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वाजपेयी ने जब नेहरू की तस्वीर मंगवाई

Thu, 16 Aug 2018 05:25 PM IST
बीबीसी हिंदी
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Atal Bihari Vajpayee
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पूर्व लोकसभा अध्यक्ष अनंतशायनम अयंगर ने एक बार कहा था कि लोकसभा में अंग्रेज में हीरेन मुखर्ज और हिंदी में अटल बिहारी वाजपेयी से अच्छा वक्ता कोई नहीं है। जब वाजपेयी के एक नजदीकी दोस्त अप्पा घटाटे ने उन्हें यह बात बताई तो वाजपेयी ने जोर का ठहाका लगाया और बोले, "तो फिर बोलने क्यों नहीं देता।"
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हालांकि, उस जमाने में वाजपेयी बैक बेंचर हुआ करते थे लेकिन नेहरू बहुत ध्यान से वाजपेयी द्वारा उठाए गए मुद्दों को सुना करते थे। किंगशुक नाग अपनी किताब 'अटलबिहारी वाजपेयी- ए मैन फॉर ऑल सीजन' में लिखते हैं कि एक बार नेहरू ने भारत यात्रा पर आए एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री से वाजपेयी को मिलवाते हुए कहा था, "इनसे मिलिए। ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं। हमेशा मेरी आलोचना करते हैं लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूँ।"

नेहरू का गायब था चित्र
एक बार एक दूसरे विदेशी मेहमान से नेहरू ने वाजपेयी का परिचय संभावित भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी कराया था। वाजपेयी के मन में भी नेहरू के लिए बहुत इज्जत थी। 1977 में जब वाजपेयी विदेश मंत्री के रूप में अपना कार्यभार संभालने साउथ ब्लॉक के अपने दफ्तर गए तो उन्होंने नोट किया कि दीवार पर लगा नेहरू का एक चित्र गायब है।
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किंगशुक नाग बताते हैं कि उन्होंने तुरंत अपने सचिव से पूछा कि नेहरू का चित्र कहां है, जो यहां लगा रहता था। उनके अधिकारियों ने ये सोचकर उस चित्र को वहां से हटवा दिया था कि इसे देखकर शायद वाजपेयी खुश नहीं होंगे। वाजपेयी ने आदेश दिया कि उस चित्र को वापस लाकर उसी स्थान पर लगाया जाए जहां वह पहले लगा हुआ था।


नेहरू के जमाने की विदेश नीति
प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि जैसे ही वाजपेयी उस कुर्सी पर बैठे जिस पर कभी नेहरू बैठा करते थे, उनके मुंह से निकला, "कभी ख़्वाबों में भी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं इस कमरे में बैठूंगा।" विदेश मंत्री बनने के बाद उन्होंने नेहरू के जमाने की विदेश नीति में कोई खास परिवर्तन नहीं किया।

वाजपेयी के निज सचिव रहे शक्ति सिन्हा बताते हैं कि सार्वजनिक भाषणों के लिए वाजपेयी कोई खास तैयारी नहीं करते थे लेकिन लोकसभा का भाषण तैयार करने के लिए वो खासी मेहनत किया करते थे।

शक्ति के मुताबिक़, "वाजपेयी संसद के पुस्तकालय से पुस्तकें, पत्रिकाएं और अख़बार मंगवाकर वह देर रात अपने भाषण पर काम करते थे। वो प्वॉइंट्स बनाते थे और उस पर सोचा करते थे। वो पूरा भाषण कभी नहीं लिखते थे लेकिन उनके दिमाग में पूरा खाका रहता था कि अगले दिन उन्हें लोकसभा में क्या-क्या बोलना है।"


आडवाणी में थी हीनभावना
मैंने शक्ति सिन्हा से पूछा कि मंच पर इतना सुंदर भाषण देने वाले वाजपेयी हर 15 अगस्त को लाल किले से दिया जाने वाला भाषण पढ़कर क्यों देते थे?

