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पत्रकारिता में खेती किसानी के मसले कहां हैं

Sun, 26 Aug 2018 04:08 PM IST
राजेश बादल
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sewagram
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सेवाग्राम में तीसरा और अंतिम दिन। सुबह सुबह रज्जु राय के साथ सैर से लौट रहे थे। एक गुमटी पर सचिन जैन, साथी राकेश मालवीय और कुछ मित्र चाय पीते दिखाई पड़े। हमें भी आमंत्रण दिया। चाय अच्छी थी। सेवा ग्राम की कौन कौन सी बातें याद आएंगीं - इस पर चर्चा होती रही। मुझे सेवाग्राम का सन्नाटा और शुद्ध मावे के पेड़े का स्वाद कभी नही भूलेगा।

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लेकिन न भूलने वाला सत्र पी साईंनाथ का भी था। पूरे तथ्यों और प्रामाणिक जानकारी के साथ उन्होंने आज के भारत में गुम हो रहे किसानों की व्यथा बयान की। बीते दिनों नासिक से मुंबई तक किसानों की पदयात्रा का जो ब्यौरा उन्होंने प्रस्तुत किया,उसे सुनकर सभी सिहर गए ।नासिक से182 किसान चले थे । भीषण गर्मी में ।नंगे पांव । ज्यादा गर्मी लगी तो पैरों में सेलो टेप लपेट लिया । मुंबई पहुंचते पहुंचते 40,000 किसान हो गए । यह सुखद है ।

पी साईंनाथ ने कहा कि आज राष्ट्रीय अखबारों में कृषि और भारत के गांवों के लिए कोई स्थान नहीं है। चुनावी साल में मध्यप्रदेश सरकार ने भावन्तर योजना पर किताबें छाप कर बांटी। उनमें मंदसौर गोलीकांड और उस पूरे प्रसंग में किसानों के साथ अत्याचार का कोई जिक्र ही नहीं था। साईंनाथ आज भारत में सरोकार वाली पत्रकारिता का पर्याय बन चुके हैं। उन्होंने समर्थन मूल्य बढ़ाने और उसके पर्दे के पीछे की कहानी सुनाई । उत्पादन लागत का गणित लगाने में विसंगतियों का खुलासा किया।
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स्वामीनाथन रिपोर्ट को याद करते हुए उन्होंने सरकार पर तीखा प्रहार किया। बार-बार सरकार के अधिकृत बयानों में विरोधाभास ने सरकार को आम आदमी और किसानों के बीच उपहास का केंद्र बना दिया है । उन्होंने कहा कि भारतीय खेती कृत्रिम शक्ति के सहारे जिंदा है। मजबूरी है कि खेती बचाने के लिए गैर खेती से होनेवाली आय बहुत जरूरी हो गई है। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है । बीते 25 साल में कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी मसलों के खिलाफ नीतियां बनी हैं। असमानता बढ़ी है। कौन सा भारत हम बना रहे हैं। आज भी एक किसान की सालाना आय सिर्फ 6436 रुपए है। 70 साल बाद यह स्थिति। शर्मनाक।

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शिक्षा और स्वास्थ्य में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी है।सरकार ने पल्ला झाड़ लिया है।लेकिन किसानी तो हमेशा ही निजी क्षेत्र में रही है और रहेगी भी।यहाँ सरकार क्या करेगी ? पी साईंनाथ ने एक उदाहरण दिया कि बीस रुपये लीटर बॉटल पानी बेचने वाली कंपनियों को सरकार महज 4 पैसे प्रति लीटर पानी देती है और आम आदमी को 20 रुपए लीटर में मिलता है।

एक आदमी को सप्लाई का पानी 50 पैसे से लेकर एक रुपए प्रति लीटर तक मिलता है। बैंकों के एनपीए का 75 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा बड़े घरानों का है । कुल 78000 करोड़ रुपए डायमंड, गोल्ड,और ज्यूलरी उद्योग को इंसेंटिव के नाम पर दिए गए और गरीब किसानों को सब्सिडी देने पर रोना आता है। इंसेंटिव और सब्सिडी का अंतर समझने की जरूरत है। 42.3 खरब रुपए अब तक डूब चुके  हैं।

मीडिया नीतियों में इन विसंगतियों की न तो स्टडी करता है न चुनौती देता है । ऐसी सूरत में मीडिया की साख पर अनेक संकट हैं । बीते छह सात साल में 3 लाख10 हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। हर साल छत्तीसगढ़ में 1555 किसान आत्महत्या करते हैं। और अब तो आंकड़ों पर ही संकट है । 2016-17 के तो आंकड़े ही नहीं आए। एनएनआई हैदराबाद के आंकड़े न मिलते तो पता ही न चलता । 
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो अब आंकड़े देना बन्द कर रहा है ।

साईंनाथ के संबोधन ने वाकई विचलित कर दिया। एक पत्रकार आज के दौर में खुलकर एक्टिविस्ट की भूमिका क्यों नहीं निभाए?

हम नागपुर के लिए लौट रहे थे । लेकिन दिमाग में सवाल बड़े विकराल रूप में थे । गांधी यंग इंडिया और हरिजन निकालते समय पूर्णकालिक संपादक होने की बात कहते थे। उनके सरोकार ग्राम स्वराज और आजादी को लेकर ही थे। गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, बनारसीदास चतुर्वेदी और सरदार भगतसिंह भी पूर्णकालिक पत्रकार थे पर अपने अंदर के एक्टिविस्ट को साथ में जिंदा रखते रहे।

इन खयालों में विनोबा भावे का पवनार आश्रम कब निकल गया - याद ही नहीं रहा। तंद्रा टूटी ,जब ड्राइवर ने नागपुर एयरपोर्ट पर गाड़ी खड़ी कर दी और हमें उतरने का आदेश दिया । यकीन मानिए दिल्ली आने तक और उसके बाद से अब तक सेवाग्राम से उपजे सवाल हमें मथ रहे हैं ।
सलाम ! सेवाग्राम ।
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