शिक्षा और स्वास्थ्य में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी है।सरकार ने पल्ला झाड़ लिया है।लेकिन किसानी तो हमेशा ही निजी क्षेत्र में रही है और रहेगी भी।यहाँ सरकार क्या करेगी ? पी साईंनाथ ने एक उदाहरण दिया कि बीस रुपये लीटर बॉटल पानी बेचने वाली कंपनियों को सरकार महज 4 पैसे प्रति लीटर पानी देती है और आम आदमी को 20 रुपए लीटर में मिलता है।
एक आदमी को सप्लाई का पानी 50 पैसे से लेकर एक रुपए प्रति लीटर तक मिलता है। बैंकों के एनपीए का 75 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा बड़े घरानों का है । कुल 78000 करोड़ रुपए डायमंड, गोल्ड,और ज्यूलरी उद्योग को इंसेंटिव के नाम पर दिए गए और गरीब किसानों को सब्सिडी देने पर रोना आता है। इंसेंटिव और सब्सिडी का अंतर समझने की जरूरत है। 42.3 खरब रुपए अब तक डूब चुके हैं।
मीडिया नीतियों में इन विसंगतियों की न तो स्टडी करता है न चुनौती देता है । ऐसी सूरत में मीडिया की साख पर अनेक संकट हैं । बीते छह सात साल में 3 लाख10 हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। हर साल छत्तीसगढ़ में 1555 किसान आत्महत्या करते हैं। और अब तो आंकड़ों पर ही संकट है । 2016-17 के तो आंकड़े ही नहीं आए। एनएनआई हैदराबाद के आंकड़े न मिलते तो पता ही न चलता ।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो अब आंकड़े देना बन्द कर रहा है ।
साईंनाथ के संबोधन ने वाकई विचलित कर दिया। एक पत्रकार आज के दौर में खुलकर एक्टिविस्ट की भूमिका क्यों नहीं निभाए?
हम नागपुर के लिए लौट रहे थे । लेकिन दिमाग में सवाल बड़े विकराल रूप में थे । गांधी यंग इंडिया और हरिजन निकालते समय पूर्णकालिक संपादक होने की बात कहते थे। उनके सरोकार ग्राम स्वराज और आजादी को लेकर ही थे। गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, बनारसीदास चतुर्वेदी और सरदार भगतसिंह भी पूर्णकालिक पत्रकार थे पर अपने अंदर के एक्टिविस्ट को साथ में जिंदा रखते रहे।
इन खयालों में विनोबा भावे का पवनार आश्रम कब निकल गया - याद ही नहीं रहा। तंद्रा टूटी ,जब ड्राइवर ने नागपुर एयरपोर्ट पर गाड़ी खड़ी कर दी और हमें उतरने का आदेश दिया । यकीन मानिए दिल्ली आने तक और उसके बाद से अब तक सेवाग्राम से उपजे सवाल हमें मथ रहे हैं ।
सलाम ! सेवाग्राम ।