भुवन का कहना है कि अगर पॉक्सो के तहत कोई नया मामला दर्ज न हो तो अकेले गुजरात में पेंडिग मामले साल 2071 तक खत्म होंगे, वहीं अरुणाचल प्रदेश में साल 2117 तक और दिल्ली में 2029 तक ही बच्चों को न्याय मिल पाएगा।
उन्होंने बताया कि दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल हलफनामे के मुताबिक पॉक्सो एक्ट के तहत साल 2012 से 2015 तक 5217 केस दर्ज किए गए, जिनमें से 11 प्रतिशत की रफ्तार से केवल 575 मामलों का ही निबटारा हुआ। वहीं केरल में साल 2039, पश्चिमी बंगाल में साल 2035, महाराष्ट्र में साल 2032 और बिहार में 2029 तक ही मामले खत्म हो पाएंगे।
मात्र 620 विशेष अदालतें
उन्होंने बताया कि पॉक्सो मामलों का निबटारा करने के लिए देशभर में मात्र 620 विशेष अदालतें ही हैं, जबकि साल 2014 में पूरे देश में 9 हजार केस रजिस्टर किए गए, 2015 यह संख्या बढ़ कर 15 हजार पहुंच गई।
भुवन ने न्याय में देरी का हवाला देते हुए कहा कि 2013 में पूर्वी दिल्ली में पांच वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार की घटना हुई थी, जिसमें ट्रायल उसी साल शुरू हो गया था, लेकिन अदालत ने 2017 में आरोपी को ज्युवेनाइल घोषित कर दिया।
इस साल मार्च में यह मामला हाई कोर्ट में सुनवाई पर आया, लेकिन अदालत ने आरोपी की किशोरता साबित करने के लिए दोबारा निचली अदालत में मामला भेज दिया। इस साल जुलाई में अदालत ने फैसला दिया कि घटना के दौरान आरोपी बालिग था।
वहीं इस साल सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट्स को ज्यूडिशियल कमेटी बनाने का निर्देश दिया है, जिसमें 3 से ज्यादा जज शामिल होंगे। ये कमेटी विशेष अदालतों में चल रहे पॉक्सो के तहत चल रहे मामलों पर नजर रखेगी। साथ ही शीर्ष अदालत ने देश के उच्च न्यायलयों को यह भी निर्देश दिया कि वह समय-समय पर फास्ट ट्रैक अदालतों पॉक्सो के मामलों का जल्द निबटारा करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करते रहें।
पॉक्सो के सेक्शन 35 के मुताबिक ट्रायल का जल्द से जल्द निबटारा करना जरूरी है। वहीं हाल ही हुए संशोधनों के तहत पुलिस को अपनी जांच दो महीनों के भीतर करनी होगी, वहीं अगले दो माह में ट्रॉयल पूरा करना होगा और छह माह के भीतर अपील का निबटारा करना होगा।