शक्ति का जवाब था कि वह लाल किले की प्राचीर से कोई चीज लापरवाही में नहीं कहना चाहते थे। उस मंच के लिए उनके मन में पवित्रता का भाव था। हम लोग अक्सर उनसे कहा करते थे कि आप उस तरह से बोलें जैसे आप हर जगह बोलते हैं लेकिन वह हमारी बात नहीं मानते थे। यह नहीं था कि वो किसी और का लिखा भाषण पढ़ते थे। हम लोग उनको इनपुट देते थे जिसको वो बहुत काट-छांट के बाद अपने भाषण में शामिल करते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी के काफी क़रीब रहे उनके साथी लालकृष्ण आडवाणी ने एक बार बीबीसी को बताया था कि अटलज के भाषणों को लेकर वह हमेशा हीनभावना से ग्रस्त रहे।


निज जीवन में अंतर्मुखी और शर्मीले
आडवाणी ने बताया था, "जब अटल  चार वर्ष तक भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके तो उन्होंने मुझसे अध्यक्ष बनने की पेशकश की। मैंने ये कहकर मना कर दिया कि मुझे हजारों की भीड़ के सामने आपकी तरह भाषण देना नहीं आता। उन्होंने कहा संसद में तो तुम अच्छा बोलते हो। मैंने कहा संसद में बोलना एक बात है और हजारों लोगों के सामने बोलना दूसरी बात। बाद में मैं पार्टी अध्यक्ष बना लेकिन मुझे ताउम्र कॉम्पलेक्स रहा कि मैं वाजपेयी जैसा भाषण कभी नहीं दे पाया।" दिलचस्प बात यह है कि हजारों लोगों को अपने भाषण से मंत्रमुग्ध कर देने वाले वाजपेयी निज जवन में अंतर्मुखी और शर्मीले थे।

उनके निज सचिव रहे शक्ति सिन्हा बताते हैं कि अगर चार-पांच लोग उन्हें घेरे हुए हों तो उनके मुंह से बहुत कम शब्द निकलते थे। लेकिन वो दूसरों की कही बातों को बहुत ध्यान से सुनते थे और उस पर बहुत सोच-समझकर बारीक प्रतिक्रिया देते थे। एक दो खास दोस्तों के सामने वो खुलकर बोलते थे लेकिन वो बैक स्लैपिंग वेराइटी कभी नहीं रहे।


नवाज ने वाजपेयी से कहा।।।
मणिशंकर अय्यर याद करते हैं कि जब वाजपेयी पहली बार 1978 में विदेश मंत्री के तौर पर पाकिस्तान गए तो उन्होंने सरकारी भोज में गाढ़ी उर्दू में भाषण दिया। पाकिस्तान के विदेश मंत्री आगा शाही चेन्नई में पैदा हुए थे। उनको वाजपेयी की गाढ़ी उर्दू समझ में नहीं आई।

शक्ति सिन्हा बताते हैं कि एक बार न्यूयॉर्क में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ वाजपेयी से बात कर रहे थे। थोड़ी देर बाद उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करना था। उन्हें चिट भिजवाई गई कि बातचीत खत्म करें ताकि वो भाषण देने जा सकें। चिट देखकर नवाज शरीफ ने वाजपेयी से कहा, "इजाजत है।।। फिर उन्होंने अपने को रोका और पूछा आज्ञा है।" वाजपेयी ने हंसते हुए जवाब दिया, "इजाजत है।"

जनसंघ के जमाने में।।।
किंगशुक की किताब में जिक्र है कि एक बार मशहूर पत्रकार एचके दुआ अपने स्कूटर से एक संवाददाता सम्मेलन को कवर करने प्रेस क्लब जा रहे थे जिसे अटल बिहारी वाजपेयी संबोधित करने जा रहे थे। उस जमाने में वो युवा रिपोर्टर हुआ करते थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि जनसंघ के अध्यक्ष वाजपेयी एक ऑटो को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। दुआ ने अपना स्कूटर धीमा करके वाजपेयी से ऑटो रोकने का कारण पूछा। उन्होंने बताया कि उनकी कार ख़राब हो गई है। दुआ ने कहा कि आप चाहें तो मेरे स्कूटर के पीछे की सीट पर बैठकर प्रेस क्लब चल सकते हैं। वाजपेई दुआ के स्कूटर पर पीछे बैठकर उस संवाददाता सम्मेलन में पहुंचे जिसे वो ख़ुद संबोधित करने वाले थे।

शिव कुमार पिछले 47 सालों से अटल बिहारी वाजपेयी के साथ रहे हैं। ख़ुद उनके शब्दों में वो एक साथ अटल के चपरासी, रसोइये, बॉडीगार्ड, सचिव और लोकसभा क्षेत्र प्रबंधक की भूमिका निभाते रहे हैं।

 
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Atal Bihari Vajpayee
वाजपेयी को कराया इंतजार
जब मैंने उनसे पूछा कि क्या अटल बिहारी वाजपेयी को कभी ग़ुस्सा आता था तो उन्होंने एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाया, "उन दिनों मैं उनके साथ 1, फिरोजशाह रोड पर रहा करता था। वो बेंगलुरु से दिल्ली वापस लौट रहे थे। मुझे उन्हें लेने हवाई अड्डे जाना था। जनसंघ के एक नेता जेपी माथुर ने मुझसे कहा चलो रीगल में अंग्रेज पिक्चर देखी जाए। छोटी पिक्चर है जल्दी ख़त्म हो जाएगी। उन दिनों बेंगलुरु से आने वाली फ्लाइट अक्सर देर से आती थी। मैं माथुर के साथ पिक्चर देखने चला गया।"

