भारत में ओम्बुड्समैन को लोकपाल के नाम से जाना जाता है। फिनलैंड में 1918 में, डेनमार्क में 1954 में, नार्वे में 1961 में और ब्रिटेन में 1967 में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए लोकपाल की स्थापना की गई। विभिन्न देशों में लोकपाल को विभिन्न नामों से जाना जाता है। इंगलैंड, डेनमार्क और न्यूजीलैंड में इसे संसदीय आयुक्त, सोवियत संघ में ‘वक्ता‘ अथवा प्रोसिक्यूटर के नाम से जानते हैं।
लोकपाल के अधिकार
- तलाशी और जब्तीकरण।
- कुछ मामलों में लोकपाल के पास दीवानी अदालत के अधिकार भी होंगे।
- लोकपाल के पास केंद्र या राज्य सरकार के अधिकारियों की सेवा का इस्तेमाल करने का अधिकार होगा।
- संपति को अस्थाई तौर पर अटैच करने का अधिकार।
- विशेष परिस्थितियों में भ्रष्ट तरीके से कमाई गई संपति, आय, प्राप्तियों या फायदों को जब्त करने का अधिकार।
- भ्रष्टाचार के आरोप वाले सरकारी कर्मचारी के स्थानांतरण या निलंबन की सिफारिश करने का अधिकार।
- शुरुआती जांच के दौरान उपलब्ध रिकॉर्ड को नष्ट होने से बचाने के लिए निर्देश देने का अधिकार।
- अपना प्रतिनिधि नियुक्त करने का अधिकार।
- केंद्र सरकार को भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई के लिए उतनी विशेष अदालतों का गठन करना होगा जितनी लोकपाल बताए।
लोकपाल का एक अध्यक्ष जो या तो भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश या फिर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायधीश या फिर कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति हो सकते हैं।
लोकपाल में अधिकतम आठ सदस्य हो सकते हैं, जिनमें से आधे न्यायिक पृष्ठभूमि से होने चाहिए।
इसके अलावा कम से कम आधे सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ी जाति, अल्पसंख्यकों और महिलाओं में से होने चाहिए।
लोकपाल का कार्यकाल
लोकपाल अधिनियम की धारा 6 के अनुसार, अध्यक्ष और प्रत्येक सदस्य कार्यभार ग्रहण करने की तारीख से पांच वर्ष या 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने जो भी पहले हो तक के लिए पद पर बने रहेंगे।
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 4(1) के अनुसार, अध्यक्ष एवं सदस्य, राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर नियुक्त किए जाएंगे। जिसमें निम्नलिखित सदस्य शामिल होंगे-
प्रधानमंत्री - अध्यक्ष
लोकसभा अध्यक्ष - सदस्य
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष - सदस्य
भारत के मुख्य न्यायधीश या उनके द्वारा नामांकित उच्चतम न्यायालय का न्यायधीश - सदस्य
अध्यक्ष एवं सदस्यों द्वारा अनुशंसित एक प्रख्यात न्यायविद, राष्ट्रपति द्वारा नामांकित - सदस्य