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उम्रभर बदनामी और बेरोजगारी से क्यों जूझती हैं कोठे से छूटी औरतें

Thu, 01 Sep 2016 02:29 PM IST
बीबीसी
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महिलाएं - फोटो : BBC
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कभी नौकरी के झूठे वायदे में फंसकर तो कभी अपने ही पति के झांसे का शिकार होकर हर साल लाखों औरतें देह व्यापार में धकेल दी जाती हैं। एक बार कोठे में फंस जाने के बाद वहां से बाहर निकलने के दो विकल्प होते हैं।
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पुलिस या किसी गैर-सरकारी संस्था की रेड के जरिए या फिर खुद किसी तरीके से भाग निकलने की कोशिश करके। पहली कडीः 'लौट आई, पर मैं अब एक गंदी औरत थी..'

कोलकाता में मानव तस्करी से बच निकली औरतों के साथ काम कर रही संस्था, 'संजोग', शुरू करने वाली उमा चटर्जी बताती हैं कि खुद भागने वाली औरतों को कोई सरकारी मदद नहीं मिलती।

उमा के मुताबिक, ''मौजूदा कानून और सरकारी योजनाएं ऐसी औरतों के लिए नहीं हैं, वो उन्हीं के लिए हैं जो छापा मार के छुडाई गई हों।'' देह व्यापार से निकलीं ज्यादातर औरतें वापस अपने गांव या कस्बे में लौटना ही पसंद करती हैं। पर खुद भागी औरतें जब वहां लौटती हैं तो उन्हें ताने, बदनामी और बेरोजगारी से जूझना पडता है।
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कुछ किस्मत वाली होती हैं, जिन्हें किसी संस्था की मदद मिल जाती है तो वो अपने पैरों पर खडी हो पाती हैं।

, ''ग्रामीण औरतों में भी बदनामी की चिंता इतनी है

महिलाएं - फोटो : BBC
ग्रामीण इलाकों में औरतों को रोजगार दिलाने के लिए सरकार की 'सेल्फ हेल्प ग्रुप' बनाकर उन्हें छोटे-मोटे व्यापार के लिए पैसे देने की योजना काफी कारगर रही है।

लेकिन यह योजना भी देह व्यापार से निकली औरतों की मदद नहीं करती है। उमा बताती हैं, ''ग्रामीण औरतों में भी बदनामी की चिंता इतनी है कि वो 'गंदी' औरतों को अपने ग्रुप में शामिल नहीं करना चाहतीं।''

इन योजनाओं में विवाहित औरतों को ही लिया जाता है। ये मानते हुए कि एकल औरत शादी या किसी और वजह से गांव छोड कर जा सकती है।

दूसरी कडी: तस्करी से भागी औरत की अपना बिजनेस खोलने की कहानी छापे में कोठों से छुडाई औरतों को एक 'रेस्क्यू होम' में रखा जाता है, जहां उन्हें काउंसलिंग दी जाती है और सिलाई, कढाई, ब्यूटीशियन वगैरह का कोर्स सिखाया जाता है। मकसद ये कि जब वो वापस अपने गांव लौटें तो अपनी जिंदगी मजबूती से चला सकें।
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वो कहते हैं, ''मर्द, औरत या ट्रांसजेंडर, जो भी तस्करी से बच निकला है

महिलाएं - फोटो : BBC
मानव तस्करी पर सरकार के नए विधेयक पर काम कर चुके वकील कौशिक गुप्त के मुताबिक ऐसा नहीं होता। कौशिक कहते हैं, ''इनके गांवों में उस तकनीक की कोई मांग है, उन्हें इससे कोई नौकरी या कमाई हो पाएगी, ये सोचा नहीं जाता, अगर कोठे से निकली लडकी ब्यूटीशियन बन जाएगी तो उल्टा और लडकियों को बिगाडने की तोहमत ही लगती है।''

मानव तस्करी से देह व्यापार में धकेले जाने की चुनौती से निपटने के लिए 1956 से ही भारत में 'इम्मोरल ट्रैफिकिंग प्रिवेंशन' कानून है। पर इसके नाकाफी होने की आलोचना के बाद अब सरकार ने एक नया विधेयक, ट्रैफिकिंग ऑफ पर्संस (प्रिवेनशन, प्रोटेक्शन एंड रिहैबिलिटेशन) बिल 2016, तैयार किया है।

कौशिक के मुताबिक ये विधेयक भी ये नहीं बताता कि सरकार की जगह तस्करी से पीडित व्यक्ति को ये अधिकार होना चाहिए कि वो अपनी जंदगी नए तरीके से कैसे बसाएं।

वो कहते हैं, ''मर्द, औरत या ट्रांसजेंडर, जो भी तस्करी से बच निकला है वो किसी भी आम इंसान की तरह अपने बारे में सोचने और फैसला करने का अधिकार रखता है, तो नीति ऐसी होनी चाहिए जो एक व्यक्ति के हालात के मुताबिक ढाली जा सके ताकि उसे सचमुच फायदा हो।''
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