डॉ. मिश्रा के अनुसार, कोविड-19 में रोग प्रतिरोधक क्षमता का संतुलन में रहना बहुत जरूरी है। अगर किसी मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है तो वह ज्यादा खतरनाक है। यही क्षमता अगर ज्यादा हो रही है तो वह भी मरीज के लिए ठीक नहीं है। इसका संतुलन में होना बहुत आवश्यक है। कोविड-19 में मौत की वजह इस क्षमता का बहुत अधिक बढ़ना भी रहा है। इससे साइटोकिन स्टार्म की स्थिति पैदा होती है जो मरीज को मौत की तरफ ले जाती है।
ए-1 गाय, जिसे विदेशी या अमेरिकन का नाम दिया जाता है, उसके दूध में बीटा-कैसिइन प्रोटीन होता है। इसी से बीसीएम-7 उत्पन्न होता है। यह पदार्थ शरीर में सूजन, एलर्जी और पेट की पथरी जैसी बीमारियों को जन्म देता है। यही वजह है कि ए-1 दूध कोविड में नुकसानदायक हो सकता है। दूसरी तरफ देशी गाय का ए-2 दूध जो इन सब दिक्क्तों से परे होता है, वह कोविड के दौरान बेहतर रहता है। हालांकि अभी इन बातों को बड़े स्तर पर साबित करने की जरूरत है।
दूध में लगभग 87 फीसदी पानी और 13 फीसदी वसा, लैक्टोज, खनिज व प्रोटीन होता है। गाय के दूध में प्रोटीन का 95 फीसदी से अधिक केसिन और मट्ठा, प्रोटीन द्वारा गठित किया जाता है। इसमें बीटा-कैसिइन 2 सबसे आम प्रोटीन (लगभग 30-35 फीसदी) है। बीटा-कैसिइन, 12 प्रकार के होते है, लेकिन ए-1 और ए-2 सबसे आम हैं। उत्तर अमेरिकी/यूरोपीय मूल के जानवरों (होलस्टीन, फ्रेजियन, आयरशायर, और ब्रिटिश शोरथॉर्न) में ए-1 और ओरिएंट (एशियाई, जर्सी, ग्वेर्नसे और अफ्रीकी गायों) के जानवरों में ए-2 होता है। भेड़, बकरी, याक, भैंस, ऊंट, गधे और एशियाई गायों में स्वाभाविक रूप से अधिक ए 2 (बीटा कैसिइन) प्रोटीन होता है। भारतीय देशी गाय और भैंस में केवल ए 2 प्रोटीन होता है।
पाचन एंजाइमों द्वारा ए-1 बीटा-कैसिइन प्रोटीन का पाचन पेप्टाइड बीटा-केसोमोर्फिन-7 (BCM-7) का उत्पादन कर सकता है, जो पेट खराब कर सकता है। इसके अलावा, यह अन्य मानव प्रणालियों के साथ हस्तक्षेप करता है। इससे तंत्रिका, अंतःस्रावी और प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान पहुंचता है। बीसीएम-7 एक ऑक्सीडेंट है जो धमनी पट्टिका के निर्माण में अहम योगदान देता है। ये एक ओपिओइड भी है और यह निद्रा को प्रेरित कर सकता है। कुछ अध्ययनों के अनुसार बीसीएम-7 टाइप-1 मधुमेह, शिशु मृत्यु, आत्मकेंद्रित और गैस्ट्रो-आंत्र सूजन से जुड़ा हो सकता है। हालांकि, सबसे अधिक चिंता एथेरोस्क्लेरोसिस और बाद में कोरोनरी धमनी रोग को लेकर भी होती है। यह एक त्वरित जोखिम हो सकता है।
डॉ. मिश्रा के अनुसार, भारतीय मवेशी और भैंस की नस्ल में ए-2 सबसे अधिक है। इसकी मात्रा (99-100 फीसदी) रहती है। ए-1 में ये फायदे लगभग अनुपस्थित रहते हैं। इसी वजह से भारत में, अधिकांश देशी गायों में ए-2 दूध का ही उत्पादन होता है। 15 जेबू मवेशी की नस्लें (कांगयम, निमारी, लाल कंधारी, मलनाड गिद्दा, खेरीगढ़, मालवी, अमृत महल, कंकरेज, गिर, साहीवाल, हरियाण, थारपारकर, राठी, मेवाती और लाल सिंधी) और आठ भैंस नस्लें (मुर्राह, मेहसाणा, मराठाना, मराठ, दक्षिण कनारा, मणिपुर, असमिया दलदल, निली रवि और पंढरपुरी) इस तरह का दूध उत्पादित करती हैं। भारतीय बाजार में उपलब्ध ब्रांडेड दूध का कितना हिस्सा विदेशी गायों से है, यह पता नहीं है। हालांकि, भैंस का दूध या बकरी का दूध अभी भी पूर्ण ए-2 है। ए-1 दूध के नकारात्मक स्वास्थ्य प्रभावों को दर्शाने वाली कई रिपोर्ट हैं। हमें देसी गायों और भैंसों के दूध का अधिक उपयोग करना चाहिए।