फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्या है शत्रु संपत्ति, किसकी जायदाद है इसके दायरे में

Fri, 09 Nov 2018 02:58 PM IST
बीबीसी हिंदी
विज्ञापन
शत्रु प्रॉपर्टी - फोटो : BBC
विज्ञापन

संसद ने बीते हफ्ते शत्रु संपत्ति (संशोधन और मान्यकरण) अधिनियम 2016 पारित किया है। इसके साथ ही 1968 में पारित शत्रु संपत्ति अधिनियम एक बार फिर सुर्खियों में आ गया।

विज्ञापन


दो देशों में लड़ाई छिड़ने पर 'दुश्मन देश' के नागरिकों की जायदाद सरकार कब्जे में कर लेती है ताकि दुश्मन लड़ाई के दौरान उसका फ़ायदा न उठा सके। पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीका और ब्रिटेन ने जर्मनी के नागरिकों की जायदाद को इसी आधार पर अपने नियंत्रण में ले लिया था।

भारत ने 1962 में चीन, 1965 और 1971 में पाकिस्तान से लड़ाई छिड़ने पर भारत सुरक्षा अधिनियम के तहत इन देशों के नागिरकों की जायदाद पर कब्जा कर लिया था। इसके तहत जमीन, मकान, सोना, गहने, कंपनियों के शेयर और दुश्मन देश के नागरिकों की किसी भी दूसरी संपत्ति को अधिकार में लिया जा सकता है। भारत ने अब तक 9,500 शत्रु जायदादों की पहचान की है। इनमें से ज्यादातर पाकिस्तान नागिरकों की हैं। इनकी कीमत 1,04,339 करोड़ रुपए से अधिक है।
विज्ञापन


शत्रु संपत्ति अधिनियम के तहत शत्रु देश के नागरिकों को इन जायदादों के रख रखाव के लिए कुछ अधिकार भी दिए गए हैं। पर ये अस्पष्ट हैं, काफ़ी उलझने हैं और बहुत मामले अदालत में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2005 तक कुछ मामलों का निपटारा कर दिया। इसने अपने फैसले में कहा कि शत्रु संपत्ति का रख रखाव करने वाला कस्टोडियन, ट्रस्टी की तरह काम करता है। लेकिन शत्रु देश के पास उसका मालिकाना हक बरकरार रहता है।

सरकार ने 2016 में एक अध्यादेश के जरिए कस्टोडियन के अधिकार में इजाफ़ा कर दिया। पर बाद में वह अध्यादेश समय पर खत्म हो गया। साल 2016 में एक बार फिर यह मामला उठा।

विधेयक में व्यवस्था

हाल ही में पारित हुए विधेयक में कस्टोडियन को शत्रु संपत्ति का मालिक बना दिया गया, यह 1968 से ही प्रभावी भी मान लिया गया। दूसरे, शत्रु संपत्ति की अब तक हुई बिक्री ग़ैर कानूनी घोषित कर दी गई। भारतीय नागरिक विरासत में शत्रु संपत्ति दूसरे को नहीं दे सकते। दीवानी अदालतों को कई मामलों में शत्रु संपत्ति से जुड़े मुकदमे पर सुनवाई का हक नहीं होगा।

नतीजा
इसका नतीजा यह है कि किसी भारतीय नागरिक ने कोई शत्रु संपत्ति खरीदी है या उसे विकसित किया है तो कानूनी तौर पर उससे वह ले लिया जा सकता है। वह इस मामले को सिर्फ़ हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ही उठा सकता है।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें