पर्यटकों से गुलजार रहने वाले केरल के एलेप्पी शहर में हर साल कुठियट्टम नाम की एक परंपरा निभाई जाती है, जिसमें सांकेतिक तौर पर इंसान की बलि दी जाती है। 'चूरल मूरियल' इस परंपरा का एक हिस्सा है और इस पर पाबंदी लगाने की हजारों लोग मांग कर चुके हैं।
क्या है चूरल मूरियल?
चूरल मूरियल कुठियट्टम नामक धार्मिक अनुष्ठान का एक हिस्सा है जिसके तहत आठ से 12 साल की उम्र के एक या दो गरीब लड़कों को खरीदा जाता है। जिसके बाद उनकी पसलियों को छेदकर उसमें सोने और चांदी के धागे या बांस की डंडी डाली जाती है। यह बलिदान चेट्टिकुलंगरा मंदिर में भगवान को प्रसन्न करने के लिए दिया जाता है। आपको इस बलिदान के पीछे की चाहतों के बारे में जानकर हैरत होगी। जिसमें इंजीनियरिंग में दाखिला होने से लेकर शादीशुदा लोगों के माता-पिता बनने की चाहत और नौकरी पाने की इच्छा तक शामिल होती है।
शुरुआत में यह बच्चे उन भक्तों के होते थे जो अपनी मुराद लेकर भगवान के दर पर जाते थे। लेकिन हर चीज की तरह, यह रस्म भी उन वंचित माता-पिता और रिश्तेदारों के बच्चों को आउटसोर्स कर दी गई जो तत्काल कुछ पैसा कमाना चाहते थे।
चेट्टिकुलंगरा मंदिर उन प्रमुख मंदिरों में शामिल है जहां ढाई सौ साल पुरानी यह परंपरा अब भी निभाई जाती है। इसके शुरू होने के पीछे कई कहानियां हैं। इनमें सबसे मशहूर उस राजा की कहानी है जो देवी भद्रकाली को प्रसन्न करना चाहते थे। राजा की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भद्रकाली ने राजा को वरदान दिया। राजा ने अपनी प्रजा की खुशहाली मांगी। किंवदंतियों के मुताबिक देवी ने राजा से कहा कि वह एक योग्य लड़के को खोजे, उसे पढ़ाए-लिखाए और जब वह 10 साल का हो जाए तो उसकी बलि चढ़ा दे।
चूरल मूरियल का खूनी सच
कुम्भम महीने में एक खास दिन पर, मालिक इन लड़कों की पसलियों को छेदते हैं और सोने या चांदी के तार या बांस की डंडी उन छेदों के जरिये पार करते हैं। इसके बाद इन बच्चों को हाथ उपर कर मंदिर तक नाचते हुए जाने को कहा जाता है, ताकि वे उन तारों को अपने हाथों से छू ना सकें। यह सब कुछ एक पूरे जलसे के रूप में होता है जिसमें बहुत से लोग, पारंपरिक संगीत और वाद्य यंत्र होते हैं।
इन बच्चों को मंदिर पहुंचने में घंटों का समय लगता है। उनके आसपास के लोग उनके रिसते घावों पर नारियल पानी डालते हैं, हाथों से हवा करते हैं। लेकिन इन बच्चों की चीखें और आंसू नहीं रुकते। मंदिर पहुंचने पर इन धागों को खींचकर निकाला जाता है और मंदिर में चढ़ाया जाता है। जिससे यह प्रतीत होता है कि मूर्ति के समक्ष उनका बलिदान दे दिया गया है और बलि पूरी मान ली जाती है।