विधानसभा चुनावों से पहले निलंबित टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर की ओर से पार्टी के अल्पसंख्यक वोट बैंक को नई चुनौती पेश करने की कोशिश की है। इससे पश्चिम बंगाल में एक बार फिर मुस्लिम सामाजिक-राजनीतिक लामबंदी में एक उछाल देखने को मिल रहा है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसने अतीत में भी हलचल मचाई है, लेकिन चुनावी नतीजों को बदलने में सक्षम नहीं रहा है।
इस तरह की उथल-पुथल के बावजूद पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों का मतदान पैटर्न दशकों से काफी हद तक स्थिर रहा है। जो धार्मिक चमक-धमक या प्रतीकात्मक दावे की तुलना में संगठन, गठबंधन और वोट के एकीकरण से ज्यादा प्रभावित होता है।
अतीत में भी होती रही हैं कोशिशें, लेकिन सब असफल
294 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव कुछ ही महीनों पहले हुमायूं कबीर की बगावत जैसी घटनाएं, जो तीखी बयानबाजी और भावनात्मक प्रतीकों से जुड़ी हैं, टीएमसी के अल्पसंख्यक वोटों के विभाजन के बारे में अटकलों को जन्म देती हैं। जो लंबे समय से उसका चुनावी वोटबैंक माना जाता रहा है। अतीत में भी इसी तरह के मामले राजनीतिक चर्चा और मीडिया की रिपोर्ट्स में हावी रहे हैं, लेकिन मतदान के दिन चुनावी गणित के फिर से हावी होने पर वे फीके पड़ जाते हैं। 2016 में धर्मगुरु तोहा सिद्दीकी और 2021 में अब्बास सिद्दीकी जैसे नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान भारी भीड़ जुटाई।
इसी तरह हुमायूं कबीर के इर्द-गिर्द चल रही मौजूदा हलचल राजनीतिक मुखरता के एक जैसे पल को दर्शाती है। हर घटनाक्रम ने टीएमसी के अल्पसंख्यक मतदाता आधार को सेंध लगाने और मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के एक वैकल्पिक केंद्र के उदय की उम्मीदें बढ़ा दी हैं।
हालांकि, जमीनी स्तर पर चुनाव अभियान खत्म होने के बाद ये दावे स्थिर हो जाते हैं और सियासी गुणा-गणित हावी हो जाती है। अब्बास सिद्दीकी के राजनीतिक पदार्पण से लेकर कबीर के राजनीतिक उदय तक, बंगाल में मुस्लिम-केंद्रित पहलों से एक माहौल बनता है। जो चुनावों से पहले चरम पर पहुंचता है, बहस को तेज करता है और सीटों पर मतदान पैटर्न में बदलाव लाए बिना खत्म हो जाता है।
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मतदाताओं का एक ही सवाल- भाजपा को कौन रोक सकता है
धार्मिक शख्सियतों की ओर से चुनाव से पहले की जाने वाली लामबंदी को सीटों में बदलना मुश्किल होता रहा है, क्योंकि बूथ-स्तर का संगठन, गठबंधन प्रबंधन और वोटों का हस्तांतरण निर्णायक वजहें बने हुए हैं। विश्लेषक और राजनीतिक नेता इस पुनरावृत्ति की वजह नेतृत्व की विफलता के बजाय संरचनात्मक बाधाओं को मानते हैं। राजनीतिक विश्लेषक मैदुल इस्लाम ने कहा, 'धार्मिक हस्तियां भावनाओं को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन वे अल्पसंख्यक वोटों को निर्वाचन क्षेत्रों में स्थानांतरित नहीं कर सकतीं। मतदाता एक सरल प्रश्न पूछते हैं- कौन जीत सकता है, और कौन भाजपा को रोक सकता है।'
2021 के चुनावों से कुछ महीने पहले अब्बास की ओर से गठित और वामपंथी-कांग्रेस के सहयोगी इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) को टीएमसी के सियासी समीकरणों को बिगाड़ने वाली पार्टी के तौर पर पेश किया गया था। इसके उलट आईएसएफ को केवल एक सीट मिली। इसने बंगाल की राजनीति में साबित किया कि रैली में आई भीड़ का मतलब चुनावी सफलता नहीं है।
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भीड़ का मतलब, चुनावी सफलता नहीं
आईएसएफ के इकलौते विधायक नौशाद सिद्दीकी ने कहा, 'लोग रैलियों में भावनाओं के साथ आते हैं, लेकिन वोट डर और सोच-समझकर डाले जाते हैं। अगर लोगों को लगता है कि उनका वोट भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है, तो वे पीछे हट जाते हैं।' हुमायूं कबीर के टीएमसी नेतृत्व के खिलाफ बगावत करने के बाद यह बहस फिर से शुरू हो गई है। पार्टी के 'हिंदू समर्थक रवैये' की उनकी आलोचना, नई बाबरी मस्जिद का एलान और जनता उन्नयन पार्टी के शुभारंभ ने बंगाल के चुनाव से पहले माहौल में नई अस्थिरता पैदा कर दी है।
हुमायूं कबीर की मुर्शिदाबाद की रैलियों में भारी भीड़ उमड़ी रही है। उन्होंने एक रैली में कहा, 'मैं वोटों का बंटवारा नहीं कर रहा हूं; मैं उन आवाजों को उठा रहा हूं जिन्हें दबा दिया गया है।' उन्होंने 135 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने और वामपंथी दलों, आईएसएफ और एआईएमआईएम के साथ संपर्क बनाए रखने की बात कही है।
एक सीपीआई (एम) नेता ने कहा कि कार्यकर्ताओं, मतदान एजेंटों और बूथ स्तर की मशीनरी के बिना उत्साह शायद ही मतदान के दिन तक टिक पाता है। भाजपा का तर्क है कि पहचान पर आधारित लामबंदी ध्रुवीकरण को तेज करती है और हिंदू वोटों को एकजुट करती है। भाजपा के अनुसार यह बहुकोणीय चुनावों में उसके लिए फायदेमंद साबित होती है।
मुस्लिम वोटों पर टीएमसी का बड़ा दावा
पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री फिरहाद हकीम ने दावा किया कि अल्पसंख्यक जानते हैं कि केवल टीएमसी ही भाजपा को रोक सकती है। उन्होंने कहा कि बंगाल में प्रभाव ही सब कुछ तय करता है, सियासी गणित ही वोट दिलवाती है।
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