चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी जोहान्सबर्ग में हैं। चीन का विदेश मंत्रालय इस दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से राष्ट्रपति शी के भेंट की संभावना जता चुका है। भारत ने इस बारे में अभी पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि दोनों देशों के शिखर नेता एक शहर में, एक छत के नीचे हैं। गतिरोध का समाधान तलाशने के मामले में प्रधानमंत्री मोदी हमेशा सभी विकल्प खुले रखते हैं। ऐसे में इसकी उम्मीद है कि दोनों शिखर नेताओं की मुलाकात हो सकती है। मुलाकात में तमाम द्विपक्षीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। इसमें भारत के लिए सबसे अहम लद्दाख में मई 2020 से दोनों के बीच में आए गतिरोध का समाधान है।
क्या चीन की सेना पीछे हटेगी?
चीन के बारे में आम है कि वह चार इंच आगे और ढाई इंच पीछे चलकर डेढ़ इंच जमीन की बढ़त (विस्तारवादी नीति) बना लेता है। मई 2020 से ही चीन की सेनाओं ने वास्तविक नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय समझौते का उल्लंघन करते हुए भारतीय भू-भाग में दाखिल हैं। इसको लेकर दोनों देशों के बीच 19 वें दौर की शीर्ष सैन्य कमांडर स्तरीय वार्ता हो चुकी है। सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर तमाम प्रयासों के बाद भी अभी तक चीन की सेनाएं अप्रैल 2020 वाली स्थिति में नहीं लौटी हैं। गलवां वैली, पैगांग त्सो झील समेत तमाम क्षेत्र में भारतीय भू-भाग में बफर जोन बने हैं। जिसके एक तरफ बड़ी संख्या में सैन्य संसाधन के साथ भारतीय सीमा और दूसरे छोर पर चीन की सेना डटी है।
भारतीय रक्षा, सामरिक और लॉजिस्टिक सपोर्ट के विशेषज्ञों की मानें तो इस नई चुनौती से निबटने में भारत के ऊपर करीब 1.20-1.50 लाख करोड़ रुपये का सालाना और अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। इसके अलावा डेमचोक और डेपसांग (भारतीय भू-भाग)जैसे सामरिक महत्व के क्षेत्रों से चीन की सेनाएं पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। भारतीय गश्त वाले तमाम क्षेत्रों में चीन की सेना है और चीन इस क्षेत्र से अपनी सेना को पीछे हटाने को लेकर किसी तरह के संवाद का पक्षधर दिखाई दे रहा है। इसके सामानांतर चीन की सेना इन क्षेत्रों में अपनी स्थायी सैन्य संरचना खड़ी करती जा रही है। ऐसे में सभी की उम्मीदें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जोहान्सबर्ग दौरे पर टिकी हैं।
भारत के लिए क्यों जरूरी है डेपसांग और डेमचोक?
कराकोरम दर्रा दौलतबेग ओल्डी हवाई अड्डे के 17-18 किमी उत्तर-पश्चिम में है। यह क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से सटा हुआ है। इसी दौलतबेग हवाई पट्टी के करीब डेपसांग का ऊंचा मैदान है। जहां से भारत की सेनाएं अपने क्षेत्र के साथ-साथ पीओके के क्षेत्र तक निगाह रख सकती हैं। पीओके की शक्सगाम घाटी को पाकिस्तान ने सीमा समझौते के अंतर्गत 1963 में गैरकानूनी तरीके से चीन को दे दिया था। इसी क्षेत्र के पास से सीपीईसी सड़क गुजर रही है। भारत इस क्षेत्र पर अपना दावा जताता है। यही कारण है कि चीन की सेनाएं सामरिक रूप से महत्वपूर्ण डेपसांग के मैदान से पीछे नहीं हटना चाहती हैं।
डेमचोक भी इसी तरह से महत्वपूर्ण है। चीन की सेनाओं ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय में भी घुसपैठ की थी। तब भी कुछ समय तक गतिरोध बना हुआ था। 2013 में भारत के विदेश मंत्री चीन की यात्रा पर गए थे। वहां उनकी विदेश मंत्री वांग यी से लंबी वार्ता हुई थी। इस वार्ता के बाद भारत ने मामले को सुलझा लिया था। भारतीय क्षेत्र में 19 किमी भीतर तक घुस आयी चीन की सेना 21 दिन बाद वापस लौट गई थी। इस दौरान भारत ने चुमार क्षेत्र में अपने एक बंकर को नष्ट कर दिया था। ऐसे में एक बड़ा सवाल है कि क्या प्रधानमत्री नरेन्द्र मोदी जी-20 से पहले लद्दाख क्षेत्र का समाधान खोजकर रिश्ते को नए आयाम पर ले जा पाएंगे? क्या चीन भारतीय क्षेत्र डेपसांग के मैदान और डेमचोक से सेना को पीछे ले जाने पर राजी होगा?
