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फास्ट फूड खाना सुविधाजनक या जोखिमभरा, जानें फास्ट फूड से जुड़ें कुछ रोचक तथ्य

Sun, 21 Jun 2020 03:22 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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फास्ट फूड का इतिहास - फोटो : AMAR UJALA
कोरोना काल ने लोगों के खाने की आदतों को काफी हद तक बदल दिया है। कोरोना वायरस के आने के बाद से अब फास्ट फूड की डिलिवरी और उत्पादकता में कमी आई है। कोरोना को काबू करने के लिए लॉकडाउन लगाना पड़ा, जिसका अंजाम फास्ट फूड इंडस्ट्री को भुगतना पड़ा। कोरोना वायरस की वजह से लोग चार महीने या उससे ज्यादा पिज्जा, बर्गर, फ्रेच फ्राइज नहीं खा पाए।

इसकी नतीजा यह रहा कि कुछ फास्ट फूड लवर्स ने घर पर ही इन्हें बनाने की कोशिश की और कुछ लोगों ने पौष्टिक आहार वाली डाइट अपना ली। फास्ट फूड का आज हर कोई दीवाना है लेकिन क्या आप जानते हैं कि सबसे पहली बार फास्ट फूड किसने बनाया था, फास्ट फूड का इतिहास क्या है और फास्ट फूड इंडस्ट्री विश्व की अर्थव्यवस्था में कितना योगदान देती है। 
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फास्ट फूड को लेकर चौकाने वाले तथ्य

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प्रतीकात्मक तस्वीर
  • अकेले अमेरिका में 2,50,000 फास्ट फूड रेस्त्रां
  • फास्ट फूड का वैश्विक राजस्व सालाना करीब 43,000 करोड़ (570 बिलियन डॉलर) है
  • ये आंकड़ा 2018 की स्वीडन की पूरी अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है
  • ये आंकड़ा नासा के चांद पर जाने वाले मिशन की लागत का चार गुना है
  • नासा के अपोलो मिशन की लागत लगभग 11,000 करोड़ (147 बिलियन डॉलर) थी
  • अमेरिका के 96 फीसदी बच्चे रोनाल्ड मैकडोनल्ड को जानते हैं
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सबसे पहले कब बना फास्ट फूड?

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प्रतीकात्मक तस्वीर
फास्ट फूड खाने का एक ऐसा तरीका जो जल्द उपलब्ध हो जाता है, इसे पकाने में समय नहीं लगता और खाने में भी इसका स्वाद अव्वल होता है। फास्ट फूड की खासियत यह है कि यह पहले से आधा पका होता है और जैसे ही आप रेस्त्रां में जाते हैं, आपको इसे पैक करके दे दिया जाता है। 

साल 1921 में कंसास से फास्ट फूड इंडस्ट्री की शुरुआत हुई। सबसे पहले व्हाइट कैसल रेस्त्रां के तौर पर फास्ट फूड बनना शुरू हुआ। उस समय सबसे पहले हैमबर्गर की शुरुआत हुई लेकिन लोग इसे अच्छी गुणवत्ता वाला खाना नहीं मानते थे। व्हाइट कैसल अमेरिकी लोगों का हैमबर्गर के प्रति नजरिया बदलना चाहते थे इसलिए उन्होंने खुला रेस्त्रां बनाया, जिससे लोग फास्ट फूड की विधि देश सकें। 

अमेरिका में उस समय ऑटोमोबाइल का दौर था और लोग अपनी गाड़ी से उतरना कम पसंद करते थे। ज्यादा सफर और भाग-दौड़ भरी जिंदगी के बीच अमेरिकी लोगों की जल्दी मिलने वाले खाने ने आकर्षित किया और 1940 में सबसे लोकप्रिय बर्गर फ्रैंचाइजी मैकडॉनल्ड अस्तित्व में आया और आठ साल बाद ही इन-एन-आउट बर्गर ने अपने पैर पसारे। ये कैलीफोर्निया का पहला ड्राइव थ्रू बर्गर रेस्त्रां था।

बर्गर किंग और टैको बॉल ने अपनी खाने की चैन 1950 में शुरू की और 1969 में वैंडीज ने लोगों के लिए पहली बार अपने दरवाजे खोले। 1952 में कर्नल हार्लेंड सैंडर्स ने केंटुकी फ्राइड चिकन की शुरुआत की और डैन और फ्रैंक कार्नी ने 1958 में पिज्जा हट की शुरुआत की, इन दोनों भाइयों ने अपनी मां से लगभग 45,000 रुपये उधार लिए।

2019 में किसके कितने आउटलेट्स?

