पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया। पूर्वी कमान के बीएसएफ उप महानिरीक्षक सुरजीत सिंह गुलेरिया ने कहा, हमको प्रण लेना चाहिए कि रक्त की कमी के चलते देश में किसी की जान नहीं जाएगी। आज हमारे देश में स्वैच्छिक रक्तदान करने की परंपरा कम है, उसे हम सबको मिलकर बढ़ाना होगा। शिविर में मुख्य अतिथि बीएसएफ के पूर्वी कमान मुख्यालय, कोलकाता के आईजी (मेडिकल) डॉ. आशीष कुमार मजूमदार ने कहा, कई बार देश के कई अस्पतालों में रक्त की बहुत कमी हो जाती है। इसलिए युवाओं को इस नेक काम के लिए आगे आना चाहिए। समाजसेवी संस्था अंकुर की 18वीं वार्षिक रक्तदान कैंप के उद्घाटन के मौके पर डीआइजी सुरजीत सिंह गुलेरिया ने कहा, हमारे देश में स्वैच्छिक रक्तदान करने की परंपरा नहीं के बराबर है, इसे बदलना होगा।
गुलेरिया ने कहा कि हर युवा, जिसकी उम्र 18 साल से ऊपर है और हर तरह से स्वस्थ है, वह साल में कम से कम दो बार रक्तदान कर सकता है। युवाओं का स्वैच्छिक रक्तदान के लिए आगे आना चाहिए। उन्होंने बताया कि रक्तदान करने से हार्ट अटैक सहित कई बीमारियों की आशंका नहीं के बराबर हो जाती है। रक्तदान करने के बाद जो सुकून और आत्मा को शांति भी मिलती है।
बैरकपुर रक्तदान शिविर में स्थानीय लोगों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। शिविर के आयोजक और अंकुर संस्था के अध्यक्ष संजय साहा ने बताया कि लाइव केयर ब्लड बैंक के सहयोग से आयोजित इस शिविर में कुल 62 लोगों ने स्वेच्छा से रक्तदान किया। इस मौके पर संस्था के सचिव नूपुर भट्टाचार्य, रतन राय चौधरी, स्वपन मुखर्जी, मोहित साहा, खोकन वैद्य, रामू राजभर, प्रलय मंडल व अन्य मौजूद रहे।
शिविर में मौजूद आईजी (मेडिकल) डॉ. आशीष कुमार मजूमदार ने कहा, रक्तदान शिविर में आने के बाद वे बहुत सम्मानित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्वस्थ नागरिकों को स्वेच्छा से रक्तदान करके जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिक इस नेक कार्य के प्रति बहुत जागरूक और समर्पित हैं। डॉ साहा के अनुसार, वे खुद भी कई बार रक्तदान कर चुके हैं।
उन्होंने भारत में सबसे ज्यादा बार रक्तदान करने वाले शख्स- कश्मीर क्षेत्र के साबिर खान का भी जिक्र किया। डॉ साहा के मुताबिक साबिर ने 58 वर्ष की आयु तक कुल 174 यूनिट रक्तदान किया। उन्होंने स्थान, जाति और समाज की परवाह किए बिना स्वेच्छा से रक्तदान किए। उन्होंने कहा कि रक्तदान को महादान ही नहीं, बल्कि जीवनदान कहना उचित होगा।
डॉ साहा के मुताबिक कोलकाता में 1942 में आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ (अखिल भारतीय स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान) में भारत का पहला रक्तदान शिविर आयोजित किया गया था। इसे रेड क्रॉस सोसाइटी ने आयोजित किया था।