विश्वास बहाली के नाम पर सताता है एक डर
चीन और भारत पिछले दो दशक से गंभीरता के साथ विश्वास बहाली के कई उपायों पर अमल कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद समय-समय पर चीन की सेनाओं ने भारतीय भू- भाग पर घुसपैठ की। हालांकि अप्रैल 2020 से पहले आपत्ति जताने पर वह पड़ोसी देश की सेनाएं लौट जाती थीं। 1962 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब 2020 से बड़ी संख्या में दोनों देशों की सेनाएं सीमा क्षेत्र पर गतिरोध और तनाव की स्थिति में तैनात हैं। दोनों देशों के बीच में सीमा विवाद के मामले में विश्वास बहाली के सभी उपाय धरे के धरे रह गए।
गलवां वैली, पैगोंग त्से झील समेत तमाम क्षेत्रों से चीन की सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा के उसपार भेजने के लिए भारत को अपने ही भू-भाग पर बफर जोन बनाने के लिए तैयार होना पड़ा। अब चीन के रणनीतिकार इसी तरह के बफर जोन और इसे दोनों देशों के बीच में विश्वास बहाली तथा तनाव कम करने के उपाय के रूप में मानने का दबाव बना रहे हैं। दूसरे, डेमचोक और डेपसांग के मुद्दे को सुलझाने के लिए भारत के पास चीन से अपील करने, उसे अंतरराष्ट्रीय नियमों को मानने का हवाला देने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं दिखाई दे रहा है।
हर सरकार में होते रहे हैं विश्वास बहाली के उपाय
- भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध के बाद रिश्तों पर जमी धूल पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने साफ की थी।
- पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ने चीन के साथ रिश्ते को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाने पर विचार किया था।
- पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय में भरत और चीन ने विश्वास बहाली के उपाय को मजबूती देने का प्रयास शुरू किया था।
- पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने द्विपक्षीय व्यापार, आर्थिक सहयोग के रास्ते समेत अन्य के माध्यम से विश्वास बहाली के उपायों को आगे बढ़ाया।
- पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्र, जेएन दीक्षित, एमके नारायणन के समय में भारत चीन ने विश्वास बहाली और तनाव तथा गतिरोध को कम करने के लिए वार्ताएं की।
- 2014 से प्रधानमंत्री मोदी ने इसे नई ऊंचाई देने की कोशिश की। वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ रिश्ते को निजी, क्षेत्रीय, द्विपक्षीय और आपसी स्तर पर प्रगाढ़ता के स्तर पर ले गए।
- विदेश सचिव एस जयशंकर, एनएसए अजीत डोभाल और प्रधानमंत्री मोदी ने इसे दोनों शिखर नेताओं के बीच अनौपचारिक बैठक के स्तर तक ले जाने में संकोच नहीं किया।
- ऐसे में देखना है कि भारत अब चीन से रिश्ते और सीमा विवाद को सुलझाने के लिए कौन से नए रास्ते अपनाते हैं।