शिव कुमार ने बताया, "उस दिन पिक्चर लंबी खिंच गई और बेंगलुरु वाली फ्लाइट समय पर लैंड कर गई। मैं जब हवाई अड्डे पहुंचा तो पता चला कि फ्लाइट तो कब की लैंड कर चुकी। घर की चाभी मेरे पास थी। मैं अपने सारे देवताओं को याद करता हुआ 1, फिरोज शाह रोड पहुंचा। वाजपेयी अपनी अटैची पकड़े लॉन में टहल रहे थे। उन्होंने मुझसे पूछा कहाँ चले गए थे? मैंने झिझकते हुए कहा कि पिक्चर देखने गया था। वाजपेई ने मुस्कराकर कहा यार हमें भी ले चलते। चलो कल चलेंगे। वो मुझ पर नाराज हो सकते थे लेकिन उन्होंने मेरी उस लापरवाही को हंसकर टाल दिया।"

आपातकाल में।।।
वाजपेयी को खाना खाने और बनाने का बहुत शौक़ था। मिठाइयां उनकी कमजोरी थी। रबड़ी, खीर और मालपुए के वो बेहद शौक़ीन थे। आपातकाल के दौरान जब वो बेंगलुरु जेल में बंद थे तो वो आडवाणी, श्यामनंदन मिश्र और मधु दंडवते के लिए ख़ुद खाना बनाते थे।

शक्ति सिन्हा बताते हैं, "जब वो प्रधानमंत्री थे तो सुबह नौ बजे से एक बजे तक उनसे मिलने वालों का तांता लगा करता था। आने वालों को रसगुल्ले और समोसे वग़ैरह सर्व किए जाते थे। हम सर्व करने वालों को खास निर्देश देते थे कि साहब के सामने समोसे और रसगुल्ले की प्लेट न रखी जाए। शुरू में वह शाकाहारी थे लेकिन बाद में वह मांसाहारी हो गए थे। उन्हें चाइनीज खाने का खास शौक था। वो हम लोगों की तरह एक सामान्य व्यक्ति थे। मैं कहूंगा- ही वाज नाइदर अ सेंट नॉर सिनर। ही वाज ए नॉरमल ह्यूमन बीइंग, ए वार्म हार्टेड ह्यूमन बीइंग।"


शेरशाह सूरी के बाद।।।
अटल बिहारी वाजपेयी के पसंदीदा कवि थे सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, हरिवंशराय बच्चन, शिवमंगल सिंह सुमन और फैज अहमद फैज। शास्त्रीय संगीत भी उन्हें बेहद पसंद था। भीमसेन जोशी, अमजद अली खाँ और कुमार गंधर्व को सुनने का कोई मौक़ा वह नहीं चूकते थे। किंगशुक नाग का मानना है कि हालांकि वाजपेयी की पैठ विदेशी मामलों में अधिक थी लेकिन अपने प्रधानमंत्रित्व काल में उन्होंने सबसे ज्यादा काम आर्थिक क्षेत्र में किया।

वे कहते हैं, "टेलिफोन और सड़क निर्माण में वाजपेयी के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता। भारत में आजकल जो हम हाइवेज का जाल बिछा हुआ देखते हैं उसके पीछे वाजपेयी की ही सोच है। मैं तो कहूँगा कि शेरशाह सूरी के बाद उन्होंने ही भारत में सबसे अधिक सड़कें बनवाई हैं।"


मोदी के इस्तीफे की तैयारी
रॉ के पूर्व प्रमुख एएस दुलत अपनी किताब 'द वाजपेयी इयर्स' में लिखते हैं कि वाजपेयी ने गुजरात दंगों को अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी ग़लती माना था। किंगशुक नाग भी कहते हैं गुजरात दंगों को लेकर वह कभी सहज नहीं रहे। वो चाहते थे कि इस मुद्दे पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी इस्तीफा दें।

नाग कहते हैं, "उस समय के वहाँ के राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी के एक बहुत क़रीबी ने मुझे बताया था कि मोदी के इस्तीफे की तैयारी हो चुकी थी लेकिन गोवा राष्ट्रीय सम्मेलन आते-आते पार्टी के शीर्ष नेता मोदी के बारे में वाजपेयी की राय बदलने में सफल हो गए थे।"
 
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