फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्या फिर लौटेंगी ममता: 1977 के बाद जो बंगाल की सत्ता से गया वो दल कभी लौटकर नहीं आया, टीएमसी का क्या होगा?

Sun, 10 May 2026 01:58 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल की सत्ता से जाने के बाद अब चर्चाएं हैं कि क्या तृणमूल कांग्रेस फिर कभी राज्य में वापसी कर पाएगी? दरअसल, बंगाल का सियासी इतिहास कुछ ऐसा रहा है कि यहां चुनाव हारने के बाद किसी दल या किसी नेता की मुख्यधारा में वापसी की संभावनाएं काफी कम ही रही हैं। फिर चाहे वह वाम मोर्चा और उसके नेताओं की बात हो या उससे पहले बंगाल में शासन करने वाली कांग्रेस की। जब एक पार्टी के हाथ से बंगाल छूटा तो वह पार्टी आगे लंबे समय के लिए बंगाल से दूर ही रही है। 
विज्ञापन
बंगाल का सियासी और चुनावी इतिहास। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

पश्चिम बंगाल में 9 मई (शनिवार) को शुभेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण के साथ ही राज्य में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार बन गई। इसी के साथ राज्य में एक और मुख्यमंत्री के लंबे शासन का अंत हो गया। ममता बनर्जी ने राज्य में मुख्यमंत्री के तौर पर कुल तीन कार्यकाल यानी 15 साल पूरे किए। हालांकि, अब उनके भविष्य को लेकर चर्चा का दौर जारी है। इसकी दो बड़ी वजहें हैं, पहली- बंगाल में अब तक किसी भी सरकार का कार्यकाल छोटा यानी एक बार का नहीं रहा है। दूसरा- ममता बनर्जी की उम्र भी अब 71 साल है। 
विज्ञापन

 
बंगाल में छोटे या कम अवधि की सरकारें और मुख्यमंत्री दोनों की ही काफी कमी रही है। इसी का नतीजा है कि राज्य में शुभेंदु से पहले तक बंगाल के पूरे इतिहास में सिर्फ आठ मुख्यमंत्री ही रहे हैं। इतना ही नहीं, कांग्रेस के बंगाल की सत्ता से जाने के बाद कोई भी मुख्यमंत्री चुनाव हारने के बाद दोबारा कभी सत्ता में वापस नहीं लौटा। यहां तक की 1977 के बाद कोई पार्टी भी हारने के बाद कभी सत्ता में नहीं लौटी।  

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर पश्चिम बंगाल में सरकारों और मुख्यमंत्रियों के बदलने का क्या इतिहास रहा है? राज्य में कब-कब किस पार्टी की सरकार रही है? कैसे अलग-अलग दलों ने दशकों तक बंगाल पर शासन किया? इस दौरान राज्य ने कितने मुख्यमंत्री देखे और एक बार सत्ता खोने के बाद कोई सरकार या मुख्यमंत्री कब-कब सत्ता में वापसी करने में सफल रहा है? आइये जानते हैं...
 




पश्चिम बंगाल में सरकारों और मुख्यमंत्रियों के बदलने का क्या इतिहास रहा है?

पश्चिम बंगाल में सबसे पहला शासन कांग्रेस का रहा। आजाद भारत में बिधान चंद्र रॉय बंगाल के पहले मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 1952 से 1962 तक लगातार 10 साल सरकार चलाई। हालांकि, 1 जुलाई 1962 को उनका निधन हो गया। इसके बाद सत्ता में आए प्रफुल्ल चंद सेन, जिन्होंने कांग्रेस की स्थिरता को बरकरार रखा और 1967 में चुनाव तक सरकार चलाई। हालांकि, 1967 के बाद का दौर बंगाल की राजनीति में उठापटक वाला रहा। इस दौरान कांग्रेस का बंटवारा हुआ और सत्ता बदलती रही। 

कांग्रेस के बाद सत्ता में आई माकपा ने बंगाल में लगातार 33 साल शासन किया। वह भी सिर्फ दो मुख्यमंत्रियों के अंतर्गत- ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य। इनके बाद आई तृणमूल कांग्रेस की सरकार और मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी, जिन्होंने अगले 15 साल बंगाल के शासन को चलाया। 

कैसे अलग-अलग दलों ने दशकों तक बंगाल पर शासन किया?

