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भाजपा-कांग्रेस के लिए मुसीबत बन सकते हैं इत्र व्यापारी और AIUDF सांसद बदरुद्दीन अजमल

Thu, 22 Feb 2018 11:15 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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बदरुद्दीन अजमल
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थलसेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने उत्तर-पूर्वी राज्यों में तेजी से बढ़ रही राजनीतिक पार्टी AIUDF के बारे में चौंकाने वाला बयान दिया है। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर में AIUDF तेजी से आगे बढ़ रही है। जनसंघ का आज तक का जो सफर रहा है उसके मुकाबले एआईयूडीएफ का विकास तेजी से हुआ है। एआईयूडीएफ (ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) मुस्लिमों की आवाज उठाता है और इसके मुखिया हैं इत्र व्यापारी बदरुद्दीन अजमल।
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असम की राजनीति में अजमल की हैसियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मात्र 10-12 साल के छोटे से राजनीतिक सफर में इनकी पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी है कि उनकी पार्टी 18 विधायकों और तीन सांसदों के साथ राज्य की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन चुकी है। 

कोई उन्हें मौजूदा चुनावों में किंगमेकर के रूप में देखता है तो काफी लोगों का मानना है कि बदरुद्दीन और बड़ी ताकत बन सकते हैं। कुछ लोगों की नजर में मौलाना राजनीति के मामले में मुस्लिमों के बीच जबरदस्त रूप से लोकप्रियता पा रहे असदुद्दीन ओवैसी से भी बड़े खिलाड़ी माने जाते रहे हैं। 
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पहली नजर में किसी मदरसे के मौलाना लगते हैं

साधारण कद काठी वाले बदरुद्दीन पहली नजर में किसी मदरसे के मौलाना की तरह लगते हैं लेकिन ये उनकी शख्सियत का असली पहलू नहीं है, उन्होंने राज्य की राजनीति में तेजी से अपनी पहचान और पकड़ बनाई है।

पुरखों के दशकों पुराने इत्र के कारोबार को मजबूती से जमाने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा तो चंद सालों में ही तेजी से लोकप्रियता की सीढ़ियां चढ़ीं। 2005 में पहली बार उन्होंने आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नाम से अपनी पार्टी बनाई और अगले ही साल 2006 के विधानसभा चुनावों में उतरे। 

राजनीतिक पंडित उस समय भौचक्के रह गए जब उन्होंने सबको चौंकाते हुए 126 सदस्यीय विधानसभा में से दस सीटें अपने नाम कर ली। मुंबई में पैदा हुए अजमल ने अपनी पढ़ाई उत्तर प्रदेश के देवबंद से की। पढ़ाई पूरी कर राज्य में वापस लौटने के साथ ही अजमल इस बात को अच्छी तरह भांप चुके थे कि 35 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले असम में कौम नेतृत्व विहीन है। 

मौलाना ने इस बात को समझा और मुसलमानों को गोलबंद किया। इसके लिए उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक दोनों रूप से अपनी पहचान बनाई। उन्होंने राज्य में कई मदरसों का निर्माण कराया और कई शिक्षण संस्थानों की भी स्थापना की। 

मुस्लिमों से जुड़े हर मुद्दे पर वह मुखर होकर उनका पक्ष रखते और लड़ने मरने को तैयार रहते। उनका यह अंदाज राज्य के मुस्लिमों को खासा पसंद आया। बांग्लादेश से आए मुस्लिमों के प्रति उनके सख्त रवैये ने उन्हें गैर मुस्लिमों में भी लोकप्रिय बनाया।
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2014 के लोकसभा चुनावों में राज्य की 14 में से तीन सीटें जीती

अजमल ने 2005 में अपनी पार्टी बनाई थी और उसके अगले साल ही हुए विधानसभा चुनाव में मैदान में उतरे थे। तब मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने सवाल किया कि यह बदरुद्दीन अजमल कौन है, लेकिन असम की राजनीति में अजमल की हैसियत को ध्यान में रखते हुए अब वह यह सवाल करने का साहस नहीं कर सकते। पहली बार मैदान में उतरी अजमल की पार्टी ने वर्ष 2006 में अल्पसंख्यकों के समर्थन से 10 सीटें जीतने के बाद वर्ष 2011 में 18 सीटें जीती थी।

तब उसे दो बार सत्ता में रही असम गण परिषद से भी ज्यादा सीटें मिली थी। 2014 के लोकसभा चुनावों में राज्य की 14 में से तीन सीटें जीत कर एआईयूडीएफ ने राजनीतिक पंडितों को भी हैरत में डाल दिया था।

उसके बाद राज्य की राजनीति में अजमल का कद तेजी से बढ़ा है। अजमल एक सफल कारोबारी व राजनेता के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। इसके अलावा जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर भी उनकी अलग पहचान है।
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