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किसानों के संघर्ष की ये है असली वजह, एमपी-महाराष्ट्र में इसलिए मचा बवाल

Wed, 07 Jun 2017 02:08 PM IST
amarujala.com- Written by : हरेन्द्र सिंह मोरल
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देश के हृदयस्‍थल मध्यप्रदेश में एक जून से किसान आंदोलन कर रहे हैं। यह आंदोलन मंगलवार को उग्र हुआ तो सीआरपीएफ की फायरिंग में आकर छह किसानों की मौत हो गई। अब सरकार मुआवजे का मरहम लगाकर जख्मों को ढकने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर कुछ ऐसे ही हालात महाराष्ट्र के भी बने हुए हैं।
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हालांकि बड़ा बवाल मचने से पहले ही महाराष्ट्र सरकार ने किसानों की मांगों को मानकर विवाद को टाल दिया। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि अचानक देशभर के किसान इतना उग्र क्यों हुए? किसानों की ऐसी क्या मजबूरी हुई कि उन्हें अपना हक पाने के लिए लाठी गोली खाने को मजबूर होना पड़ गया?

खासकर भाजपा शासित राज्यों में किसान सीधे-सीधे सरकार से टकराव के मूड़ में क्यों हैं? जानकारों की मानें तो इसके पीछे कई कारण नजर आ रहे हैं? आइए डालते हैं उन कारणों पर एक निगाह-
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ये हैं किसानों के आंदोलन की वजह

-इस विवाद की शुरूआत हुई यूपी की भाजपा सरकार द्वारा किसानों के 36 हजार करोड़ के कर्ज को माफ करने से। 
-यूपी सरकार ने किसानों के कर्ज माफ किए तो बदहाली से जूझ रहे महाराष्ट्र के किसानों ने भी इसको लेकर आंदोलन शुरू कर दिया। 
-महाराष्ट्र के विदर्भ में पिछले दस सालों में दस हजार से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं, देश में सबसे ज्यादा बदहाल विदर्भ का किसान ही माना जाता है।
जबकि महाराष्ट्र में बीस सालों में 50 हजार से ज्यादा किसान अपनी जान दे चुके हैं।
-ऐसे में यूपी सरकार ने बिना किसी बड़ी मांग और दबाव के ही केवल चुनावी वादे के आधार पर किसानों का कर्जा माफ कर दिया तो बदहाली से जूझ रहे महाराष्ट्र के किसानों का आक्रोश फूट पड़ा।
-किसानों ने कर्ज माफी और फसल की औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) रखने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया।
-दूध की कीमत 50 रुपये से ज्यादा करने और किसानों को दिए जाने वाले लोन की सीमा कम से कम 10 लाख रुपये करने की मांग की।
-आंदोलनकारियों ने 60 साल से ज्यादा उम्र के किसानों के लिए पेंशन शुरू करने की मांग भी की।
-महाराष्ट्र में किसानों ने आंदोलन के दौरान हजारों लीटर दूध सड़कों पर बहाकर अपना विरोध जताया तो फलों को भी सड़कों पर फेंक दिया।
-मामला बढ़ता देख महाराष्‍ट्र सरकार ने कुछ सकारात्मक रुख अख्तियार किया तो इससे बल पाए मध्यप्रदेश में भी किसानों ने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया।
-एक जून से एमपी के किसानों ने महाराष्ट्र के किसानों जैसी मांगों को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया।
-मध्यप्रदेश में किसानों ने आलू और प्याज का 1500 रुपये प्रति क्विंटल करने के साथ ही बाकी फसलों का समर्थन मूल्य घोषित करने की मांग की।
-एमपी में किसानों ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की मांग भी की।
-किसानों की एक मांग ये भी थी कि सभी कृषि मंडियों में उनकी फसलों की कीमत केंद्र द्वारा घोषित समर्थन मूल्य के अनुसार मिले। 
-किसानों की सबसे बड़ी समस्या ये है कि सूखे और अन्य कारणों से फसल साल दर साल चौपट होती रहती है और इस बार जैसे तैसे फसल अच्छी हुई तो मंडियों में उसके वाजिब दाम नहीं मिल रहे।
-एमपी में किसानों की सबसे बड़ी मांग कृषि ऋण माफी करने की भी थी। इसके अलावा कृषि ऋण सीमा दस लाख रुपये करने की मांग की गई।
-किसानों ने खाद, बीज और कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण लगाने की मांग भी रखी।
-मध्यप्रदेश में किसानों के दो गुट ने बातचीत के बाद सरकार से समझौता कर लिया लेकिन भारतीय किसान संघ ने इससे अलग होकर आंदोलन का रुख जारी रखा। जिसकी वजह से मंगलवार को उग्र किसानों और पुलिस के बीच टकराव के हालात बने और छह किसानों की मौत हो गई।
 
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