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बंगाल में विधानसभा कमेटी पर सियासत: BJP- बागी गुट पर TMC ने लगाया साठगांठ का आरोप, स्पीकर पर क्यों उठे सवाल?

Fri, 07 Aug 2026 11:05 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, कोलकाता।

सार

पश्चिम बंगाल विधानसभा की स्टैंडिंग कमेटियों के गठन ने नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। ममता बनर्जी गुट इसे भाजपा और बागी गुट की राजनीतिक साठगांठ बता रहा है, जबकि भाजपा और बागी नेता इसे पूरी तरह नियमों के मुताबिक हुआ फैसला बता रहे हैं। अब नजर इस बात पर है कि स्पीकर इस विवाद पर क्या कदम उठाते हैं।
 
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कुणाल घोष, टीएमसी नेता - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर टकराव तेज हो गया है। इस बार विवाद विधानसभा की स्टैंडिंग कमेटियों को लेकर है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर बड़ा आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि विधानसभा की अहम कमेटियां भाजपा और ऋतव्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के बीच बांट दी गईं। वहीं, ममता गुट को पूरी प्रक्रिया से दूर रखा गया।
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टीएमसी विधायक कुणाल घोष ने कहा कि कमेटियों का गठन राजनीतिक समझ के तहत हुआ है। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। उनका दावा है कि कमेटियों के गठन से पहले ममता बनर्जी गुट के विधायी नेतृत्व से कोई राय नहीं ली गई। यह विवाद विधानसभा सचिवालय की उस घोषणा के बाद शुरू हुआ, जिसमें 41 स्टैंडिंग कमेटियों के अध्यक्षों के नाम जारी किए गए।

कमेटियों का बंटवारा कैसे हुआ?
विधानसभा की 41 स्टैंडिंग कमेटियों में 31 की अध्यक्षता भाजपा विधायकों को मिली है। बाकी 10 कमेटियां विपक्ष के हिस्से गई हैं। इनमें आईएसएफ विधायक नौशाद सिद्दीकी को पेपर लेड कमेटी और बागी टीएमसी विधायक कन्हाई लाल अग्रवाल को पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (पीएसी) का अध्यक्ष बनाया गया है।
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कुणाल घोष का आरोप है कि विपक्ष के हिस्से आई 10 कमेटियों में से नौ की कमान ऋतव्रत बनर्जी गुट के पास चली गई। उन्होंने इसे भाजपा और बागी गुट के बीच राजनीतिक समझ का नतीजा बताया।

मामले से जुड़ी पांच बड़ी बातें
  • 41 स्टैंडिंग कमेटियों के अध्यक्षों के नाम घोषित किए गए।
  • 31 कमेटियों की अध्यक्षता भाजपा विधायकों को मिली।
  • विपक्ष के हिस्से आई 10 कमेटियों में से 9 की कमान ऋतव्रत बनर्जी गुट को मिली।
  • पब्लिक अकाउंट्स कमेटी के अध्यक्ष कन्हाई लाल अग्रवाल बनाए गए।
  • आईएसएफ विधायक नौशाद सिद्दीकी को पेपर लेड कमेटी की जिम्मेदारी दी गई।

क्या वरिष्ठ नेताओं को जानबूझकर किया गया नजरअंदाज?
कुणाल घोष ने कहा कि पहले विधायकों की योग्यता और अनुभव को देखकर कमेटियों में जिम्मेदारी दी जाती थी। इस बार ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने दावा किया कि आईटी क्षेत्र की पृष्ठभूमि रखने वाली विधायक अलिफा अहमद को आईटी से जुड़ी समिति में जगह नहीं मिली। उन्हें सेल्फ हेल्प ग्रुप कमेटी में भेज दिया गया।

घोष ने यह भी आरोप लगाया कि वरिष्ठ नेताओं को भी महत्व नहीं दिया गया। उनके अनुसार, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष विमान बनर्जी को केवल लाइब्रेरी कमेटी की जिम्मेदारी दी गई। वहीं 10 बार के विधायक शोभनदेब चट्टोपाध्याय को किसी भी कमेटी का अध्यक्ष नहीं बनाया गया।

घोष ने गृह मामलों की समिति पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि इसमें सरकार के करीबी माने जाने वाले सदस्यों को रखा गया है, ताकि पुलिस और प्रशासन के कामकाज की सख्त समीक्षा न हो सके। हालांकि, उन्होंने आईएसएफ विधायक नौशाद सिद्दीकी को समिति का अध्यक्ष बनाए जाने का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष के सभी दलों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

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आरोपों पर भाजपा और बागी गुट ने क्या कहा?
ऋतव्रत बनर्जी गुट ने टीएमसी के सभी आरोप खारिज कर दिए हैं। विपक्ष के नेता ऋतव्रत बनर्जी ने कहा कि कमेटियों का बंटवारा विधानसभा में विपक्ष की संख्या के आधार पर हुआ है। उन्होंने कहा कि पब्लिक अकाउंट्स कमेटी की अध्यक्षता विपक्ष को देकर पुरानी संसदीय परंपरा बहाल की गई है। उनके अनुसार, टीएमसी सरकार के समय यह परंपरा टूट गई थी। भाजपा विधायक दल ने भी कहा कि कमेटियों का गठन विधानसभा के नियमों और सदन में दलों की संख्या के अनुसार हुआ है। सरकार का विपक्ष की ओर से नाम तय करने में कोई रोल नहीं होता।
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दो गुटों में बंट गई है टीएमसी
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब 2026 विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी दो गुटों में बंट चुकी है। पहले 80 में से 65 विधायकों ने ऋतव्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुना। इसके बाद बागी गुट ने वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय की अध्यक्षता में अलग संगठन बनाया। बाद में 20 लोकसभा सांसद भी एनडीए समर्थित एनसीपीआई के साथ चले गए। हालांकि, उनके खिलाफ दलबदल कानून के तहत दायर याचिकाएं अभी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के पास लंबित हैं।
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