फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

Explainer: क्या है सेफ हार्बर, जिसे मेटा से हटाने की भाजपा सांसद ने दी चेतावनी; कंपनी को इससे कितना घाटा?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 05 Aug 2026 05:25 PM IST

सार

हाल ही में फेसबुक से पीएम मोदी का एक वीडियो हटने के बाद संसदीय समिति ने मेटा प्रमुख से माफी की मांग की थी। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने मेटा को सेफ हार्बर के जरिए मिली सुरक्षा खत्म करने की चेतावनी दी थी। जानिए क्या है अलग-अलग सोशल मीडिया कंपनियों को मिलने वाली सेफ हार्बर सुरक्षा और क्यों इसे हटाए जाने की धमकी के बाद मेटा ने सरकार से माफी मांगी है।
विज्ञापन
विज्ञापन
फेसबुक से PM मोदी का वीडियो हटाए जाने के बाद उपजा विवाद। - फोटो : अमर उजाला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फेसबुक वीडियो प्लेटफॉर्म से कुछ समय तक हटाए जाने की घटना पर संसद की स्थायी समिति के सख्त रुख दिखाने के बाद मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने केंद्र सरकार से माफी मांगी है। सूचना-प्रौद्योगिकी मामलों से जुड़ी कमेटी ने मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग से स्पष्ट तौर पर माफी मांगने को कहा था। इतना ही नहीं समिति में शामिल भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा था कि अगर मेटा की तरफ से तीन दिन के अंदर माफी नहीं मांगी गई तो सरकार इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को मिल रही सेफ हार्बर की सुविधा को वापस ले लेगी। उन्होंने कहा कि यह ऐसी सुविधा है, जिसका कंपनी गलत इस्तेमाल कर रही है।

निशिकांत दुबे की इस धमकी और उसके बाद मार्क जुकरबर्ग की तरफ से आए माफीनामे के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर यह सेफ हार्बर क्या है, जिसे मेटा से छीनने की बात कही गई है? इस सेफ हार्बर से मेटा को क्या मिलता है? अगर यह सेफ हार्बर छिन जाए तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को क्या नुकसान हो सकता है? सरकार के नियम इस सेफ हार्बर को लेकर क्या कहते हैं? आइये जानते हैं...
विज्ञापन

फेसबुक से PM मोदी का वीडियो हटाए जाने के बाद उपजा विवाद। - फोटो : अमर उजाला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फेसबुक वीडियो प्लेटफॉर्म से कुछ समय तक हटाए जाने की घटना पर संसद की स्थायी समिति के सख्त रुख दिखाने के बाद मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने केंद्र सरकार से माफी मांगी है। सूचना-प्रौद्योगिकी मामलों से जुड़ी कमेटी ने मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग से स्पष्ट तौर पर माफी मांगने को कहा था। इतना ही नहीं समिति में शामिल भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा था कि अगर मेटा की तरफ से तीन दिन के अंदर माफी नहीं मांगी गई तो सरकार इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को मिल रही सेफ हार्बर की सुविधा को वापस ले लेगी। उन्होंने कहा कि यह ऐसी सुविधा है, जिसका कंपनी गलत इस्तेमाल कर रही है।

निशिकांत दुबे की इस धमकी और उसके बाद मार्क जुकरबर्ग की तरफ से आए माफीनामे के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर यह सेफ हार्बर क्या है, जिसे मेटा से छीनने की बात कही गई है? इस सेफ हार्बर से मेटा को क्या मिलता है? अगर यह सेफ हार्बर छिन जाए तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को क्या नुकसान हो सकता है? सरकार के नियम इस सेफ हार्बर को लेकर क्या कहते हैं? आइये जानते हैं...

सवाल-1: क्या होता है सेफ हार्बर?

  • सेफ हार्बर, जिसका अर्थ 'सुरक्षित आश्रय' भी है, एक कानूनी अवधारणा है, जिसके जरिए उन वेबसाइट्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, जिन्हें मध्यस्थ या इंटरमीडिएटरी कहा जाता है, को कानूनी सुरक्षा दी जाती है। 
  • ऐसा इसलिए, क्योंकि कई वेबसाइट्स और सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अपने उपयोगकर्ताओं यानी थर्ड पार्टी यूजर्स को सामग्री पोस्ट करने की छूट देते हैं। कई बार प्लेटफॉर्म्स में जो सामग्री डाली जाती है, वह गैरकानूनी भी हो सकती है। 
  • ऐसे में यूजर्स की गलतियों-गड़बड़ियों से इन वेबसाइट्स/प्लेटफॉर्म्स को बचाने के लिए सेफ हार्बर की अवधारणा बनाई गई। इसके जरिए ही किसी भी गैर-कानूनी सामग्री के लिए वेबसाइट-प्लेटफॉर्म कानूनी देनदारी से सुरक्षित रहते हैं।
सीधे शब्दों में समझें तो कोई यूजर अगर फेसबुक या एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर कुछ गैर-कानूनी पोस्ट करता है, तो सीधे तौर पर उस प्लेटफॉर्म को अपराधी नहीं माना जाता और न ही उस पर कोई कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इसे ही कानूनी भाषा में सेफ हार्बर कहते हैं।

मेटा प्लेटफॉर्म के अंतर्गत आते हैं व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, फेसबुक। - फोटो : अमर उजाला

सवाल-2: कैसे लागू होता है सेफ हार्बर का नियम?