कांग्रेस का 25 साल का शासन

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का शासन राज्य के शुरुआत और सबसे अहम राजनीतिक युगों में से एक रहा है। कुल मिलाकर, कांग्रेस ने राज्य पर करीब 25 साल तक शासन किया। एक लिहाज से देखा जाए तो वाम मोर्चा (माकपा) के बाद  बंगाल पर राज करने वाली दूसरी सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी कांग्रेस रही है। इस दल ने बंगाल में अब तक राजनीतिक दलों के शासन का कुल 33 फीसदी शासन किया। 

1. शुरुआती बेरोकटोक शासन (1947-1967)
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर डॉ. बिधान चंद्र रॉय पश्चिम बंगाल के पहले मुख्यमंत्री बने। 1952 के चुनाव जीतने के बाद राज्य के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री भी वही बने। इसके बाद उन्होंने लगातार 10 साल तक सरकार चलाई और 1 जुलाई अपने निधन तक मुख्यमंत्री रहे। अगर आजादी के ठीक बाद से उन्हें मिली प्रीमियर की जिम्मेदारी को मिला लिया जाए तो उन्होंने 14 वर्षों से अधिक समय तक बंगाल में शासन किया और वे कांग्रेस के सबसे लंबे समय कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री रहे।

उनके निधन के बाद प्रफुल्ल चंद्र सेन मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने 1962 से 1967 तक तक सरकार चलाई। यानी 1952 से 1967 तक राज्य में कांग्रेस का एकछत्र और स्थिर राज रहा।

2. राजनीतिक अस्थिरता और अल्पकालिक सरकारों का दौर (1966-1972)    

1967 में चुनाव के बाद बाद राज्य में राजनीतिक उथल-पुथल, राष्ट्रपति शासन और गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ। दरअसल, यह वह दौर था, जब कांग्रेस में ही अंदरूनी खटपट जारी थी और मूल कांग्रेस में दो फाड़ हो गए। इसमें एक धड़ा बंगाल कांग्रेस कहलाया, जिसके नेता अजय मुखर्जी बने। उनके साथ प्रणब मुखर्जी, सिद्धार्थ शंकर रे सरीखे नेता थे। इस अस्थिरता के बीच कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और महज एक छोटे अंतराल के लिए- 2 अप्रैल 1971 से 29 जून 1971 तक ही शासन (88 दिन) में रही। उसकी यह सरकार भी बांग्ला कांग्रेस के नेता अजय मुखर्जी के विलय के बाद बनी।

ये भी पढ़ें: Khabaron Ke Khidadi: बंगाल में बनी भाजपा की पहली सरकार, विश्लेषकों ने बताया शुभेंदु के सामने कितनी चुनौतियां?
 

3. अंतिम पूर्ण कार्यकाल (1972-1977)

राजनीतिक अस्थिरता के दौर के बाद, कांग्रेस ने 1972 के चुनावों में वापसी की। सिद्धार्थ शंकर रे 20 मार्च 1972 को मुख्यमंत्री बने और उन्होंने पांच साल और 41 दिन तक शासन किया। वे 1967 के बाद अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले पहले मुख्यमंत्री बने।

1977 के विधानसभा चुनावों में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे ने जीत हासिल की। इस हार के साथ ही बंगाल में कांग्रेस के शासन का अंत हो गया। इसके बाद से लेकर मई 2026 तक, कांग्रेस राज्य में दोबारा अपनी सरकार बनाने में सफल नहीं हो पाई है।    

वाम मोर्चा का 34 साल का वर्चस्व

पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) या वाम मोर्चे का शासन राज्य के राजनीतिक इतिहास का सबसे लंबा और स्थिर दौर रहा है। वाम दल ने राज्य पर करीब 34  तक शासन किया, जो राज्य के कुल शासन काल का लगभग 44.74% है। यह न केवल बंगाल के इतिहास में सबसे लंबा शासन था, बल्कि दुनिया में सबसे लंबे समय तक चलने वाली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकारों में से एक था। कांग्रेस की तरह ही माकपा के कार्यकाल को तीन दौर से समझा जा सकता है।

1. ज्योति बसु का 23 साल का ऐतिहासिक शासन (1977-2000) 

राजनीतिक अस्थिरता और कांग्रेस शासन के बाद 1977 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे ने भारी जीत दर्ज की और 21 जून 1977 को ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने। ज्योति बसु ने लगातार 5 कार्यकाल तक माकपा के नेतृत्व वाली सरकार चलाई। उन्होंने 23 साल तक मुख्यमंत्री के रूप में काम किया। उस समय यह भारत में किसी भी नेता के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड था। इसे बाद में 2018 में सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग ने यह रिकॉर्ड तोड़ा।

ये भी पढ़ें: Election Analysis: ममता की हार के बाद कैसे बदलेगी इंडिया गठबंधन की स्थिति; जहां नाम कटे, वहां कैसे रहे नतीजे?
 

