केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में सिपाही से लेकर डीजी रैंक तक जब कोई रिटायर होता है तो उस वक्त वे वर्दी में रहते हैं। डीजी हैं तो उन्हें मुख्यालय के गेट तक जिप्सी में बैठाकर उसे रस्सी से खींच कर विदाई देने का रिवाज है। सिपाही या हवलदार है तो उसके साथी व इंस्पेक्टर स्तर के कर्मी उनकी विदाई पार्टी करते हैं। पिछले दिनों आईटीबीपी में एक अनूठा उदाहरण देखने को मिला था। उसमें एक एसआई को जिप्सी में बैठाकर विदाई दी गई। उसे खींचने वालों में कमांडेंट एवं डीआईजी स्तर के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे।
अब सवाल ये उठता है कि रिटायरमेंट के बाद इनकी वर्दी कहां चली जाती है। सहायक कमांडेंट से लेकर डीजी तक के अधिकारी अपनी वर्दी साथ ले जाते हैं। सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक के कर्मी, कुछ समय बाद वर्दी को जमा कराने आते हैं, बशर्ते उनकी वर्दी बल से जारी हुई हो। कई बार ऐसा भी होता है कि रिटायरमेंट वाले दिन डीजी या दूसरे अधिकारियों और कर्मियों को अपने मुख्यालय से सिविल ड्रेस में ही विदाई लेनी पड़ती है।
आपको ध्यान होगा कि 28 फरवरी को सीआरपीएफ के डीजी डॉ. एपी माहेश्वरी जब रिटायर हुए तो वे सिविल ड्रेस में थे। उन्होंने नीले रंग का कोट पहन रखा था। उन्हें विदाई देने वाले ज्यादातर अधिकारी भी सिविल ड्रेस में थे। वजह, उस दिन रविवार था। अगर वर्किंग डे होता तो डॉ. माहेश्वरी वर्दी पहनकर अपने घर जाते। सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पवार कहते हैं, कई बलों में एक दिन बतौर मेंटेनेंस डे रहता है। उस दिन भी वर्दी नहीं पहनी जाती। यदि कोई अधिकारी या जवान उस दिन रिटायर होता है तो वह सिविल ड्रेस में ही विदाई लेता है।
पहले सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक के कर्मी अपने बल से वर्दी लेते थे, इसलिए उन्हें रिटायरमेंट के बाद उसे जमा कराना पड़ता था। बल द्वारा इसके लिए बाकायदा एक प्रमाण पत्र जारी किया जाता है।आजकल बहुत से कर्मी वर्दी भत्ता लेकर उसे अपने हिसाब से तैयार करा लेते हैं। ऐसे में रिटायरमेंट के बाद वे उसे अपने साथ ले जाते हैं।
सहायक कमांडेंट से लेकर डीजी तक के अधिकारी रिटायरमेंट के बाद वर्दी अपने साथ रखते हैं। कुछ अधिकारी अपने जूनियर को वह वर्दी दे देते हैं। वे अपने रैंक के हिसाब से उसे तैयार कराकर पहन सकते हैं। खास बात ये है कि रिटायरमेंट के बाद कोई भी कर्मी या अधिकारी इस वर्दी को पहन नहीं सकता है। वह घर में टंगी रहती है। रिटायरमेंट के बाद संबंधित कर्मी के बच्चे उस वर्दी को देखकर गौरव महसूस करते हैं कि उनके पिता देश के एक बड़े सुरक्षा बल का हिस्सा रहे हैं।