चौंकाने वाली बात है कि महंगाई के इस दौर में भी ऐसा कम ही होता कि देश भर में एक ही उत्पाद के दामों को लेकर बवाल मचा हो। दिल्ली में प्याज का किस्सा शायद आपको याद हो, जिसके दामों ने सरकार के लिए आफत कर दी थी। आजकल ऐसा ही कुछ पेट्रोल-डीजल के साथ है, जिसकी हर रोज बढ़ती कीमतों ने जनता को खफा कर रखा है और सरकार के सामने सवालों की बाढ़ आ गई है। नरेंद्र मोदी फिटनेस चैलेंज की बात करते हैं तो राहुल गांधी उन्हें पेट्रोल का दाम घटाने की चुनौती दे डालते हैं। चुटकुले भी इसी के इर्द-गिर्द चल रहे हैं। कोई मोटरसाइकिल में पैडल लगवाने की सलाह दे रहा है तो कोई स्कूटर में टंकी फुल कराने पर बीमा कराने जा रहे हैं।
मोदी सरकार का सिरदर्द
लेकिन
पेट्रोल-डीजल के दाम कम कैसे होंगे, अभी तक कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। मोदी और उनके मंत्री कह रहे हैं कि जल्द ही इस मोर्चे पर राहत दी जाएगी लेकिन वो कैसे आएगी, अभी खबर नहीं। मोदी सरकार का सिरदर्द बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम भी दम साधे बैठे हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि अगर मोदी सरकार चाहे तो टैक्स घटाकर पेट्रोल के दामों में काफी कमी ला सकती है। लेकिन वो ऐसा कर नहीं रही है। और जैसे ही टैक्स की बात चलती है तो एक बार फिर ये चर्चा चल पड़ती है कि क्या पेट्रोल-डीजल को
जीएसटी के दायरे में लाना चाहिए ताकि उस पर टैक्स कम लगे और ग्राहकों को भी फायदा हो। लेकिन पहले पेट्रोल के दाम और टैक्स के खेल को समझ लिया जाए। 25 मई को इंडियन ऑयल के पेट्रोल का दाम राजधानी दिल्ली में 77.83 रुपए प्रति लीटर था।
कितना दाम, कितना टैक्स
अगर पेट्रोल का प्राइस बिल्डअप देखा जाए तो डीलरों को पेट्रोल 38.17 रुपए प्रति लीटर की दर पर मुहैया कराया गया। इसमें 19.48 रुपए प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी और 16.55 रुपए प्रति लीटर का वैट जोड़ा गया। साथ में 3.63 रुपए प्रति लीटर का डीलर कमीशन भी इसमें डाला जाए तो दाम 77.83 रुपए प्रति लीटर पहुंच जाते हैं। कांग्रेस छोड़िए, भाजपा के नेताओं को भी इस मामले की संजीदगी पता है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने कहा कि अगर केंद्र जीएसटी (उत्पाद एवं सेवा कर) पर आम सहमति बना लेता तो पेट्रोल-डीजल के दामों में काफी कमी आ सकती है।
उन्होंने कहा, ''तेल के दाम घटाने को लेकर टास्क फोर्स ने काम करना शुरू कर दिया है। अगर इन पर जीएसटी लगा दिया जाता है तो इसकी ऊपरी सीमा तय हो जाएगी क्योंकि अभी इन पर ऐसा टैक्स लगाता है जो दाम बढ़ाता है।'' एक्साइज ड्यूटी केंद्र सरकार लगाती है जबकि वैट की दर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हो सकती है। यही वजह है कि राज्यों और उनके शहरों में पेट्रोल या डीजल के दाम भी अलग होते हैं।
तेल का सफर
जितनी तेल की कीमत होती है लगभग उतना ही टैक्स भी लगता है। कच्चा तेल खरीदने के बाद रिफाइनरी में लाया जाता है और वहां से पेट्रोल-डीजल की शक्ल में बाहर निकलता है। इसके बाद उस पर टैक्स लगना शुरू होता है। सबसे पहले एक्साइज ड्यूटी केंद्र सरकार लगाती है। फिर राज्यों की बारी आती है जो अपना टैक्स लगाते हैं। इसे सेल्स टैक्स या वैट कहा जाता है। इसके साथ ही पेट्रोल पंप का डीलर उस पर अपना कमीशन जोड़ता है। अगर आप केंद्र और राज्य के टैक्स को जोड़ दें तो यह लगभग पेट्रोल या डीजल की वास्तविक कीमत के बराबर होती है। उत्पाद शुल्क से अलग वैट एड-वेलोरम (अतिरिक्त कर) होता है, ऐसे में जब पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं तो राज्यों की कमाई भी बढ़ती है।