसरे राज्यों के गरीब मजदूरों की संख्या काफी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण भी इससे इनकार नहीं करते।
महाराष्ट्र इलेक्ट्रिसिटी में काम करने वाले विजय यादव, रेलवे में काम करने वाले अनिल गुप्ता का कहना है कि मुंबई का गरीब, मजदूर क्लास नाला सोपाड़ा, बदलापुर, वीरार तक फैला है। मुंबई की चाल, खोली (रहने की जगह) में रहता है।
यह वह तबका है, जो मुंबई में कमाता है और दूसरे राज्य में रह रहे अपने परिवार का खर्च चलाता है। विजय, अनिल सभी का कहना है कि मुंबई में 13 मार्च से बस सेवा (बीएसटी) बंद है।
लॉकडाउन में काम-धंधा सब बंद है। छोटे से अंधेरे नुमा कमरे में आठ-दस लोग किराए पर शिफ्टवाइज रहते हैं। लोहे के पतरे से बने इन कमरों में इतनी जगह भी नहीं होती कि एक साथ इतने लोग सो सकें। इसलिए उनकी गांव जाने की अकुलाहट समझी जा सकती है।
लॉकडाउन ही उपाय लेकिन सरकार का तरीका गलत
कांग्रेस पार्टी की तेज तर्रार नेता सुष्मिता देव ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लॉकडाउन पर नहीं, लॉकडाउन के तरीके पर सवाल उठाया था। कांग्रेस पार्टी के एक अन्य नेता ने कहा कि सरकार ने अचानक लॉकडाउन की घोषणा कर दी, लेकिन देश भर में फैले दूसरे राज्यों के गरीब, मजदूर, कामगार, दिहाड़ी मेहनत पर रोटी खाने वालों के बारे में नहीं सोचा।
इनके पास न तो राशन कार्ड है और न रहने का ठिकाना। किसी तरह जीवन-बसर करते हैं। इनसे आखिर लॉकडाउन ऐसे कैसे सहा जाएगा। अब यह भीड़ कभी दिल्ली में उमड़ पड़ती है, तो कभी अहमदाबाद में। कभी सूरत में तो अब मुंबई में। दिल्ली में भीड़ जुटी थी तो प्रधानमंत्री ने अगले दिन माफी मांग ली थी, अब यहां कौन मांगेगा?
महाराष्ट्र के पर्यटन मंत्री आदित्य ठाकरे ने मजदूरों के इस तरह के पलायन के लिए केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। ठाकरे का कहना है कि सरकार को दूर-दराज के मजदूरों को उनके गृह नगर जाने की विस्तृत रूपरेखा तैयार करने के बारे में सोचना चाहिए।
भाजपा के नेताओं के बयान भी गले के नीचे नहीं उतरते
भाजपा नेता किरीट सोमैया का दावा है कि बांद्रा की घटना पूर्व नियोजित थी। कहते हैं, इससे संबंधित एक वीडियो चल रहा है जिसे मैंने मुंबई पुलिस कमिश्नर के पास भेजा है। पूर्व विधायक राजहंस सिंह ने कहा कि बांद्रा में जुटी भीड़ न केवल साजिश है बल्कि इसमें किसी संस्था या संगठन की भूमिका हो सकती है।
इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी बांद्रा पश्चिम निवासी व भाजपा कामगार आघाड़ी मुंबई के नेता चंदु तिवारी कहते हैं कि स्टेशन पर इकट्ठा होने से पहले लोग जामा मस्जिद के पास जमा हुए। इनमें से किसी के पास बैग अथवा कोई अन्य सामान हाथ में नहीं था। ऐसे में गांव जाने के लिए इकट्ठा होने की बात हजम नहीं हो रही है।
मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने पहले ही 30 अप्रैल तक लॉकडाउन की घोषणा कर दी थी। ऐसे में मजदूरों को किसने भड़काया, इसकी गहराई से जांच होनी चाहिए। आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह इसे लोगों की घटिया मानसिकता करार दे रहे हैं।
संजय सिंह का कहना है कि भाजपा और तमाम ऐसे लोगों की आदत बन गई है। ये हर मुद्दे को हिन्दू बनाम मुसलमान की नजर से देख रहे हैं। आखिर इसमें बांद्रा की मस्जिद का जिक्र करने का अर्थ क्या है?
कई पत्रकार भी यही भाषा टीवी पर बोल रहे हैं। उन्हें यह क्यों नहीं समझ में आता कि मजदूर जीवन की रोटी-रोजी कमाने गया है। उसका काम बंद है और सामने भूख का संकट खड़ा होगा तो वह क्या करेंगा?
मुंबई पुलिस कर रही है जांच
गृहमंत्री अनिल देशमुख का मानना है कि लोगों ने ट्रेन चलने की अफवाह फैलाई। इसके सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोग इकट्ठा हो गए। उन्होंने घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं।
डीसीपी अभिषेक त्रिमुखे ने कहा कि बांद्रा स्टेशन के पास लॉकडाउन का उल्लंघन कर जमा हुए लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पुलिस सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर जांच कर रही है। कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। सोशल मीडिया पर उकसावे वाले बयान के साथ ही पुलिस वायरल हुए वीडियो की जांच कर रही है।
व्यावहारिकता को समझे सरकार
उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग के उपनिदेशक विमलेन्द्र औचित्य को 27 मार्च से लेकर कुछ दिनों तक लोगों के फोन आते थे कि गांव पहुंचा दो। लेकिन अब फोन नहीं आते। औचित्य ने बताया कि भोजन या आश्रय का समुचित प्रबंध किए जाने के बाद लोगों को लॉकडाउन में जहां हैं, वहीं सुरक्षित रहने की बात समझ में आ गई है।
औचित्य के बयान को लोग अधिकारी का बयान मान रहे हैं। मुंबई में रिलायंस इंडस्ट्रीज में काम करने वाले आजमगढ़ जिले के विवेक का कहना है कि व्यावहारिक स्थिति इसके काफी उलट है। लोगों की परेशानी से इंकार नहीं किया जा सकता।
विवेक का कहना है कि लोगों को घर जाने की एक रोशनी दिख जाए तो लाखों लोग महज कुछ घंटों में स्टेशन पर खड़े हो जाएंगे।