माना जा रहा है कि अमेरिका के इस फैसले से आने वाले दिनों में भारत के रक्षा क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों की तरफ से अरबों डॉलर के नए निवेश का भी रास्ता खुलेगा। विशेषज्ञों की मानें तो भारतीय और अमेरिकी रक्षा कंपनियों के बीच तेजी से गठबंधन होने के आसार हैं। हालांकि अमेरिका भारत को अपने हथियारों के बाजार के तौर पर नहीं देखता, लेकिन उसकी रणनीति भारत में रक्षा उपकरणों के निर्माण का ढांचा तैयार करने की है। इससे अमेरिकी हथियार निर्माता कंपनियों के बीच भारत में निर्माण इकाई स्थापित करने के लिए उत्साह बढ़ेगा। चूंकि अमेरिका में हथियारों के निर्माण में लागत ज्यादा होती है, लेकिन भारत में ये समस्या नहीं है। यहां आसानी से निर्माण इकाईयां स्थापित की जा सकती हैं और उच्च तकनीकी वाले उपकरणों का दूसरे देशों में भी निर्यात किया जा सकता है। यह 'मेक इन इंडिया' के तहत एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
अमेरिकी कंपनियों के लिए भी फायदे का 'दर्जा'
भारत को यह दर्जा मिलना हथियार बनाने वाली अमेरिकी कंपनियों के लिए भी काफी फायदेमंद सिद्ध होगा। चूंकि अभी तक अमेरिकी कंपनियों को संवेदनशील हथियारों के निर्यात के लिए वहां के वाणिज्य मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ती है और ऐसे मामलों में मंत्रालय मंजूरी देने में काफी देरी करता है या फिर उसे नामंजूर कर देता है। इससे अमेरिकी कंपनियों को भी घाटा होता है। लेकिन यह दर्जा मिल जाने से अमेरिकी कंपनियों की सबसे बड़ी अड़चन दूर हो गई है।