इंटरनेट के शुरुआती वर्षों में इस सुरक्षा को इसलिए लाया गया था, ताकि ऑनलाइन नवाचार को बढ़ावा दिया जा सके। इसका मकसद वेबसाइट मालिकों को उस सामग्री के लिए बेवजह परेशान होने या सजा पाने से बचाना था, जिसे बनाने या पोस्ट करने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी।

कहां-क्या कानूनी प्रावधान: भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (आईटी एक्ट, 2000) की धारा 79 मध्यस्थों को यह सुरक्षा प्रदान करती है। इसके तहत स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी तीसरे पक्ष की जानकारी, डेटा या संचार लिंक के लिए मध्यस्थ वेबसाइट-प्लेटफॉर्म जवाबदेह नहीं होगा।

इसी तरह अमेरिका में सेफ हार्बर का प्रावधान संचार अधिनियम, 1934 की धारा 230 में दिया गया है। अमेरिका में यह नियम 1996 में ही शामिल कर लिया गया था। 

सुरक्षा के लिए शर्तें: हालांकि, सेफ हार्बर से मिलने वाली यह सुरक्षा असीमित या बिना शर्तों के नहीं है। अगर किसी प्लेटफॉर्म को सरकार या अदालत की तरफ से किसी गैर-कानूनी सामग्री के बारे में वास्तविक जानकारी मिलती है और वह उसे तत्काल हटाने या डाउन करने में विफल रहता है, तो वह अपनी सेफ हार्बर की सुरक्षा खो सकता है। भारत की सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ किया है कि वास्तविक जानकारी का मतलब अदालत का आदेश या सरकारी अधिसूचना होता है।


सवाल-3: अगर सेफ हार्बर की सुरक्षा न मिले तो क्या हो सकता है?

अगर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स, जैसे सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स या एआई प्लेटफॉर्म्स को सेफ हार्बर की सुरक्षा न मिले, तो वे अपने प्लेटफॉर्म पर तीसरे पक्ष की पोस्ट की गई किसी भी गैर-कानूनी सामग्री के लिए सीधे तौर पर कानूनी रूप से जिम्मेदार होंगे। यानी किसी तीसरे की गलती के लिए उन्हें जुर्माना और सजा भुगतनी पड़ सकती है। 
 

1. आपराधिक और कानूनी कार्रवाई का खतरा
प्लेटफॉर्म्स को उनकी साइट पर ली गई किसी भी गैर-कानूनी सामग्री के लिए आपराधिक मुकदमों का सामना करना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, साल 2004 में भारत में ईबे के तत्कालीन प्रमुख को गिरफ्तार कर लिया गया था, क्योंकि एक यूजर ने उनकी वेबसाइट पर बाल यौन शोषण सामग्री बेचने के लिए सूचीबद्ध  कर दिया था।

2. साइबर अपराध-सामग्री नियमों के उल्लंघन की सीधी जवाबदेही 
सेफ हार्बर खत्म होने से सोशल मीडिया, ई कॉमर्स और अन्य कंपनियां अपनी वेबसाइटों पर होने वाले सभी कंटेंट नियमों के उल्लंघन और साइबर अपराधों के लिए सीधे तौर पर जवाबदेह हो जाएंगी। पहले ही भ्रम फैलाने या निजता का उल्लंघन करने के लिए एआई से बने डीपफेक, उत्पीड़न के मकसद से किसी की निजी जानकारी जैसे नाम, पता सार्वजनिक करना (डॉक्सिंग) और डेटा चोरी के लिए होने वाले ऑनलाइन हमले (फिशिंग) जैसी गतिविधियों को रोकने की जिम्मेदारी इन वेबसाइट्स-प्लेटफॉर्म्स पर ही है। हालांकि, इस तरह की गतिविधियों के लिए अभी इन्हें कानूनी तौर पर जवाबदेह नहीं बनाया गया है। अगर सेफ हार्बर खत्म होता है तो ऐसे हर डीपफेक, डॉक्सिंग और फिशिंग गतिविधि के लिए सोशल मीडिया व अन्य वेबसाइट्स को जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा।

दुनिया के सबसे बड़े डेटा मार्केट में है भारत। - फोटो : अमर उजाला
3. सख्त सरकारी नियम और निगरानी का खतरा
सेफ हार्बर की सुरक्षा खोने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अपनी साइटों पर सूचनाओं और डेटा के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए तथ्यों की और कड़ाई से जांच करनी होगी। यह नियम पहले से ही लागू है और कई कंपनियां अपनी वेबसाइट्स पर कंटेंट की समीक्षा के लिए टीम भी रखती हैं। हालांकि, सेफ हार्बर खत्म होने से एक छोटी चूक भी बड़ी समस्या में बदल सकती है।

भारत में सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स कंपनियों को पहले ही मुख्य अनुपालन अधिकारी (सीसीओ) और नोडल संपर्क व्यक्ति जैसे अधिकारियों को नियुक्त करने जैसी कड़ी शर्तों का पालन करना पड़ता है, और ऐसा न करने पर उनकी सुरक्षा खत्म हो सकती है।

4. अभिव्यक्ति की आजादी पर हो सकता है खतरा
अगर सेफ हार्बर की सुरक्षा हटा ली जाती है, तो प्लेटफॉर्म्स पर सामग्री को तुरंत हटाने का जबरदस्त दबाव पैदा हो सकता है। इसके चलते कंपनियां कानूनी मुकदमों से बचने के लिए बिना किसी जांच-पड़ताल के या यूजर्स को सूचित किए बिना ही मनमाने तरीके से उनके पोस्ट हटा सकती हैं। इससे इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। इतना ही नहीं शासन भी प्लेटफॉर्म-वेबसाइटों को उनके कंटेंट के लिए निशाना बनाना जारी रख सकता है। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next