केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू का कहना है कि उत्तर प्रदेश की सरकार ने अभी तक केंद्र को यह नहीं बताया है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना का मामला आखिर क्या है। दरअसल कई दिनों से मीडिया में उत्तर प्रदेश के कैराना को लेकर अलग अलग तरह की खबरें चल रही हैं। कुछ खबरों के मुताबिक वहां से कई हिंदू परिवारों ने पलायन किया है, जबकि कुछ अन्य रिपोर्टों के मुताबिक ये बात सही नहीं है।
किरण रिजिजू ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए केंद्र की तरफ से उत्तर प्रदेश की सरकार को हर संभव मदद का वादा किया है। दूसरी ओर केंद्रीय कानून मंत्री सदानंद गौडा का कहना है कि कैराना के हालात इतने गंभीर हैं कि उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए।
अंग्रेजी के अखबार कुछ कह रहे हैं हिंदी के अखबार कुछ और कह रहे हैं
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अखबारों की बात करें तो अंग्रेजी के अखबार कुछ कह रहे हैं जबकि हिंदी के अखबार कुछ और ही कह रहे हैं। समाचार चैनल जी-न्यूज ने अपनी खबर में कहा कि जो 'हिन्दुओं के साथ कश्मीर में 1990 में हुआ था वो अब कैराना के हिन्दुओं के साथ हो रहा है'। समाचार चैनल का दावा है कि कुल मिलाकर 346 हिन्दू परिवार, रंगदारी और गुंडागर्दी से तंग आकर अपने घर छोडकर जा चुके हैं।
जी न्यूज के मुताबिक इलाके के व्यापारियों की एक के बाद एक हत्याओं ने पूरे इलाके में दहशत का माहौल बना दिया है। अखबार नयी दुनिया ने भी रिपोर्ट दी है, "कोई कुछ भी कहे, मगर सच यही है कि कौमी एकता के हामी रहे उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कैराना कस्बे की कीर्ति कलंकित हो चुकी है। रंगदारी, अपहरण, लूटपाट और हत्या की लगातार वारदातों ने अवाम का चैन छीन लिया है।
पिछले करीब चार वर्षों में भय के मारे ढाई सौ से भी ज्यादा हिदू परिवारों ने यहां से पलायन कर लिया।" अखबार आगे लिखता है- "पलायन का यह सिलसिला खत्म नहीं हुआ है। हाकिम और हुक्मरानों से भरोसा उठा तो तमाम लोगों ने घर-बार छोड दिया। नतीजतन कई बस्तियां वीरान हो गईं। तमाम घरों पर ताले लटके हैं।
अब भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने इस मुद्दे पर गृह मंत्रालय को पत्र लिखा तो सियासी प्याले में तूफान उठा। प्रशासन के कान खडे हो गए।" दैनिक भास्कर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इलाके में बिगडती कानून व्यवस्था की वजह से '40 मुस्लिम परिवार भी इलाके से पलायन कर चुके हैं।'
अखबार ने भाजपा के सांसद हुकुम सिंह का बयान छापा है जिसमें दावा किया गया है कि पिछले पांच सालों में कैराना में हिन्दुओं की आबादी 22 प्रतिशत कम हो गई है। लेकिन कुछ समाचार चैनलों ने 'कैराना के सच' की पडताल खुद करने की कोशिश की है।
अच्छा पैसा कमाने की चाहत में लोग बडे शहरों की ओर रुख कर रहे हैं?
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'एबीपी न्यूज' के संवाददाता ने उन लोगों के घरों पर जाकर पलायन करने वालों का पता लगाने के क्रम में कुछ और ही पाया। एबीपी न्यूज के मुताबिक- "हालांकि वैश्य समाज के लोगों का कहना है कि यहां व्यापारियों से रंगदारी मांगी जाती है। हाल के दिनों में तीन लोगों की हत्या भी हुई है, जिसके बाद से व्यापारी दहशत में हैं।"
समाचार चैनल की पडताल में कहा गया है- "दहशत और पलायन के दावों की पडताल के लिए जब हम सांसद की लिस्ट में 116 नंबर पर मौजूद प्रमोद जैन के घर पहुंचे तो मालूम चला कि प्रमोद अपनी पत्नी के साथ कैराना में ही रह रहे हैं। कैराना में पहले पान की दुकान चलाने वाले पवन जैन अब दिल्ली बस चुके हैं, लेकिन उनके भाई का कहना है कि इसके पीछे पलायन नहीं बल्कि रोजगार वजह है।
कैराना को करीब से जानने वाले बताते हैं कि अच्छा पैसा कमाने की चाहत में लोग बडे शहरों की ओर रुख कर रहे हैं।" कैराना से हो रहे पलायन की खबरों को अंग्रेजी समाचार पत्रों और न्यूज पोर्टल्स ने बिकुल अलग तरीके से छापा है।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है कि सांसद हुकुम सिंह के लगाए गए आरोपों की अधिकारियों ने जब प्रारंभिक जांच की तो इन 'दावों की हवा निकल गई।'
समाचार पत्र ने पुलिस अधिकारी अनिल कुमार झा के हवाले से कहा है कि पिछले आठ से दस सालों से कैराना से लोग बेहतर कमाई और नौकरी के लिए जाते रहे हैं। समाचार पत्र में पुलिस के हवाले से यह भी कहा गया है कि 150 मुस्लिम परिवार भी जा चुके हैं। अखबार का कहना है कि भाजपा कैराना के मुद्दे को उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा के चुनावों को देखते हुए मतों के ध्रुवीकरण के लिए भुनाना चाहती है।
न्यूज पोर्टलों पर कुछ और ही चल रहा है
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न्यूज पोर्टल 'फर्स्ट-पोस्ट' ने भी लिखा कि 'भाजपा ने इलाहाबाद में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कैराना से हिन्दुओं के पलायन की बात जानबूझकर उठायी ताकि ध्रुवीकरण किया जा सके'। न्यूज पोर्टल आगे लिखता है कि ऐसा लगता है कि कैराना की कहानी बढा-चढाकर पेश की जा रही है।
एक अन्य न्यूज पोर्टल 'स्क्रॉल डॉट इन' ने शामली जिला प्रशासन के हवाले से लिखा है कि भाजपा की दी गयी सूची में 'चार लोग ऐसे हैं जो बीस साल पहले मर चुके हैं।' पोर्टल ने प्रशासन की जाँच के हवाले से लिखा है कि जिन लोगों के पलायन के बारे में कहा गया है उनमें से 13 ने कभी कैराना नहीं छोडा और 68 ऐसे हैं जो कारोबार और बेहतर नौकरी की वजह गए हैं।