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Street Food - फोटो : PIXA
फास्ट फूड इंडस्ट्री काफी तेजी से अमेरिका से दुनिया के दूसरे देशों में फैली। अमेरिका से लेकर जापान, यूनाइटेड किंगडम और ऑस्ट्रेलिया में फैलने लगा। साल 1976 में वैंडीज ने सात साल में ही पांच सौ नए आउटलेट खोलें और 1978 तक अमेरिका में गी 60,000 रेस्त्रां खोले गए। आइए देखते हैं साल 2019 तक किस फास्ट फूड कंपनी के कितने आउटलेट्स खोले गए...
  • सबवे - 41,098
  • मैकडॉनल्ड्स - 37,855
  • स्टारबक्स - 30,000
  • केएफसी - 20,952
  • पिज्जा हट - 18,000
  • बर्गर किंंग - 13,000
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फास्ट फूड के दुष्प्रभाव

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pexels.com
जितनी तेजी से फास्ट फूड की लोकप्रियता बढ़ी, उतना ही लोगों को यह खाना पसंद आने लगा, लिहाजा लोगों में जल्द ही इसके दुष्प्रभाव दिखने लगे। साल 1950 में 12 फीसदी अमेरिकी लोगों में मोटापे की शिकायत दिखने लगी लेकिन 1994 तक ये शिकायत अमेरिका के 23 फीसदी लोगों में दिखने लगी।

मोटापा या भारी शरीर कई तरह की बीमारियों को अपने साथ लाता है, इसमें मधुमेह और कैंसर बीमारी शामिल हैं। लोगों में मोटापे की शिकायत बढ़ने से पोषण वैज्ञानिकों ने फास्ट फूड पर अंगुली उठाना शुरू कर दिया। 2016 में हुए एक शोध के मुताबिक दुनिया की करीब 200 करोड़ आबादी मोटापे का शिकार हुई, जो कि पूरी दुनिया का 39 फीसदी है। 

इसके बाद फास्ट फूड कंपनियों ने अपने ग्राहकों के लिए पौष्टिक आहार की उपलब्धता बढ़ा दी। अब फास्ट फूड रेस्त्रां में सलाद जैसा पौष्टिक खाना मिलने लगा। 2002 में बर्गर किंग ने अपना पहला शाकाहारी बर्गर लॉन्च किया, जिसके बाद मैकडॉनल्ड ने भी 2004 में ग्राहकों के लिए सलाद, यॉगर्ट और कटा हुए सेब जैसे खाद्य पदार्थ देने शुरू किए।
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फास्ट फूड का प्रकृति पर दुष्प्रभाव

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File
फास्ट फूड इंडस्ट्री की वजह से पिछले दस सालों में ना सिर्फ लोगों की कैलोरीज बल्कि प्रकृति को नष्ट करने का आरोप फास्ट फूड इंडस्ट्री पर लगा। साल 2015,2016 और 2017 ने अब तक के सबसे गर्म साल होने का रिकॉर्ड तय किया है। इसके पीछे मिथेन गैस जैसी ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा हाथ है।  

मिथेन गैस का सबसे बड़ा उत्पादक गायों का झुंड है। बीफ बनाने में सबसे आगे अमेरिका है, ऐसा मान लीजिए कि अगर करोड़ों बर्गर, लाखों गायों के बराबर हैं। इसके बाद फास्ट फूड कंपनियों पर वैश्विक उत्सर्जन को कम करने के लिए दबाव डाला गया, यही नहीं फास्ट फूड की वजह से 2,69,000 टन प्लास्टिक बेकार होने लगा, जिसके बाद पर्यावरणविदों ने इंडस्ट्री को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। जिसके परिणामस्वरुप इंडस्ट्री ने इको-फ्रेंडली पैकेजिंग को इस्तेमाल करने की शुरुआत की।
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