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West Bengal Elections 2026: गोरखालैंड के मुद्दे में अब पहले जैसी धार नहीं; इस बार मतदाताओं के मन में क्या?

सार

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों की तरफ से अपनी तैयारियों को परखा जा रहा है। वहीं राज्य के अलग क्षेत्रों में वे अलग मुद्दों के साथ पहुंच रहे हैं। लेकिन, राजनीतिक जानकार बताते हैं कि गोरखालैंड के मुद्दे में अब पहले जैसी धार नहीं रह गई है।
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 - फोटो : ANI
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विस्तार
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पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र की राजनीति इस बार एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां दशकों पुरानी भावनाएं व बदलती जमीनी जरूरतें आमने-सामने दिख रही हैं। गोरखालैंड का सपना अब भी है, पर इसकी चुनावी धार पहले जैसी नहीं रही। सड़क, पानी, रोजगार, पर्यटन और स्थिर शासन जैसे मुद्दे मतदाताओं को ज्यादा प्रभावित करते दिख रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या पहाड़ की राजनीति फिर से उसी पुराने सपने के इर्द-गिर्द घूमेगी या अब विकास की हकीकत को प्राथमिकता मिलेगी।
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राजनीतिक समझौतों तक सीमित रही गोरखालैंड की मांग
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह चुनाव तय करेगा कि पहाड़ की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी। गोरखालैंड एक नए राज्य की मांग है, जिसमें दार्जिलिंग, कालिम्पोंग व आसपास के गोरखा बहुल क्षेत्रों को शामिल करने की बात की जाती रही है। 1980 के दशक में सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में इस मांग ने बड़े आंदोलन का रूप लिया। इसके बाद 2000 के दशक में यह आंदोलन फिर से उभरा और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के जरिए मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में सामने आया। हालांकि समय के साथ यह मुद्दा राजनीतिक समझौतों व प्रशासनिक ढांचों तक सीमित होता गया।
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2021 के विधानसभा चुनाव में क्षेत्र की तीन प्रमुख सीटों- दार्जिलिंग, कालिम्पोंग व कुरसियांग पर भाजपा जीती थी। उसे गोरखालैंड मुद्दे पर सहानुभूति, राज्य सरकार के खिलाफ एंटी-इन्कम्बेंसी, स्थानीय असंतोष और पहचान की राजनीति, विपक्ष के बिखराव का लाभ मिला था।
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पर्वतीय क्षेत्र में बदलते समीकरण
इस बार पहाड़ की राजनीति में समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस ने स्थानीय नेतृत्व के साथ मिलकर अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति अपनाई है। पार्टी का फोकस विकास, स्थिर प्रशासन व स्थानीय सहयोग पर है। अनित थापा के नेतृत्व वाला भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा तृणमूल के साथ मिलकर एक मजबूत स्थानीय गठबंधन के रूप में उभर रहा है। यह गठबंधन पहाड़ में नई राजनीतिक धुरी बनता दिख रहा है। वहीं भाजपा अब भी अपनी पुरानी सीटों और समर्थन को बचाने की कोशिश में है, पर बदलते मुद्दों और स्थानीय समीकरणों के चलते उसे चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा अभी भी गोरखालैंड के मुद्दे को उठाता है, पर पहले जैसा प्रभाव और जनाधार अब सीमित दिखाई देता है।

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