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सीजेआई के दफ्तर में भी लागू होगा आरटीआई, क्या है सूचना का अधिकार और इसका इतिहास

Wed, 13 Nov 2019 05:34 PM IST
आसिम खान न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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आरटीआई का इतिहास
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर को भी सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे में ला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने फैसले में कहा कि मुख्य न्यायाधीश (सीजीआई) का दफ्तर सार्वजनिक कार्यालय है, इसलिए यह आरटीआई के दायरे में आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि जज किसी कानून से ऊपर नहीं हो सकते। 

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आरटीआई का इतिहास?

सूचना का अधिकार कानून यानी आरटीआई का इतिहास काफी पुराना है। आरटीआई के लिए तमाम संगठनों की लंबी लड़ाई के बाद यूपीए-1 की सरकार ने सूचना के अधिकार को हरी झंडी दिखाई। 2005 में इस कानून को लागू कर दिया गया। आरटीआई के तहत कोई भी भारतीय नागरिक राज्य सरकार और केंद्र सरकार के संस्थानों से जानकारी हासिल कर सकता है। 

वो जानकारी जो देश या राज्य के हितों के खिलाफ नहीं है उसे आवेदनकर्ताओं को मुहैया कराया जा सकता है। भारत की सर्वोच्च अदालत इसके दायरे से बाहर है। लेकिन सीजेआई का दफ्तर अब आरटीआई के दायरे में आ गया है।

क्या है सूचना का अधिकार?

आरटीआई एक ऐसा कानून है जो देश की जनता को सूचना पाने का अधिकार देता है। 15 जून 2005 को इसे अधिनियमित किया गया और पूर्णतया 12 अक्तूबर 2005 को सम्पूर्ण धाराओं के साथ लागू कर दिया गया था। 

देशवासी सरकार को किसी न किसी माध्यम से टैक्स देते हैं। यही टैक्स देश के विकास और व्यवस्था की आधारशिला को लगातार स्थिर रखता है। जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उसके द्वारा दिया गया, पैसा कब, कहां, और किस प्रकार खर्च किया जा रहा है ? यह कानून जनता को ये जानकारी पाने का अधिकार देता है।

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आरटीआई की प्रमुख बातें

  • प्रिंट आउट, डिस्क, फ्लॉपी, टेप, वीडियो कैसेटो के रूप में या कोई अन्य इलेक्ट्रानिक रूप में जानकारी लेना।
  • कार्यों, दस्तावेजों, रिकार्डो का निरीक्षण और दस्तावेज या रिकार्डों की प्रस्तावना।
  • सारांश, नोट्स व प्रमाणित प्रतियां प्राप्त करना और सामग्री के प्रमाणित नमूने लेना।
  • समस्त सरकारी विभाग, पब्लिक सेक्टर यूनिट, किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता से चल रहीं गैर सरकारी संस्थाएं व शिक्षण संस्थान की जानकारी लेना।
  • प्रत्येक सरकारी विभाग में एक या एक से अधिक जनसूचना अधिकारी बनाए गए हैं, जो आरटीआई आवेदन स्वीकार करते हैं। मांगी गई सूचनाएं एकत्र करते हैं और उसे आवेदनकर्ता को उपलब्ध कराते हैं।
  • जनसूचना अधिकारी को 30 दिन और जीवन व स्वतंत्रता के मामले में 48 घंटे के अंदर (कुछ मामलों में 45 दिन तक) मांगी गई सूचना देनी पड़ती है। 
  • जनसूचना अधिकारी द्वारा आवेदन न लेने पर, तय समय सीमा में सूचना नहीं देने पर और गलत या भ्रामक जानकारी देने पर उसके वेतन से 250 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से 25000 तक का जुर्माना देना पड़ सकता है।
  • लोक सूचना अधिकारी आवेदनकर्ता से सूचना मांगने का कारण नहीं पूछ सकता। 
  • लोक सूचना अधिकारी यदि आवेदन लेने से इंकार करता है या परेशान करता है तो उसकी शिकायत सीधे सूचना आयोग से की जा सकती है। 
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