इस वीडियो में चरमपंथियों से इस्लामिक स्टेट से जुड़ने की अपील की गई है
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तथाकथित चरमपंथी समूह इस्लामिक स्टेट (आईएस) के प्रति निष्ठा जाहिर करते हुए कश्मीरी चरमपंथियों से 'खिलाफत' के साथ आने की अपील करने वाला वीडियो कश्मीर घाटी, भारतीय या पाकिस्तानी मीडिया में रूचि पैदा करने में नाकाम ही रहा है।
25 दिसंबर को इस्लामिक स्टेट से जुड़े नाशिर न्यूज नेटवर्क ने चैट ऐप टेलीग्राम पर ये वीडियो जारी किया था। 13 मिनट 46 सेकंड का ये वीडियो #विलायतकश्मीर हैशटैग के साथ जारी किया गया है। इसमें अबु अल बारा अल कश्मीरी नाम के एक संदिग्ध चरमपंथी इस्लामिक स्टेट के प्रति अपनी निष्ठा का ऐलान कर रहे हैं और कश्मीर में सक्रिय अन्य चरमपंथियों से ऐसा ही करने की अपील कर रहे हैं।
भारत और पाकिस्तान के मीडिया ने इस वीडियो पर सीमित रिपोर्टिंग करते हुए सिर्फ वही तथ्य सामने रखे हैं जो पहले से ही लोगों को पता हैं। बहुत मुमकिन है कि अगले कुछ दिनों में इस पर टिप्पणियां भी प्रकाशित या प्रसारित की जाएं।
ऐसा भी संभव है कि इस्लामिक स्टेट इस क्षेत्र में अपनी नई शाखा की घोषणा करने की तैयारी कर रहा है। लेकिन स्थानीय मीडिया में इस वीडियो पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आना यह बताता है कि यहां अभी आम धारणा यही है कि ये समूह अभी कश्मीर में सक्रिय नहीं है।
इस साल कश्मीर घाटी में हुए कुछ सरकार विरोधी प्रदर्शनों में जरूर इस्लामिक स्टेट के झंडे दिखे थे लेकिन प्रशासन ने अभी तक यहां इस्लामिक स्टेट की मौजूदगी से इनकार ही किया है।
लेकिन ये नया वीडियो पिछले छह महीने के दौरान कश्मीर को ध्यान में रखकर इस्लामिक स्टेट की ओर से जारी किए गए कई वीडियों की कड़ी में ही एक वीडियो है।
कश्मीर में बढ़ते आईएस के संदेश
कश्मीर में बढ़ते आईएस के संदेश
इस्लामिक स्टेट भारत प्रशासित कश्मीर में जारी राजनीतिक उथल-पुथल और अशांति का फायदा उठाने की कोशिशें कर रहा है। इसी साल जून में इस्लामिक स्टेट की पत्रिका रूमैया का पहला उर्दू संस्करण शुरू हुआ था जिसके जरिए कश्मीरियों से इस्लामिक स्टेट से जुड़ने का आह्वान किया था।
इसके एक महीने बाद ही टेलीग्राम पर इस्लामिक स्टेट का समर्थन करने वाले एक चैनल ने एक बयान प्रसारित किया था। ये बयान पहले अंसारुल खिलाफत जम्मू कश्मीर (एकेजेके) नाम के चैनल से प्रसारित किया गया था। इसमें कश्मीर में मौजूद इस्लामिक स्टेट के सभी समर्थकों से एक बैनर के तले आने की अपील की गई थी।
इसी महीने अल कायदा समर्थक एक मीडिया नेटवर्क ने कमांडर जाकिर मूसा के नेतृत्व अंसार गजवा-उल-हिंद नाम का समूह स्थापित करने का आह्वान किया। लेकिन स्थानीय अलगाववादियों और चरमपंथी नेताओं ने इसकी तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि वो कश्मीर की आजादी के लिए काम कर रहे हैं और उनका कोई वैश्विक एजेंडा नहीं है।
यही नहीं अलगाववादी और चरमपंथी नेताओं ने कश्मीर में अल-कायदा या इस्लामिक स्टेट की कोई भूमिका होने से इनकार भी किया।
ध्यान देने वाली बात ये है कि हाल में रिलीज हुए इस वीडियो में अंसार-गजवा-उल-हिंद से भी इस्लामिक स्टेट के साथ जुड़ने का आह्वान किया गया है। स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा दोनों ही कश्मीर में अपनी जड़े जमाने की कोशिशें कर रहे हैं।
नवंबर में इस्लामिक स्टेट ने कश्मीर घाटी में अपना पहला हमला करने का दावा भी किया था। श्रीनगर शहर के जाकुरा इलाके में एक कार में सवार तीन चरमपंथियों ने पुलिस पर गोलीबारी की थी जिसमें एक पुलिस अधिकारी की मौत हो गई थी और एक अन्य घायल हो गए थे।
स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक गोलीबारी में एक चरमपंथी की भी मौत हुई थी जिसके बाद में इस्लामिक स्टेट के झंडों की तस्वीरें आई थी। हालांकि इस्लामिक स्टेट के मीडिया संस्थान अमाक ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय पुलिसकर्मियों को पाकिस्तानी बताया था। इसके बाद इस्लामिक स्टेट के दावे पर सवाल उठे थे।
इसके बाद नवंबर में ही टेलीग्राम पर पोस्ट संदेशों में कश्मीर घाटी में पुलिसकर्मियों पर हमले करने का आह्वान किया गया था। तीन दिसंबर को पोस्ट एक संदेश में भारत में दूसरे धर्मों को मानने वालों पर हमले करने का आह्वान किया गया था। इस्लामिक स्टेट के संदेशों में कश्मीर को ले कर भारत और पाकिस्तान दोनों की आलोचना भी की जाती रही है।
1 दिसंबर को टेलीग्राम पर जारी एक संदेश में कश्मीरियों से भारत की खुफिया एजेंसी रॉ और पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई के एजेंटों को झूठ में न आने की सलाह भी दी गई थी और कहा गया था कि इनके एजेंट जहां भी हैं वहां उनकी हत्याएं की जानी चाहिए।
इस संदेश में कश्मीरियों से खिलाफत के बैनर तले आने के लिए भी कहा गया था।
खारिज की इस्लामिक स्टेट की मौजूदगी
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इस्लामिक स्टेट के दावों पर चिंता
इन घटनाक्रमों के बाद ये चिंता भी पैदा हुई है कि इस्लामिक स्टेट कश्मीर घाटी में अपने पैर जमा सकता है। अक्तूबर में भारतीय सेना के एक अधिकारी ने चेतावनी दी थी कि कश्मीर घाटी में इस्लामिक स्टेट के झंडे फहराया जाना गहरी चिंता का विषय है और इससे कश्मीर में अलगाव महसूस कर रहे युवा प्रभावित हो सकते हैं।
अगस्त में भारतीय अखबार मिंट ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि साल 2019 तक कश्मीर में चरमपंथ और उग्र हो सकता है।
अज्ञात खुफिया सूत्रों के हवाले से अखबार ने कहा था कि इस्लामिक स्टेट कश्मीर में पैर पसार चुका है और अगले एक दो सालों में कश्मीर में चरमपंथी युवाओं को कट्टरपंथ की ओर धकेल सकते हैं। ये चरमपंथी समूह कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण भी कर सकते हैं।
खारिज की इस्लामिक स्टेट की मौजूदगी
लेकिन 19 दिसंबर को श्रीनगर स्थित अखबार कश्मीर ऑब्जर्वर ने स्वतंत्र टिप्पणीकार इशफाक जमाल का लेख प्रकाशित किया था जिसमें कहा गया था कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए कश्मीर में जगह बनाना आसान नहीं होगा।
जमाल का तर्क था कि कश्मीर की स्थिति अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, यमन या लीबिया से अलग है। उन्होंने इस तर्क को भी खारिज किया था कि पाकिस्तानी खु़फिया एजेंसी कश्मीर में आईएस को बढ़ावा दे रही है।
जमाल का मानना है कि ऐसे संगठन कश्मीर में सिर्फ कुछ दर्जन युवाओं को ही आकर्षित कर सकते हैं। उन्होंने लिखा, "पाकिस्तान, उसकी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई अपनी ओर से ऐसे संगठन को संचालित नहीं होने देंगी क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का स्टैंड प्रभावित होगा।"
भारतीय अधिकारियों ने भी कश्मीर में इस्लामिक स्टेट की वास्तविक मौजूदगी की बातों से इनकार किया है। 20 नवंबर को भारतीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि "कोई भी भारतीय मुसलमान जो इस्लाम में यकीन रखता है वो इस्लामिक स्टेट को इस देश में अपने पैर जमाने का कोई मौका नहीं देगा।"
भारत प्रशासित कश्मीर की पुलिस भी राजनाथ सिंह के बयान से सहमत है। कश्मीर के पुलिस प्रमुख एसपी वैद्य ने कहा था, "मुझे नहीं लगता कि यहां आईएस की कोई मौजूदगी है। किसी पर भी काला झंडा फेंक देना और इस्लामिक स्टेट के होने का दावा करना आसान है, लेकिय ये हकीकत नहीं।"