कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में क्या रणनीति होगी? यह जनसंख्या के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा राज्य है। यदि ये राज्य एक अलग देश होता तो ये 21 करोड़ की आबादी के साथ दुनिया का पांचवां बड़ा देश माना जाता। वहां 2017 में होने वाले चुनावों के लिए राहुल गांधी ने उस व्यक्ति को हायर किया है जो हाल के दिनों में सबसे तीक्ष्ण बुद्धि वाला राजनीतिक दिमाग माना जाता है। नरेंद्र मोदी ने 2014 के आम चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर की सेवाएँ ली थीं। माना जाता है कि चाय पे चर्चा उनका ही विचार था।
नीतीश कुमार ने 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर पर भरोसा जताया था। अब उन्हें कांग्रेस ने जिम्मेदारी सौंपी है कि वे पार्टी को उत्तर प्रदेश में नया जीवन दें। रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर ने दो रणनीति सुझाई हैं। पहला यह कि पार्टी को एक बार ब्राह्मण मतदाताओं को अपनी ओर खींचना होगा और दूसरा यह कि उत्तर प्रदेश में किसी गांधी, यानी राहुल या प्रियंका को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया जाए।दूसरी सलाह मंजूर हो, इसकी संभावना तो कम ही है। गांधी परिवार का कोई शख्स प्रांत या राज्य में किसी भूमिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। बीते लोक सभा चुनाव में तो कांग्रेस राहुल की मोदी से तुलना करने को भी तैयार नहीं थी।
कांग्रेसी चमचे मोदी को क्षेत्रीय नेता बता रहे थे और राहुल गांधी को राष्ट्रीय नेता मान रहे थे। इसका मोदी ने राहुल के इटली से रिश्ते का जिक्र करते हुए जवाब दिया था कि राहुल केवल राष्ट्रीय नेता नहीं हैं, बल्कि वे तो एक अंतरराष्ट्रीय नेता हैं। वैसे प्रशांत किशोर का पहला सुझाव भी बेहद दिलचस्प है। उत्तर प्रदेश में अभी किसी खास जाति का जुड़ाव कांग्रेस से नहीं है, जैसे यादव समुदाय मुलायम सिंह से जुड़ा है जबकि दलित मायावती से जुड़े हैं और सवर्ण बीजेपी से जुड़े हैं। ऐसे में किसी जाति विशेष से पार्टी का जुड़ाव होना बेहद अहम है क्योंकि यहां से शुरुआत होगी। दूसरे समुदाय, यानी मुसलमान, तभी आपके गठबंधन की तरफ आते हैं जब उन्हें यकीन हो कि पार्टी के जीतने की कोई उम्मीद भी है।
किशोर का तर्क है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों (उत्तर प्रदेश की आबादी का 10 फीसदी हिस्सा) को कांग्रेस से जोड़ना आसान है क्योंकि उनका समर्थन पहले भी पार्टी को मिलता रहा था। उत्तर प्रदेश के कई कांग्रेसी मुख्यमंत्री ब्राह्मण ही रहे हैं, जिनमें नारायण दत्त तिवारी, कमलापति त्रिपाठी, गोविंद वल्लभ पंत और श्रीपति मिश्रा शामिल हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने आखिरी बार चुनाव तीन दशक पहले जीता था। मुझे वो दिन याद हैं लेकिन कई पाठकों के जहन में उन दिनों की कोई यादें नहीं होंगी। भारत की आबादी का 65 फीसदी हिस्सा 35 साल से कम आयु वर्ग का है। मेरा अनुमान है कि उत्तर प्रदेश के मौजूदा मतदाताओं में पांच फीसदी से कम लोगों ने ही 1985 में वोट दिया होगा।
इससे जाहिर है कि उत्तर प्रदेश में बहुत कम लोग होंगे जिन्हें कांग्रेस को वोट देना याद होगा। यह पहली मुश्किल है। दूसरी मुश्किल ज्यादा गंभीर है, किसी पार्टी के लिए केवल चुनावी वजहों से किसी जाति को आकर्षित करना आसान भी नहीं है। उन्हें कुछ ना कुछ ऑफर करना होगा। कांग्रेस क्या आफर कर सकती है? वह ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दे सकती है, इसके अलावा? क्या पार्टी की राजनीति ब्राह्मणों को आकर्षित करने वाली है? मुझे तो नहीं लगता। नीतिगत आधारों पर बात करें तो पिछली कांग्रेस सरकार ने गरीबों का ध्यान रखा था, यानी निचली जातियों का।