एआईएडीएमके महासचिव और मुख्यमंत्री चुनी गईं शशिकला नटराजन का विरोध करने के कारण तमिलनाडु के कार्यवाहक मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम को पार्टी से निकाले जाने के साथ ही भारतीय राजनीति की उस कहानी में एक अध्याय और जुड़ गया जिसमें नेतृत्व का विरोध या बात न मानने का खामियाजा मुख्यमंत्रियों को पार्टी से छुट्टी के रूप में उठाना पड़ा है।
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बीते दो सालों में ही पनीरसेल्व ऐसे चौथे मुख्यमंत्री हैं जिन्हें उन्हीं की पार्टी ने एक झटके में पार्टी से निकालकर बाहर कर दिया। हालांकि इनमें से कुछ वापसी कर अपनी सत्ता बचाने में सफल रहे तो कुछ राजनीति में पूरी तरह हाशिये पर चले गए।
पनीरसेल्वम का क्या हश्र होगा यह तो कहना अभी मुश्किल होगा, लेकिन उससे पहले हम आपको बताते हैं उन मुख्यमंत्रियों के बारे में जिन्हें उनकी ही पार्टी ने पद और पार्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया या निकाल दिया।
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कल्याण सिंह- भाजपा
- फोटो : कल्याण सिंह
यूपी में भाजपा के शिखर पुरुष रहे और एक दौर में वाजपेयी-आड़वाणी की जोड़ी के बाद सबसे बड़े नेता माने जाने वाले यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह बेशक आज भाजपा में वापसी के बाद शाही जीवन जी रहे हों लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब उन्हें पार्टी से निष्कासन का दंश झेलना पड़ा था।
साल 1999 में यूपी का मुख्यमंत्री रहते पार्टी के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी से मतभेदों के चलते उन्होंने खुलकर पार्टी नेताओं की मुखालफत शुरू कर दी। शुरू में पार्टी ने उन्हें कई चेतावनी देकर समझाने का प्रयास किया लेकिन कल्याण सिंह का बागी रुख जारी रहा, नतीजतन पार्टी ने कड़ा निर्णय लेते हुए उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाकर रामप्रकाश गुप्त को यूपी की कमान सौंप दी।
इसके बाद कल्याण सिंह खुलकर विद्रोही हो गए और उन्होंने पार्टी नेतृत्व को ही चुनौती दे डाली, नतीजतन पार्टी ने अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए कल्याण सिंह को छह साल के लिए पार्टी से बाहर कर दिया। इसके बाद दो बार पार्टी में उनकी वापसी हुई।
जीतन मांझी- बिहार
पिछले लोकसभा चुनावों में बुरी तरह हार का मुंह देखने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अत्प्रत्याशित कदम उठाते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उन्होंने बड़ा दांव चलते हुए महादलित जीतन राम मांझी को प्रदेश की कमान सौंपकर सत्ता अपने हाथ में रही रखने का प्रयास किया। लेकिन कुछ दिन बाद ही मांझी के तेवर बागी होने लगे।
वो पार्टी और नीतीश के रुख से अलग कदम उठाने लगे, मामला बिगड़ता देख नीतीश ने दोबारा सत्ता अपने हाथ में लेने का प्रयास किया तो मांझी ने उन्हें ही चुनौती दे डाली। इस पर पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया, लेकिन मांझी तब भी नहीं झुके और विधानसभा में बहुमत साबित करने का दावा ठोक दिया।
हालांकि बहुमत साबित करने से पहले ही मांझी ने हथियार डाल दिए और नीतीश की दोबारा मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी हुई। उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर बिहार चुनाव भी लड़ा लेकिन मात्र एक सीट पर सिमटकर रह गए। इसके बाद से ही मांझी राजनीति के नेपथ्य में चले गए।
पेमा खांडू- कांग्रेस-पीपीए
दिसंबर 2015 में पूर्व के सबसे बड़े राज्य अरुणाचल प्रदेश में अचानक सत्ता में परिवर्तन की शुरूआत हुई। जब सत्तारूढ़ कांग्रेस के मुख्यमंत्री नबाम तुकी के नेतृत्व का विरोध करते हुए अन्य विधायकों ने मोर्चा खोल दिया। इसी बीच बागी कालिखो पुल ने अन्य बागी विधायकों के साथ भाजपा के समर्थन से नई सरकार का गठन कर दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो कोर्ट ने राज्यपाल की भूमिका को गलत बताते हुए तुकी की सरकार की वापसी कर दी।
हालांकि कालिखो पुल के नेतृत्व में बागी विधायकों ने तुकी को समर्थन करने से इंकार कर दिया, जिसके बाद पेमा खांडू के नेतृत्व में नई सरकार का गठन किया गया। इसके बाद खांडू ने 43 कांग्रेस विधायकों के साथ राज्य के छोटे से राजनीतिक दल पीपीए की सदस्यता ले ली।
लेकिन यह कवायद भी ज्यादा लंबी नहीं चल सकी और बीते साल दिसंबर महीने में पीपीए ने खांडू को ही पार्टी से बाहर करते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा दिया। हालांकि भाजपा के समर्थन से खांडू अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे और फिलहाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जमे हुए हैं।
कुछ दिन पहले यूपी की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में मचे घमासान के बीच राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ही पार्टी से निकाल दिया था। इससे पहले मुलायम सिंह रामगोपाल यादव और अन्य वरिष्ठ नेताओं की भी पार्टी से छुट्टी कर चुके थे।
हालांकि पार्टी से निकाले जाने के बावजूद भी अखिलेश मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहे थे, कुछ दिन बाद ही तेजी से बदले राजनीतिक घटनाक्रम के बीच उनकी पार्टी में वापसी भी हुई और वो पिता मुलायम सिंह को हटाकर खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने में भी सफल रहे। आज पार्टी उन्हीं के नेतृत्व में सपा-कांग्रेस गठबंधन के साथ यूपी चुनावों में उतरी हुई है।
ओ पनीरसेल्वम
तमिलनाडु के कार्यवाहक मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम को एआईएडीएमके की सबसे बड़ी नेता जयललिता की मौत के बाद राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया था। उन्हें जयललिता का सबसे ज्यादा विश्वासपात्र माना जाता था इसलिए जब भी उन्होंने मुख्यमंत्री रहते पद छोड़ा सत्ता की बागडोर उनके हाथों में ही सौंपी।
जयललिता की मौत के बाद भी पनीरसेल्वम को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया गया था लेकिन कुछ दिनों के अंदर ही नई पार्टी महासचिव और जया की सहेली रही शशिकला की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं सामने आने लगीं। जिसके बाद उन्होंने पनीरसेल्वम को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बनने की राह तैयार कर ली, उनकी राह में पनीरसेल्वम रोड़ा बने तो एक झटके में उन्हें पहले पार्टी कोषाध्यक्ष और फिर पार्टी से ही निकाल दिया गया। अब सीएम पद से इस्तीफा देने वाले पनीरसेल्वम इस्तीफा वापस लेने का दावा कर रहे हैं।