2. बुद्धदेब भट्टाचार्य का दौर (2000-2011)

6 नवंबर 2000 को ज्योति बसु के पद छोड़ने के बाद बुद्धदेब भट्टाचार्य ने उनके उत्तराधिकारी के रूप में मुख्यमंत्री का पद संभाला। बुद्धदेब भट्टाचार्य ने लगातार तीन कार्यकाल तक सरकार का नेतृत्व किया और 10 वर्ष से ज्यादा तक शासन किया। उनके नेतृत्व में वाम मोर्चा 2011 तक सफलतापूर्वक सत्ता में बना रहा।

3. वाम शासन का अंत (2011)

2011 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे को ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के हाथों हार का सामना करना पड़ा। 20 मई 2011 को बुद्धदेब भट्टाचार्य का कार्यकाल खत्म हुआ, और इसी के साथ पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी का लगभग 34 वर्षों तक चलने वाला ऐतिहासिक शासन समाप्त हो गया और वाम दलों की सरकार फिर लौटकर नहीं आई। शासन खत्म होने के बाद वाम दल अब राज्य में अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं।  इसके बाद सत्ता में आई ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी।

तृणमूल कांग्रेस का 15 साल का शासन

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का शासन 2011 से 2026 तक रहा, जो राज्य के राजनीतिक इतिहास का एक अहम कालखंड रहा है। इस लगभग 15 वर्षों के शासन की सबसे बड़ी पहचान यही है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी ने लेफ्ट का बंगाल से लगभग सफाया कर दिया। 

टीएमसी का शक्तिशाली शासन (2011-2026)
2011 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने एक ऐतिहासिक जीत दर्ज की और वाम मोर्चे के 34 साल पुराने शासन को खत्म कर दिया। इस जीत के बाद, पार्टी की नेता ममता बनर्जी ने 20 मई 2011 को पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी और उन्होंने लगातार तीन कार्यकालों तक शासन किया। टीएमसी ने जितने समय तक राज्य में शासन किया, वह राज्य के कुल राजनीतिक इतिहास का 19.75% हिस्सा है। इस पूरी अवधि के दौरान ममता बनर्जी ही राज्य की एकमात्र मुख्यमंत्री रहीं।

तृणमूल कांग्रेस के इस 15 साल के लंबे शासन का अंत 2026 के विधानसभा चुनावों में हुआ। इन चुनावों में भाजपा ने विधानसभा में बहुमत हासिल किया और ममता बनर्जी की टीएमसी को हार का सामना करना पड़ा।

क्या बंगाल में चुनाव हारकर भी वापस लौटा कोई दल-मुख्यमंत्री?

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में ऐसा बहुत ही कम हुआ, जब कोई मुख्यमंत्री और राजनीतिक दल सत्ता से बाहर होने के बाद दोबारा सत्ता में लौटे। खासकर चुनाव में हार के बाद। सिर्फ 1960 के दशक के दौरान ही ही ऐसा था, जब कोई पार्टी और नेता अलग-अलग कार्यकालों में सत्ता में वापसी करने में सफल रहा। यह पार्टी थीं बांग्ला कांग्रेस और उसके बाद कांग्रेस। दरअसल, बांग्ला कांग्रेस खुद कांग्रेस से ही अलग होकर बना धड़ा था। इसके नेता अजय मुखर्जी राज्य के ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं जिन्होंने गैर-लगातार कार्यकालों में वापसी की। उन्होंने तीन अलग-अलग बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का पद संभाला। दो बार बांग्ला कांग्रेस के नेता के तौर पर और एक बार कांग्रेस नेता के तौर पर।

पहला कार्यकाल: अजय मुखर्जी पहली बार 1 मार्च 1967 को मुख्यमंत्री बने थे। तब उनकी पार्टी बांग्ला कांग्रेस को 34 सीटें मिली थीं और वह माकपा और अन्य दलों के समर्थन से पश्चिम बंगाल की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाने में सफल रहे। हालांकि,  21 नवंबर 1967 को एक साल से भी कम समय में ही उनकी सरकार गिर गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। 
विज्ञापन

दूसरा कार्यकाल: मुखर्जी और बांग्ला कांग्रेस का दूसरा कार्यकाल एक साल से कुछ ज्यादा समय के लिए रहा। उन्होंने 25 फरवरी 1969 को फिर मुख्यमंत्री पद हासिल किया। इस चुनाव में बांग्ला कांग्रेस को 33 सीटें मिलीं, लेकिन इस पार्टी ने चुनाव थर्ड फ्रंट में शामिल होकर ही लड़ा था। इस चुनाव में थर्ड फ्रंट को 200 से ज्यादा सीटें मिलीं और अजय मुखर्जी फिर मुख्यमंत्री बनने में सफल हुए। हालांकि, लगातार दूसरी बार वे कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। 19 मार्च 1970 तक ही यह थर्ड फ्रंट सरकार चल पाई। 

तीसरा कार्यकाल: अजय मुखर्जी का तीसरा कार्यकाल 2 अप्रैल 1971 से 29 जून 1971 तक चला। यह वह समय था, जब बांग्ला कांग्रेस का कांग्रेस में विलय हो गया। इस तरह बांग्ला कांग्रेस के बाद कांग्रेस दूसरा ऐसा दल रहा, जो सत्ता में छोटी अवधि के लिए ही सही, लेकिन वापसी करने में सफल रहा। वहीं, अजय राय तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गए।


संबंधित वीडियो
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें