फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

चीनी फौज को जब भारतीय सैनिक मंदारिन भाषा में समझाते हैं, तो वे कंधे मारने लगते हैं...

Thu, 28 May 2020 03:23 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सेना और आईटीबीपी के करीब तीन सौ अफसरों और जवानों को चीनी भाषा सिखा दी गई। इसके बाद तय हुआ कि आईटीबीपी की जो भी टीम पेट्रोलिंग पर जाएगी, उसके साथ चीनी भाषा जानने वाले कोई न कोई जवान साथ रहेगा...
विज्ञापन
चीनी और भारतीय सैनिक - फोटो : ANI (File)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

चीनी फौज के धोखे की फेहरिस्त लंबी है। किसी न किसी वजह से चीनी फौज, भारतीय सैनिकों के सामने आ ही जाती है। लद्दाख में गश्त के दौरान जब उन्हें कुछ नहीं करना होता तो वे हाथ हिलाते हुए अपने इलाके में आगे बढ़ जाते हैं। जब गतिरोध पैदा करना होता है तो उसी जगह पर खड़े होकर चीनी सैनिक कहने लगते हैं कि ये हमारी जगह है, आप पीछे चले जाएं।

विज्ञापन

पहले यह कहा जाता था कि दोनों देशों के सैनिकों के बीच धक्का-मुक्की इसलिए होती है, क्योंकि वे एक दूसरे की भाषा नहीं समझ पाते। इसके चलते चीनी सैनिक भारतीय जवानों को कंधे से कंधा मारने लगते हैं।

अब सेना और आईटीबीपी के जवान चीनी भाषा सीख गए, तो भी चीनी सैनिक कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं। मकसद है किसी भी तरह पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग त्सो सेक्टर और गलवान घाटी क्षेत्र में गतिरोध बनाए रखना है। 

एक दूसरे को ऐसे गिराने का करते हैं प्रयास

पिछले कुछ वर्षों में भारत चीन सीमा पर पेट्रोलिंग के दौरान दोनों देशों के सैनिकों के बीच टकराहट की घटनाएं सामने आती रही हैं। हालांकि यह टकराहट कंधे से कंधा लगाकर एक दूसरे को गिराने का प्रयास करना, पिट्ठू बैग की मदद से धक्का देना, सैनिकों के आसपास पत्थराव करना और डंडों के जरिए सैनिकों को पीछे धकेलना, आदि के रूप में सामने आती है।

विज्ञापन


कई बार दोनों देशों के सैनिक अपनी भाषा में कुछ बोलते रहते, लेकिन कोई फायदा नहीं होता था। वजह, भारतीय सैनिकों को चीनी भाषा का ज्ञान नहीं था। सेना और आईटीबीपी ने महसूस किया कि छोटे मोटे गतिरोध को आपसी बातचीत के द्वारा मौके पर ही खत्म किया जा सकता है।

इसके लिए चीनी भाषा सीखने की योजना बनाई गई। सेना और आईटीबीपी के करीब तीन सौ अफसरों और जवानों को चीनी भाषा सिखा दी गई। इसके बाद तय हुआ कि आईटीबीपी की जो भी टीम पेट्रोलिंग पर जाएगी, उसके साथ चीनी भाषा जानने वाले कोई न कोई जवान साथ रहेगा।

इसका फायदा भी हुआ। कई बार ऐसे अवसर आए जब दोनों देशों के बीच गतिरोध हुआ, लेकिन बातचीत से वह सुलझ गया। आईटीबीपी के डीजी एसएस देसवाल ने बल के 58वें स्थापना दिवस से एक दिन पहले यह बात कही थी। आईटीबीपी के पास 180 बॉर्डर आउटपोस्ट हैं।

जवान जब आमने सामने होते हैं तो कहते हैं ये इलाका हमारा है...

लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को लेकर दोनों देशों के बीच तकरार होती रही हैं। डीजी एसएस देसवाल ने कहा था, यह तकरार उस वक्त होती है, जब चीन के सैनिक और आईटीबीपी के जवान एक ही रूट पर होते हैं। जिस रेखा पर आईटीबीपी वाले चलते हैं, वहीं सामने से चीनी सैनिक भी गश्त करते हुए आ जाते हैं।

चीनी सैनिक कहते हैं कि यह जमीन हमारी है, आप यहां से चले जाओ। इसी चक्कर में धक्का-मुक्की हो जाती है। ऐसी घटनाओं को टालने के लिए आईटीबीपी के 300 से अधिक जवानों को चीनी भाषा सिखा दी गई है। जब भी कुछ ऐसा होता है तो वे आपस में बातचीत कर मामला सुलझा लेते हैं। चीनी सैनिकों को उनकी भाषा में समझा दिया जाता है।

कोरोना वायरस से ध्यान भटकाने का हथकंडा अपना रहा है चीन: वीके सिंह 

अब जबकि भारतीय सैनिकों ने अपने सामने वाले पक्ष को उन्हीं की चीनी भाषा में समझा दिया तो भी वे नहीं मान रहे। वे गतिरोध को आगे जारी रखना चाहते हैं। भारत सभी निर्माणकार्य अपनी सीमा के भीतर कर रहा है, लेकिन चीन को उस पर भी ऐतराज है।

लद्दाख में चीनी सैनिकों के जमावड़े को लेकर केंद्रीय राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह कहते हैं कि एलएसी के आसपास चीनी फौज की मौजूदगी एक तरह से ध्यान भटकाने का हथकंडा है। कोरोना संक्रमण के मुद्दे पर चीन अभी पूरी दुनिया में घिरा हुआ है।

अब वह दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए इस तरह का गतिरोध पैदा कर रहा है। लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारतीय फौज ने चीनी सैनिकों को करारा जवाब दिया है। भारत ने एलएसी से सटे इलाके में सामरिक सड़कों का निर्माण कार्य तेज कर दिया है।

जनरल वीके सिंह ने कहा कि भारत के लिए यह पहला मौका नहीं है। भारत ने पहले भी चीनी घुसपैठ को नाकाम किया है।

जानबूझकर विवाद बढ़ाने का प्रयास कर रहा है चीन: रक्षा विशेषज्ञ 

गलवान घाटी और पैंगोंग त्सो झील के आसपास के कई इलाकों में तनाव जारी है। चीन ने इन्हीं इलाकों में अपने सैनिकों की तैनाती बढ़ाई है। यहां निर्माण कार्य भी किया जा रहा है।र क्षा विशेषज्ञ कमर आगा के अनुसार, पैंगोंग झील के आसपास अपने सीमा क्षेत्र में भारत जब कुछ भी करता है तो चीन भड़क जाता है।

कभी वह पेट्रोलिंग बढ़ा देता है तो कभी नावों की संख्या में वृद्धि कर देता है। भारत ने अपने बुनियादी ढांचे का विकास करने की योजना बनाई तो उसे लेकर चीन आपत्ति जताने लगता है। चीन के इस रवैये की बड़ी वजह कोरोना भी है। वइ इस मामले में बुरी तरह घिर चुका है।

कई ऐसे देश हैं जो अब चीन से अपना कारोबार उठा रहे हैं। वे अपने देश में ही उत्पादन यूनिट लगाने को तव्वजों दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में चीन, भारत के साथ गतिरोध शुरू कर दुनिया के दूसरे देशों का ध्यान असल मुद्दों से भटकाना चाह रहा है।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें